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लिटरेचर प्वाइंट : गणेश उत्सव के बहाने अंग्रेजों के खिलाफ फूंका था बिगुल

  • रासबिहारी पांडेय

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने गणेशोत्सव को राष्ट्रीय उत्सव के रूप में परिणत कर दिया। अंग्रेजों के शासनकाल में अंग्रेजी शिक्षा पद्धति के कारण हिंदू धर्म के प्रति हिंदू युवकों के आचार-विचार भ्रष्ट होने लगे। वे देवी-देवताओं और पूजा उपवास का उपहास करने लगे। इस अनर्थ की ओर बुद्धिजीवियों का ध्यान गया तो वे इसे दूर करने का उपाय सोचने लगे। लोकमान्य तिलक को इसके लिए गणेश उत्सव उचित माध्यम लगा। गणेश उत्सव के बहाने उन्होंने हिंदुओं में जन-जागरण उत्पन्न करनेवाले कार्यक्रम प्रारंभ किए। कीर्तन,प्रवचन,व्याख्यान के साथ संगीत के तीनों अंग गायन वादन और नृत्य को भी प्रधानता दी गई।
योजना पूर्वक व्याख्यानों के विषय ऐसे रखे जाने लगे जिनसे वेद, पुराण, भारतीय साहित्य और संस्कृति, राम, कृष्ण, संस्कृत,ज्योतिष और आयुर्वेद के प्रति लोगों में श्रद्धा उत्पन्न हो। बहुत शीघ्र ही युवकों को यह समझ में आ गया कि विदेशी हमारे इतिहास को इस ढंग से लिख रहे हैं कि हम अपनी संस्कृति को छोड़कर उनकी संस्कृति को अपना लें। सेमिनारों में विद्वान वक्ता भारतीय संस्कृति के उन्नायक विषयों की कुछ इस प्रकार व्याख्या करने लगे कि जन-जन तक उनकी बात पहुंचने लगी मगर बहुत प्रयत्न के बाद भी अंग्रेज सरकार उसे गैर कानूनी नहीं सिद्ध कर सकी। कवि, लेखक और वक्ता अपने वाक्चातुर्य के कारण इनके शिकंजे में नहीं आ सके और जो कुछ भी वे कहना चाहते थे, धर्म और शास्त्रों का सहारा लेकर कह देते थे।
लोकमान्य तिलक गणेश उत्सव के माध्यम से स्वदेशी माल के प्रचार, विदेशी माल के बहिष्कार, निज भाषा की उन्नति आदि संदेशों को जन-जन तक पहुंचाने में पूर्ण सफल रहे। धार्मिक आयोजन होने के कारण अंग्रेज सरकार इस पर प्रतिबंध नहीं लगा पा रही थी, इसलिए उसने लोकमान्य तिलक पर केसरी में प्रकाशित लेखों के आधार पर राजद्रोह सिद्ध कर उन्हें मांडले जेल भेज दिया। अंग्रेज सरकार को लगता था कि लोकमान्य तिलक के जेल चले जाने से ये उत्सव बंद हो जाएंगे, किंतु ऐसा नहीं हुआ। जन-जन के हृदय में परतंत्रता और भी खटकने लगी और गणेश उत्सव के माध्यम से जनचेतना दिन-ब-दिन बढ़ती ही चली गई।
बड़े नगरों में ही नहीं छोटे-छोटे गांव कस्बों में भी गणेश उत्सव मनाया जाने लगा। गणेश उत्सव में गाए जाने वाले गीतों के माध्यम से सरकार की तानाशाही उजागर की जाने लगी। उन दिनों बिजली के अभाव में लकड़ी पर कपड़ा लपेटकर मशाल जलाया जाता था। सरकार ने लाठी लेकर उत्सव में भाग लेने पर पाबंदी लगा दी, जिससे उत्सव में लेझिम का खेल बंद हो गया। भाला से दिखाए जाने वाले करामात भी बंद कर दिए गए। शिवाजी महाराज और लोकमान्य तिलक की जयकार और चित्रों पर रोक लगा दी गई। अंग्रेज सरकार ने गणेश उत्सव मनाने वालों को तंग करके गणेश उत्सव में विघ्न डालने का प्रयास किया किंतु जन-जन में व्याप्त भगवान गणेश के प्रति उनकी श्रद्धा थोड़ी भी कम नहीं कर सकी, बल्कि इसने आग में घी का काम किया। जब कहीं शोभायात्रा को पुलिस ने रोका तो लोगों ने बीच सड़क पर गणेश मूर्तियों को छोड़कर अपना आक्रोश प्रकट किया। बाद में पुलिस ने स्वयं सड़क से मूर्तियों को उठाकर विसर्जित किया।
गणेश उत्सव में महात्मा गांधी,स्वामी श्रद्धानंद, लाला लाजपत राय, बिपिन चंद्र पाल, नेताजी सुभाषचंद्र बोस, मदन मोहन मालवीय, भगवानदास, नरीमान, सरोजिनी नायडू,जमनादास मेहता, पन्नालाल व्यास जैसे हिंदू, मुसलमान,पारसी आदि सभी धर्म के प्रभावशाली लोगों के संबोधन होने लगे। गणेश उत्सव के कारण मेला, पोवाड़े, शाहीर और लावणी के प्रति लोगों में विशेष आकर्षण बढ़ा जो बाद में महाराष्ट्र की सांस्कृतिक पहचान बने। गणेश उत्सव के माध्यम से न सिर्पâ राष्ट्रीय चेतना को बल मिला बल्कि साहित्य संगीत,चित्रकला और मूर्ति कला को भी उचित प्रश्रय मिला।

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