मुख्यपृष्ठस्तंभलिटरेचर प्वाइंट : महिला आरक्षण बनाम स्री विमर्श

लिटरेचर प्वाइंट : महिला आरक्षण बनाम स्री विमर्श

रासबिहारी पांडेय

स्त्रियों को संसद में ३३ प्रतिशत आरक्षण दिलानेवाला नारी शक्ति वंदन विधेयक लोकसभा और राज्यसभा में निर्विरोध रूप से पारित हो गया। राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद यह कानून बन जाएगा और इस तरह लोकसभा और विधानसभा में महिलाओं को ३३ प्रतिशत आरक्षण मिलना प्रारंभ हो जाएगा। इस विधेयक के पारित होने से सदन में महिलाओं की भागीदारी निश्चित रूप से बढ़ेगी। आज नारियां समाज के हर क्षेत्र में सक्रिय हैं। शिक्षा, तकनीक, व्यवसाय और सेना में लड़ाकू विमान चलाने से लेकर देश की विधायिका और न्यायपालिका में भी शीर्ष पदों पर बैठी हैं। हाल ही में प्रक्षेपित चंद्रयान-३ के अभियोजन में भी महिला वैज्ञानिकों की वरेण्य भूमिका है।
भारतीय संस्कृति में नारी को देवी का दर्जा दिया गया है-
यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवता। जहां नारियों का सम्मान होता है, वहां देवता रमण करते हैं।
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं-
मृत्यु: सर्वहरश्चाहमुद्भ‍वश्च भविष्यताम्।
कीर्ति: श्रीर्वाक्‍च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृति: क्षमा।।
मैं सर्वभक्षी मृत्यु हूं और मैं ही आगे होनेवालों को उत्पन्न करनेवाला हूं। स्त्रियों में मैं कीर्ति, श्री, वाक्, स्मृति, मेधा, धृति तथा क्षमा हूं।
कुछ लोग सनातन ग्रंथों से कुछ उद्धरण निकालकर उसकी गलत व्याख्या करते हुए यह प्रदर्शित करते हैं कि वैदिक परंपरा महिलाओं के खिलाफ है, ऐसा बिलकुल नहीं है।
रामचरिमानस में गोस्वामी तुलसीदास लिखते हैं-
स्वायंभू मनु अरु सतरूपा। जिन्ह ते भइ नर सृष्टि अनूपा।।
मनु और शतरूपा दोनों ने मिलकर सृष्टि का निर्माण किया।
साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में इधर के कुछ वर्षों में स्त्री विमर्श के नाम पर जो कुछ बातें होती रही हैं, उनमें प्रमुखत: स्त्री के प्रति समाज, समुदाय, धर्म एवं पुरुषों के दृष्टिकोण की ही चर्चा ज्यादातर रही है। इनमें यदि कहीं स्त्री के व्यक्तिगत दोष या कमी की बात आई भी है तो उसे भी पुरुष वर्चस्वता के खाते में डाल दिया गया है- जैसे बहू के प्रति सास या ननद का अन्यायपूर्ण क्रूर बर्ताव या दहेज हत्या। कहा गया कि ऐसा कृत्य सासें या ननदें अपने जेठों, देवरों, पतियों, भाइयों आदि पुरुषों के बहकावे या धमकियों से मजबूर होकर ही करने को विवश होती हैं। स्त्री की कमजोर आर्थिक स्थिति की भी चर्चा हुई है। इन सब बातों के साथ ही स्त्री विमर्श का दायरा पिछले कुछ वर्षों में व्यक्तिगत आरोपों प्रत्यारोपों, लांछनाओं तक भी जा पहुंचा है।
स्त्री विमर्श का आशय स्त्री चरित्र या त्रिया चरित्र से बिल्कुल नहीं, स्त्री जैसी भी हो, समाज में उसकी हालत एक सी है। उसके प्रति किए जा रहे अन्याय अत्याचार से है। उसकी दोयम दर्जे की हालत से है। महिला आरक्षण विधेयक समाज में महिलाओं को बराबरी का दर्जा दिलाने में एक विशेष कदम है, जिसका स्वागत किया ही जाना चाहिए।
(लेखक वरिष्ठ कवि व साहित्यकार हैं।)

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