मुख्यपृष्ठस्तंभलिटरेचर प्वाइंट : कितने सार्थक हैं लिटफेस्ट!

लिटरेचर प्वाइंट : कितने सार्थक हैं लिटफेस्ट!

रासबिहारी पांडेय

देशभर में लिटफेस्ट शीर्षक से आयोजित होनेवाले साहित्यिक कार्यक्रमों की संख्या सौ से अधिक हो चुकी है। लगभग हर बड़े शहर में ये आयोजन हो रहे हैं। सबसे अधिक चर्चा जयपुर और दिल्ली में आयोजित होनेवाले कार्यक्रमों की होती है। हालांकि, यहां साहित्य के नाम पर मनोरंजन का खयाल अधिक रखा जाता है। साहित्य का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं है। मनोरंजन हो तो ठीक, न हो तो भी ठीक। साहित्य सामाजिक सरोकारों और जीवन की गहन समस्याओं पर चिंतन करता है और उन्हें हल करने का उचित रास्ता सुझाता है। त्रिलोचन की एक कविता है-
दौड़-दौड़कर असमय समय न आगे आए
वह कविता क्या जो कोने में बैठ लजाए!
विज्ञान ने बहुत प्रगति कर ली है। रेडियो हमारे कान का विस्तार है, टीवी आंख का विस्तार है, सेल फोन जिह्वा का विस्तार है, लेकिन विज्ञान ने अभी तक ऐसा कोई यंत्र विकसित नहीं किया है, जो किसी के मन के अंदर झांक सके या किसी अंतरात्मा को निर्मल कर सके। यह शऊर हमें एकमात्र साहित्य से मिलता है। रोटी खाने का तरीका, कपड़े पहनने का सलीका और बात करने की तहजीब हमें साहित्य सिखाता है। साहित्य न सिर्फ बेहतर समाज निर्माण की सोच बनाता है, बल्कि समाज में जो कुछ बेहतर है उसे बचाए रखने का भी संघर्ष करता है। बर्नाड शॉ ने अपने नाटक में उस समय का चित्रण किया है, जब मनुष्य विकास और उन्नति की अंतिम मंजिलों तक पहुंच चुकेगा, तब वह जीवन कारोबारी जीवन नहीं होगा, एकमात्र विचारों और अनुभवों में निमग्न रहेगा। इसके विपरीत टॉम्स पीकॉक ने कहा था कि सभ्यता की तरक्की एक रोज साहित्य को समाज के लिए बेजरूरत बना देगी, मगर साहित्य की मशाल आज भी वैसे ही जल रही है जैसे हजारों साल पहले जल रही थी। साहित्य की सार्थकता और अस्तित्व पर हर युग में प्रश्नचिह्न लगता रहा है और आगे भी लगता रहेगा। संत कवियों ने राज दरबारों से दूर रहकर भी साहित्य और संगीत का एक समृद्ध जीवन जिया और दुनिया के सामने यह आदर्श प्रस्तुत किया कि सिर्फ धन और पद ही प्राप्त की वस्तु नहीं है।
हम उस दौर में जी रहे हैं, जहां मीडिया के लिए २०-२० क्रिकेट और बिग बॉस जैसे रियलिटी शो सबसे बहुत महत्वपूर्ण समाचार हैं। सेंसेक्स का आंकड़ा और जीडीपी हमारी तरक्की का पैमाना बन चुका है। अब हैसियत इंसानियत से बड़ी होती जा रही है। जिस संस्कृति और सभ्यता को कई सौ वर्षों के शासन के दौरान मुगल और अंग्रेज नहीं मिटा पाए, बाजार उसे बिना किसी परेशानी और उपद्रव के मिटा रहा है। ऐसे में साहित्य और साहित्यकारों की भूमिका और बढ़ जाती है। ऐसे आयोजन उस सोच की एक कड़ी साबित हों, तभी इनकी सार्थकता होगी।
पान मसाले और गुटखा के निर्माताओं का नाम प्रस्तुतकर्ता के रूप में दिया जाना साहित्यिक मूल्यों से समझौता करना है। प्रस्तुतकर्ता के रूप में सबसे बड़ी बोली कौन लगाएगा की बजाय यह निर्णय करना अधिक उचित होगा कि हमारी विश्वसनीयता और साख वैâसे बची रहेगी!
(लेखक वरिष्ठ कवि व साहित्यकार हैं।)

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