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लिटरेचर प्वाइंट: जितना कम सामान रहेगा उतना सफर आसान रहेगा

रासबिहारी पांडेय

भारतीय समाज कवि, लेखकों, संस्कृति कर्मियों को उनकी जयंती और पुण्यतिथि पर अवश्य याद करता है। पिछले ४ जनवरी को स्मृतिशेष गीतकार गोपालदास नीरज की जयंती थी। मुंबई समेत पूरे देश में उनकी याद में भिन्न-भिन्न कार्यक्रम हुए। कवि सम्मेलन के मंचों पर सबसे लंबे अरसे तक काव्य पाठ करने का विश्व रिकॉर्ड गोपालदास नीरज के ही नाम है। जीवन के गंभीर संघर्षों के कारण युवावस्था में ही उन्हें कई व्याधियों ने घेर लिया था, बावजूद इसके उन्होंने काव्य मंचों पर जाना कभी नहीं छोड़ा। महानगरों में रात के दस बजे तक कार्यक्रम खत्म कर दिए जाते हैं, किंतु सुदूर प्रांतों में कवि सम्मेलन देर रात तक चलते हैं। नीरज जी अस्वस्थता के बावजूद जीवन भर कवि सम्मेलनों में देर रात तक जागते रहे। अक्सर उनकी अध्यक्षता में कार्यक्रम होते थे। अध्यक्ष को अंत में काव्य पाठ करना होता है, उनके आकर्षण में हजारों लोग देर रात तक बैठे रहते थे। जनता के विशेष आग्रह पर अक्सर उन्हें दो-दो बार काव्य पाठ करना पड़ता था।
नीरज जी के पिताजी ६ वर्ष की उम्र में ही चल बसे, परिवार की जिम्मेदारी उनके ऊपर आ पड़ी। १२ वर्षों तक वे टाइपिस्ट बने रहे। कठिन परिश्रम से अपनी पढ़ाई पूरी की, इसकी बदौलत पहले कानपुर में जनसंपर्क पदाधिकारी बने, फिर एक कॉलेज में प्रवक्ता हुए। कवि सम्मेलन में अधिक व्यस्तता होने लगी तो नौकरी छोड़ दी और पूरा जीवन साहित्य को समर्पित कर दिया। कुछ दिनों तक फिल्मों में गीत लेखन के लिए मुंबई में भी रहे। यहां उनका मन अधिक नहीं रमा, लेकिन जितने गीत उन्होंने लिखे वे अपनी मिसाल आप हैं। नीरज उन गिने-चुने रचनाकारों में हैं, जिनके पहले से लिखे गीतों के लिए फिल्मों में सिचुएशन बनाई गई। ‘कारवां गुजर गया गुबार देखते रहे’, ‘देखती ही रहो आज दर्पण ना तुम’, ‘शोखियों में घोला जाए फूलों का शबाब’ ऐसे अनेक गीत हैं जिन्हें नीरज ने मन की मौज में लिखा था और ये गीत कवि सम्मेलनों के माध्यम से पहले ही बहुत लोकप्रिय हो चुके थे। निर्माताओं ने उन गीतों को फिल्मों में रिकॉर्ड कर अपनी फिल्मों को अमर बना लिया। ‘फूलों के रंग से दिल की कलम से’ गीत के अंतरे में एक शब्द आता है- मदिर (नशा उत्पन्न करनेवाला) इतना मधुर, इतना मदिर, तेरा मेरा प्यार… नीरज से पहले और नीरज के बाद भी आज तक किसी ने फिल्मी गीत में इस शब्द का प्रयोग करने का साहस नहीं किया।
नीरज जी के साथ मुझे भी कई कवि सम्मेलनों में काव्य पाठ करने का सुअवसर मिला। विद्यार्थी जीवन में मैंने मिर्जापुर में ‘नीरज निशा’ का आयोजन किया था। तभी से मैं उनका स्नेहभाजन बन गया था। लखनऊ रवींद्रालय हाल में उनकी हीरक जयंती मनी तो उनके स्नेह के कारण कवियों की सूची में मेरा नाम भी जुड़ा। गीतकार डॉ. सुरेश से इसी कार्यक्रम के जरिए मेरी दोस्ती परवान चढ़ी।
चार पीढ़ियों के लोगों ने नीरज जी को देखा, सुना और उनका सान्निध्य प्राप्त किया। कविता मंचों पर नवोदित कवियों के साथ भी वे मित्रवत व्यवहार रखते थे। अनेक प्रतिभाओं को तरासने और प्रकाश में लाने का श्रेय उन्हें जाता है। साहित्य और सिनेमा में शीर्ष स्थान पाने के बावजूद तड़क-भड़क से दूर वे सादा और सरल जीवन जीते थे। उनकी गजल के ये शेर जीवन दर्शन की सटीक व्याख्या करते हैं-
जितना कम सामान रहेगा
उतना सफर आसान रहेगा।
उससे मिलना नामुमकिन है
जब तक खुद का ध्यान रहेगा।
हाथ मिले और दिल न मिले हों
ऐसे में नुकसान रहेगा।

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