मुख्यपृष्ठस्तंभलिटरेचर प्वाइंट : मन के हारे हार है मन के जीते जीत

लिटरेचर प्वाइंट : मन के हारे हार है मन के जीते जीत

रासबिहारी पांडेय

कोचिंग इंस्टीट्यूट का गढ़ माने जानेवाले कोटा शहर में इस साल अब तक कुल २३ छात्रों ने आत्महत्या कर ली है। मात्र अगस्त में छह छात्रों की आत्महत्या का समाचार है। यह बहुत चिंताजनक बात है। हम अपने बच्चों को सब कुछ सिखाते हैं मगर यह सिखाना भूल जाते हैं कि उसका जीवन उसके साथ-साथ परिवार और समाज के लिए कितना महत्वपूर्ण है! बच्चे सोचते हैं कि मां-बाप ने हमारे लिए इतना पैसा खर्च किया, हम यदि परीक्षा पास नहीं कर सके तो उन्हें क्या मुंह दिखाएंगें! माता-पिता अक्सर यह बात कहना भूल जाते हैं कि अगर उसे लगता है कि इस परीक्षा की तैयारी उसके लिए मुश्किल है तो वह घर लौटकर कुछ और करने के बारे में सोच सकता है। सिर्फ इतना कहना बच्चे के लिए संजीवनी का काम कर सकता है। सिर्फ डॉक्टर और इंजीनियर के भरोसे यह देश और समाज नहीं चल रहा है। मिट्टी और पानी बेचनेवाले भी आज करोड़पति हैं। आज हर चीज का व्यवसायीकरण हो चुका है। बच्चा जिस क्षेत्र में जाना चाहे, उस क्षेत्र में करियर बनाने में उसकी मदद करनी चाहिए न कि अपने सपने बच्चों पर थोपकर उन्हें तनाव झेलने के लिए विवश करना चाहिए।
दुनियाभर में तनाव प्रबंधन (स्ट्रेस मैनेजमेंट) सीखने लिए के लोग श्रीमद्भगवद्गीता का सहारा लेते हैं। गीता यह बताती है कि हमारे समस्त द्वंद्वों एवं ग्रंथियों का मूल कारण हमारा अज्ञान है। हम जीवन में अपनी अपेक्षा के अनुरूप फल चाहते हैं और न मिलने पर दुखी रहते हैं।
जिस अर्जुन का नाम सुनकर ही योद्धाओं के पसीने छूटने लगते थे, वह वीर अर्जुन स्वयं महाभारत युद्ध के समय मोहग्रस्त होकर कांपने लगे थे। गांडीव धनुष को उन्होंने रथ में किनारे रख दिया और भगवान श्रीकृष्ण से अपनी जिज्ञासाओं का उत्तर पाया, फिर वे युद्ध के लिए तैयार हुए। हताशा और निराशा के क्षणों में हमें भी श्रीकृष्ण जैसा कोई सखा/गुरु तलाश करना चाहिए जो हमारे द्वंद्व को दूर कर सके। भौतिक रूप से बहुत समृद्ध और समाज में अपने कार्यों से बहुत नाम कमा चुकी बहुतेरी शख्सियतें भी आत्महत्या कर चुकी हैं। इससे यह प्रमाणित होता है कि आत्महत्या के लिए अमीरी-गरीबी या सफलता-असफलता कोई माने नहीं रखता, यह मानसिक अवसाद और हताशा की ही परिणति है।
श्रीमद्भगवद्गीता के निम्न श्लोक को हमें अपने जीवन का सूत्र बना लेना चाहिए।
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।।२.४७।।
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि कर्म करने में ही तेरा अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिए तू कर्मों के फल का हेतु मत हो और तेरी कर्म न करने में भी आसक्ति न हो।
जीवन को सुचारु रूप से चलाने के लिए कर्म करना आवश्यक है। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि तुम जो यह सोच रहे हो कि युद्ध करने पर ऐसा-ऐसा हो जाएगा, यह ठीक नहीं है। तुम्हारा कर्म सिर्फ युद्ध करना है, उसके फल के बारे में सोचना नहीं है। तुम यह भी मत सोचो कि तुम इसके हेतु हो और युद्ध करोगे ही नहीं, ऐसा भी नहीं हो सकता क्योंकि क्षत्रिय होने के नाते अन्याय के प्रति लड़ना तुम्हारा कर्म और धर्म दोनों है?
मोह के कारण जो लोग अपने मूल कर्तव्यों से विमुख हो जाते हैं। नियति को भूलकर स्वयं को कर्ता मान बैठते हैं, भगवान श्रीकृष्ण का उन लोगों के लिए यह संदेश है कि वे अपने हृदय की तुच्छ दुर्बलता का त्याग कर सद्विचारों के साथ सामान्य जीवन जीने का प्रयास करें।

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