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लिटरेचर प्वाइंट : मेरी आवाज ही पहचान है! लता मंगेशकर जयंती पर विशेष

  • रासबिहारी पांडेय

‘सुर सम्राज्ञी’, ‘भारत रत्न’ लता मंगेशकर की ९३वीं जयंती को दुनिया भर में उनके चाहनेवालों ने अपने-अपने तरीके से मनाया। अयोध्या में उनकी स्मृति में निर्मित ‘लता मंगेशकर चौक’ का लोकार्पण हुआ। तमाम नगरों, महानगरों समेत कस्बों और अंचलों में उन्हें उनके अमर गीतों के माध्यम से याद किया गया।
दुनिया का ८वां आश्चर्य बनकर धरती पर उतरनेवालीं लता मंगेशकर अनंत में विलीन होकर भी अपने सुरों के जरिये सर्वदा हमारे साथ हैं। जरा सोचिए अगर लता जी ने ‘ऐ मेरे वतन के लोगो…’ न गाया होता तो क्या शहीदों के सम्मान और महत्व को हम इतनी गंभीरता से महसूस कर पाते? यह एकमात्र गीत उन्हें अमर बनाने के लिए काफी है, मगर लता जी ने फिल्मों में जो हजारों गीत गाए हैं, उनमें से अनेक गीत ऐसे हैं जो क्लासिक बन चुके हैं और उनके बिना भारतीय सिने संगीत की चर्चा ही नहीं हो सकती। गंभीर दर्शन और उच्च साहित्यिक मूल्यों वाली रचनाओं के साथ-साथ उन्होंने हंसी-ठिठोली वाले हल्के-पुâल्के गीत भी गाए हैं, जिन्हें लोगों ने खूब पसंद किया। कुछ गीतों की शुरुआत या मध्य में उनकी गुनगुनाहट या हल्का सा अलाप भी ऐसा है कि मन होता है उसे बार-बार सुनते ही रहें… जैसे फिल्म ‘रेशमा और शेरा’ में ‘तू चंदा मैं चांदनी…’, फिल्म ‘एक दूजे के लिए’ में ‘सोलह बरस की बाली उमर को सलाम…’ या फिल्म ‘प्रेम पुजारी’ का ‘रंगीला रे…’। अमिताभ बच्चन कहते हैं कि उनके पिता हरिवंशराय बच्चन कहा करते थे कि लता जी की गायकी शहद की तरह है जो मीठी और मधुर तो है ही, उसकी धार कभी टूटती नहीं।
गायन में सम को साधने में जो महारत लता जी को हासिल थी, वह विरले ही किसी को नसीब होती है। कोई भी गीत सम से ही शुरू होता है और सम पर ही खत्म होता है। गायक संपूर्ण लयकारी का प्रदर्शन करते हुए यहीं आकर रुकता है। इस प्रक्रिया में बहुत लोग बेसुरे हो जाते हैं… हां…हूं…रे-रे-रे… जैसी आवाजों की आड़ में सामान्य श्रोताओं की पकड़ से तो बच जाते हैं, मगर संगीत के सुधी श्रोताओं और समीक्षकों द्वारा पकड़े जाते हैं।
लता जी ने हिंदी के साथ-साथ विभिन्न अंचलों की क्षेत्रीय भाषाओं में भी हजारों गीत गाए हैं। किसी भी भाषा में उनके उच्चारण को लेकर कभी कोई शिकायत नहीं हुई। मेरी मातृभाषा भोजपुरी है, जो सुख और सुकून भोजपुरी में मुझे लता जी को सुनकर मिलता है, उसका कोई अन्य विकल्प कभी नहीं मिला। भोजपुरी फिल्मों में उनके गाये गीत एक अनमोल धरोहर हैं जो मील के पत्थर की तरह सर्वदा आदर्श बने रहेंगे। ‘हे गंगा मैया तोहे पियरी चढ़इबो…’ हो या तलत महमूद के साथ युगल गीत ‘लाल लाल होंठवा से बरसे ललइया…’ हो। उन्होंने इन गीतों को इतने भाव से गाया है कि उनकी आवाज सीधे दिल में उतर जाती है।
लता जी का मन शास्त्रीय संगीत में खूब रमता था। रजत शर्मा को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा भी था कि मैं शास्त्रीय संगीत को साधना चाहती थी मगर मेरी यह साध पूरी नहीं हो सकी क्योंकि जिंदगी ने उतना वक्त नहीं दिया। वे अपने पिताजी की बरसी पर भीमसेन जोशी और कुमार गंधर्व जैसे शास्त्रीय गायकों की ही प्रस्तुति रखती थीं। उनके प्रति हीरोइनों की दीवानगी का आलम ये था कि वे प्रोड्यूसरों से शर्त के तौर पर कहा करती कि आप कॉन्ट्रेक्ट में लिखिए कि हमारे लिए लता मंगेशकर प्लेबैक करेंगी।
लता जी का सेंस ऑफ ह्यूमर कमाल का था। एक बार किसी संगीतकार ने किसी गायिका से इश्क होने के बाद उसे सर्वश्रेष्ठ गायिका घोषित कर दिया। इस पर लता जी की टिप्पणी थी कि ‘इश्क में आदमी अंधा हो जाता है। यह तो कई बार देखा है लेकिन बहरा भी हो जाता है, ऐसा पहली बार देखा है।’
‘मुगल-ए-आजम’, ‘पाकीजा’, ‘गाइड’, ‘मदर इंडिया’, ‘चित्रलेखा’, ‘सिलसिला’, ‘चांदनी’, ‘अभिमान’ जैसी क्लासिक फिल्में क्या लता जी की आवाज के बिना वो जादू जगा पातीं, जिसके लिए दुनिया भर में हर दिन लोग उन्हें याद करते हैं?
भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ और सिनेमा का सर्वोच्च सम्मान ‘दादा साहब फाल्के’ के साथ-साथ उन्हें अनगिनत सम्मान और पुरस्कार दिए गए बावजूद इसके ऐसा लगता है कि लता जी ने देश और समाज को जो दिया उसके मुकाबले हम उन्हें कुछ भी नहीं दे सके। उनके दिवंगत होने के बाद महाराष्ट्र सरकार का नैतिक कर्तव्य बनता है जिस ‘प्रभु कुंज ‘ में उन्होंने अपना तमाम जीवन बिताया उसे लता मंगेशकर संग्रहालय के रूप में विकसित करे, जहां देश और दुनिया से आनेवाले तमाम लोग अपना सिर झुका सकें। यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

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