मुख्यपृष्ठस्तंभलिटरेचर प्वाइंट- लोक आस्था का महापर्व छठ

लिटरेचर प्वाइंट- लोक आस्था का महापर्व छठ

रासबिहारी पांडेय

राजगोपाल सिंह का एक शेर है-
चढ़ते सूरज को लोग जल देंगे
जब ढलेगा तो उठके चल देंगे…
दुनिया का आम चलन यही है लेकिन लोक आस्था के महापर्व छठ में पहले दिन का अर्घ्य ढलते सूरज को दिया जाता है। रात बीतती है, फिर सुबह उगते सूरज को अर्घ्य देते हैं। संदेश स्पष्ट है- भारतीय संस्कृति कृतज्ञता ज्ञापन की संस्कृति है। हम सिर्फ ३३ कोटि देवताओं का ही पूजन नहीं करते, बल्कि माता भूमि:पुत्रोहं पृथिव्या: हमारी माता भूमि है और हम इसके पुत्र हैं… के उद्घोष के साथ धरती का पूजन करते हैं। नदियों को भी माता के रूप में देखते हैं। हम पेड़, पौधों, सूर्य और चंद्रमा के साथ नौ ग्रहों का भी पूजन करते हैं और इनका पूजन करते हुए सिर्फ अपने कल्याण की नहीं विश्व शांति की कामना करते हैं।
महानगरों में रह रहे कामकाजी लोग दीपावली में भले घर न जाएं छठ में जरूर जाते हैं। दीपावली के पहले से ही छठ की तैयारी की शुरुआत हो जाती है। लोग नया गेहूं धोने, सुखाने और पूजा के सामान की खरीदारी में लग जाते हैं। छठ पूजा के लिए कोई मुहूर्त देखने या किसी पंडित द्वारा अनुष्ठान की जरूरत नहीं है। सूर्योदय और सूर्यास्त देखकर व्रती व्रत का पारायण करते हैं। चार दिन तक चलने वाले छठ व्रत करनेवाले व्रती को लगभग ३६ घंटे तक उपवास करते हुए सूर्योदय के अर्घ्य के बाद व्रत तोड़ना होता है। लोक में यह आस्था जुड़ी है कि यह व्रत करने से जीवन के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं और वांछित कामनाओं की पूर्ति होती है।
छठ पूजा की परंपरा कैसे शुरू हुई, इस संदर्भ में कई कथाएं प्रचलित हैं। एक मान्यता के अनुसार त्रेता युग में जब भगवान राम और सीता १४ साल के वनवास के बाद अयोध्या लौटे थे, तब ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति और राम राज्य की स्थापना के लिए उन्होंने ऋषि-मुनियों के आदेश पर सूर्य षष्ठी का व्रत किया। पूजा के लिए उन्होंने मुग्दल ऋषि से प्रार्थना की। सीता ने मुग्दल ऋषि के आश्रम में रहकर छह दिनों तक सूर्यदेव भगवान की पूजा की और सप्तमी को सूर्योदय के समय अनुष्ठान पूर्ण कर अयोध्या लौटीं।
द्वापर युग में सूर्यपुत्र कर्ण द्वारा सूर्य की पूजा का उल्लेख मिलता है। कर्ण भगवान सूर्य के परम भक्त थे, वे रोज घंटों तक नदी में खड़े होकर उनकी आराधना करते थे। सूर्य पूजा के बाद वे खुले हाथों से दान करते थे। जो व्यक्ति जिस चीज की इच्छा रखता था, उसे वह प्रदान करते थे। उनके इसी संकल्प का लाभ उठाकर इंद्र ने उनका कवच और कुंडल मांग लिया था, जिसके कारण वे अर्जुन द्वारा महाभारत में मारे गए। बिहार स्थित अंग देश (भागलपुर) के राजा कर्ण के सूर्य के प्रति इस समर्पण को देखकर प्रजा ने भी सूर्य की उपासना प्रारंभ कर दी।
छठ व्रत की कथाओं को द्रौपदी से भी जोड़कर देखा जाता है। द्रौपदी ने पांडवों के वनवास के समय सुखमय जीवन लिए छठ व्रत करते हुए सूर्य की उपासना की थी। सूर्यदेव ने तब द्रौपदी को एक ताम्रपत्र दिया था जिसकी खासियत यह थी कि जब तक द्रौपदी नहीं खा लेती थी तब तक उस पात्र से कितने भी लोगों को भोजन कराया जा सकता था।
रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास लिखते हैं- हरि अवतार हेतु जेहि होई। इदमित्थं कहि जाय न सोई। भगवान का अवतार सिर्फ इसीलिए होता है, ऐसा नहीं कहा जा सकता है। पर्व त्योहारों से जुड़ी कथाओं के बारे में भी ऐसा ही कहा जा सकता है।
गत दिनों दिल्ली रेलवे स्टेशन पर छठ स्पेशल गाड़ी कैंसिल होने पर यात्री उग्र हो गए थे। बात लाठीचार्ज तक जा पहुंची। उत्तर भारतीयों के लिए छठ दिवाली और दशहरा से बड़ा त्योहार है। लोग सपरिवार घर जाते हैं। आक्रोश स्वाभाविक है। राज्य सरकारों को चाहिए कि वे इस मौके पर विशेष सावधानी बरतें।

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