मुख्यपृष्ठस्तंभलिटरेचर प्वाइंट : राही रैंकिंग का सच!

लिटरेचर प्वाइंट : राही रैंकिंग का सच!

रासबिहारी पांडेय

राही सहयोग संस्थान, जयपुर ने हिंदी के सौ लोकप्रिय लेखकों की सूची जारी की है। दावा यह है कि ये वर्तमान में हिंदी के सर्वाधिक लोकप्रिय लेखक हैं। ज्यादा माथापच्ची न करनी पड़े इसलिए साहित्य की सभी विधाओं को इस १०० की संख्या में ही समेट लिया गया है, जो नितांत आपत्तिजनक है। सारी विधाओं को भला एक में कैसे समेटा जा सकता है?
जिन लेखकों की सूची जारी की गई है, उसमें ऐसे कई लेखक शामिल हैं, जिनकी किताबों का दूसरा संस्करण कभी नहीं आया और पहला संस्करण भी ३०० प्रतियों से अधिक का कभी नहीं छपा। फिर वे हिंदी लेखकों की इतनी महत्वपूर्ण सूची में कैसे स्थान पा सकते हैं? आम आदमी तो दूर पत्र-पत्रिकाओं और लेखकों तक भी जिनकी किताबें नहीं पहुंच पातीं, वे इस सूची में किस लिहाज से शामिल कर लिए गए हैं? हालांकि, संस्थान का यह दावा है कि वह आम पाठकों के बीच व्यापक सर्वे कराता है और उसी सर्वेक्षण के आधार पर यह राय बनाई जाती है कि ये सौ में से किस नंबर पर हैं, किंतु सच यह है कि इसमें अधिकांश लेखक हर वर्ष मौजूद होते हैं, केवल उनकी क्रम संख्या ऊपर-नीचे होती रहती है। कुछ लेखक बहुत गर्व से फेसबुक पर यह पोस्ट करते हैं कि पिछले वर्ष मैं ७५वें नंबर पर था, इस वर्ष ४५ पर आ गया हूं। यह चमत्कार वैâसे हुआ, यह रहस्य कभी नहीं बताते। कवि, पत्रकार समाज के धोखेबाजों और ठगों की शिनाख्त करते हैं, किंतु इनमें से कुछ ऐसे भी हो जाते हैं, जो नगण्य और तुच्छ सम्मानों के लालच में स्वयं अपनी अस्मिता गिरवी रखकर हास्यास्पद ढंग से संस्था के प्रचार-प्रसार में लग जाते हैं। सम्मान के नाम पर इस तरह की बौद्धिक दुकानदारी का खेल हिंदुस्थान के हर बड़े शहर में चलता रहता है और सम्मान पिपासु लेखक थोड़ा-बहुत या भारी-भरकम शुल्क देकर इसे हासिल करते रहते हैं। कुछ जेबी संस्थाएं घर बैठे सर्टिफिकेट दे देती हैं और मुलम्मा राष्ट्रीय सर्वे का चढ़ा देती हैं। ऐसा कोई सर्वे पूर्णत: सही हो, यह दावा नहीं किया जा सकता लेकिन किसी स्तर पर यह सर्वे तो हो। थोड़ा-बहुत ही सही पारदर्शिता तो हो।
सवाल इसलिए बनता है, क्योंकि सर्वे का डाटा कभी सामने नहीं आता… किन लोगों ने किनके बीच और कहां-कहां सर्वे किया… इसके संसाधन क्या हैं, स्रोत क्या हैं… आदि आदि। संस्थान को संचालित करनेवाले स्वयं भी इस सूची में शामिल हैं। सूची में जहां हिंदी के अनेक सक्रिय और लोकप्रिय कवि, कथाकार, समीक्षकों का कोई अता-पता नहीं है, वहीं कई अयोग्य और तीसरे दर्जे के लेखक/लेखिका शामिल कर लिए गए हैं। सूची क्रम में प्रथम चार लेखिकाएं हैं, जिनकी प्रतिभा से हिंदी जगत बहुत पहले से परिचित है। निश्चित रूप से ये हिंदी की बड़ी और स्थापित लेखिकाएं हैं, किंतु पिछले एक वर्ष में पुस्तकें पढ़े जाने के लिहाज से ये प्रथम होंगी, निश्चित रूप से ऐसा नहीं कहा जा सकता। इस तरह के मूल्यांकनों का हिंदी जगत में कोई मूल्य नहीं है। जो लेखक इस रैंकिंग के बल पर ढोल-नगाड़े बजा रहे हैं और स्वयं अपना प्रशस्ति गान कर रहे हैं, वे सहानुभूति के पात्र हैं।

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