मुख्यपृष्ठस्तंभसाहित्य शलाका: भारतेंदु और द्विवेदी युग के सेतु बालमुकुंद गुप्त

साहित्य शलाका: भारतेंदु और द्विवेदी युग के सेतु बालमुकुंद गुप्त

डॉ. दयानंद तिवारी

बाबू बालमुकुंद गुप्त भारतेंदु युग और द्विवेदी युग को जोड़ने वाली कड़ी हैं। इनके निबंधों में यदि एक ओर भारतेंदु युग का राष्ट्रप्रेम, जनजागरण और सामाजिक नव निर्माण की लालसा मुखरित हुई है तो दूसरी ओर द्विवेदी युगीन भाषा सौष्ठव भी विद्यमान है। द्विवेदी युगीन निबंध को गंभीर चिंतन की स्वतंत्र कला बनाने वाले लेखकों में बालमुकुंद गुप्त सर्वश्रेष्ठ निबंधकार थे। उनका जन्म १८६३ ई. में हुआ था। इनकी आरंभिक शिक्षा उर्दू-फारसी में हुई थी। वे एक साफगोई एवं स्वतंत्र दिमाग के लेखक एवं निबंधकार थे। वे अपने स्वभावानुसार लेखन करते थे। वे किसी दबाव एवं डर से किसी लेख को नहीं लिखते थे। वे स्वभाव से भी जिंदादिल एवं लेखन कला में भी मनमौजी थे। उनकी इसी प्रवृत्ति के कारण वे अपनी बात कहने में तनिक भी नहीं डरते थे। उनकी प्रकृति में भारतेंदु कालीन युग की तत्परता, शालीनता, कर्तव्य परायणता और राष्ट्रीय-बोध का अद्भुत संगम मिलता है। प्रारंभिक शिक्षा के बाद १८८६ ई. में पंजाब विश्वविद्यालय से मिडिल परीक्षा प्राइवेट परीक्षार्थी के रूप में उत्तीर्ण की। विद्यार्थी जीवन से ही उर्दू पत्रों में लेख लिखने लगे। झज्जर (जिला रोहतक) के ‘रिफाहे आम’ अखबार और मथुरा के ‘मथुरा समाचार’ उर्दू मासिकाओं में पं. दीनदयाल शर्मा के सहयोगी रहने के बाद १८८६ ई. में चुनार के उर्दू अखबार ‘अखबारे चुनार’ के दो वर्ष संपादक रहे। १८८८-१८८९ ई. में लाहौर के उर्दू पत्र ‘कोहेनूर’ का संपादन किया।
१८८९ ई. में महामना मालवीय जी के अनुरोध पर कालाकांकर (अवध) के हिंदी दैनिक ‘हिंदोस्थान’ के सहकारी संपादक हुए जहां तीन वर्ष रहे। यहां पं. प्रतापनारायण मिश्र के संपर्वâ से हिंदी के पुराने साहित्य का अध्ययन किया और उन्हें अपना काव्य गुरु स्वीकार किया। सरकार के खिलाफ लिखने पर वहां से हटा दिए गए। अपने घर गुड़ियानी में रहकर मुरादाबाद के ‘भारत प्रताप’ उर्दू मासिक का संपादन किया और कुछ हिंदी तथा बांग्ला पुस्तकों का उर्दू में अनुवाद किया। अंग्रेजी का इसी बीच अध्ययन करते रहे। १८९३ ई. में ‘हिंदी बंगवासी’ के सहायक संपादक होकर कलकत्ता गए और छह वर्ष तक काम करके नीति संबंधी मतभेद के कारण इस्तीफा दे दिया। १८९९ ई. में ‘भारतमित्र’ कलकत्ता के वे संपादक हुए। १८ सितंबर १९०७ को दिल्ली में लाला लक्ष्मीनारायण की धर्मशाला में गुप्तजी का देहांत हुआ। उस समय वे ४२ वर्ष के भी नहीं हुए थे। वे भारतेंदु और प्रतापनारायण मिश्र के सच्चे उत्तराधिकारी थे। उनके गद्य पर कहीं रोगशोक की छाया नहीं है। उसमें दासता के बंधन तोड़ने को उठते हुए अभ्युदयशील राष्ट्र का आत्मविश्वास है। उस युग में जब देवनागरी को सरकारी नौकरियों के उम्मीदवार पूछते न थे, जब अंग्रेजी सरकार सन् सत्तावन से सबक सीखकर हिंदी-भाषी जाति में हर तरह से विघटन के बीज बो रही थी, जब आधुनिक हिंदी-साहित्य का आरंभ हुए पच्चीस-तीस साल ही हुए थे, बालमुकुंद गुप्त ने संसार की भाषाओं में हिंदी का स्थान निर्दिष्ट करते हुए लिखा था-अंग्रेज इस समय अंग्रेजी को संसार-व्यापी भाषा बना रहे हैं और सचमुच वह सारी पृथ्वी की भाषा बनती जा रही है। वह बने, उसकी बराबरी करने का हमारा मकदूर नहीं है, पर यदि हिंदी को भारतवासी सारे भारत की भाषा बना सकें, तो अंग्रेजी के बाद दूसरा दर्जा पृथ्वी पर इसी भाषा का होगा।’ गुप्तजी ने हर्बर्ट स्पेंसर के बारे में लिखा था- उसने कभी कोई उपाधि न ली, कभी राजा का दर्शन करने न गया, कभी धनी की सेवा न की और न किसी सभा का सभापति हुआ। इन शब्दों में उन्होंने स्वयं अपने जीवन का आदर्श प्रस्तुत कर दिया है। कविता, इतिहास, आलोचना, व्याकरण, उन्होंने जो भी लिखा, उनकी निगाह हमेशा जनता पर रही।
गुप्तजी हिंदी भाषा की प्रकृति को बहुत अच्छी तरह पहचानते थे। वे अनगढ़ भाषा के कट्टर शत्रु थे। `अस्थिरता’ शब्द को लेकर उन्होंने महावीर प्रसाद द्विवेदी के खिलाफ जो लेखमाला प्रकाशित की थी, उसका व्यंग्य और परिहास, तर्वâ में उनकी सूझबूझ, शब्द और व्याकरण की समस्याओं पर सरस वाक्य-रचना, सब कुछ अनूठा है। वाद-विवाद की कला के वे आचार्य हैं। उनके वाक्यों में सहज बांकपन रहता है। उपमान ढूंढ़ने में उन्हें श्रम नहीं करना पड़ता। व्यंग्यपूर्ण गद्य में उनके उपमान विरोधी पक्ष को परम हास्यास्पद बना देते हैं। आपके हुक्म की तेजी तिब्बत के पहाड़ों की बरफ को पिघलाती है। फारिस की खाड़ी का जल सुखाती है, काबुल के पहाड़ों को नर्म करती है। समुद्र, अंग्रेजी राज्य का मल्लाह है, पहाड़ों की उपत्यकाएं बैठने के लिए कुर्सी-मूढ़े। बिजली, कलें चलानेवाली दासी और हजारों मील खबर लेकर उड़ने वाली दूती। अपने व्यंग्य-शरों से उन्होंने प्रतापी ब्रिटिश राज्य का आतंक छिन्न-भिन्न कर दिया। साम्राज्यवादियों के तर्वâजाल की तमाम असंगतियां उन्होंने जनता के सामने प्रकट कर दीं। अपनी निर्भीकता से उन्होंने दूसरों में यह मनोबल उत्पन्न किया कि वे भी अंग्रेजी राज्य के खिलाफ बोलें। ‘भारतमित्र’ में आपके प्रौढ़ संपादकीय जीवन का निखार हुआ। भाषा, साहित्य और राजनीति के सजग प्रहरी रहे। देशभक्ति की भावना इनमें सर्वाेपरि थी। भाषा के प्रश्न पर सरस्वती पत्रिका के संपादक, पं. महावीर प्रसाद द्विवेदी से इनकी नोंक-झोक, लार्ड कर्जन की शासन नीति की व्यंग्यपूर्ण और चुटीली आलोचनायुक्त ‘शिवशंभु के चिट्ठे’ और उर्दूवालों के हिंदी विरोध के प्रत्युत्तर में उर्दू बीबी के नाम चिट्ठी विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। लेखनशैली सरल, व्यंग्यपूर्ण, मुहावरेदार और हृदयग्राही होती थी। पैनी राजनीतिक सूझ और पत्रकार की निर्भीकता तथा तेजस्विता इनमें वूâट-वूâटकर भरी थी। पत्रकार होने के साथ ही वे एक सफल अनुवादक और कवि भी थे। अनूदित ग्रंथों में बांग्ला उपन्यास मडेल भगिनी और हर्षकृत नाटिका रत्नावली उल्लेखनीय हैं। स्पुâट कविता के रूप में आपकी कविताओं का संग्रह प्रकाशित हुआ था। इनके अतिरिक्त आपके निबंधों और लेखों के संग्रह हैं। उनकी प्रमुख रचनाएं हैं- हरिदास, खिलौना, खेलतमाशा, स्पुâट कविता, शिवशंभु का चिट्ठा, सन्निपात चिकित्सा, बालमुकुंद गुप्त निबंधावली आदि। बालमुवुंâद गुप्त की कई शैलियां हैं, जिसे व्यक्तिगत रूप से उनकी शैली भी कह सकते हैं। जैसे आलोचनात्मक, विवरणात्मक और व्यंग्यात्मक शैली। वैसे तो गुप्त जी ने सभी प्रकार की शैलियों को अपनाया है। मुख्य रूप से उनकी शैली व्यंग्यात्मक ही है। उनकी रचनाओं और शिवशंभु के चिट्ठे आदि रचनाओं में व्यंग्यात्मक शैली के दर्शन होते हैं। इस तरह बालमुकुंद गुप्त प्रतिष्ठित रचनाकार हैं। उनकी व्यंग्यपूर्ण शैली उनके लेखन को एक विशिष्ट आयाम प्रदान करती है। कविता और निबंध में उनका योगदान अविस्मरणीय है। गुप्तजी की बाल कविताएं भी हमारा ध्यान आकर्षित करती हैं। ‘शिवशंभु के चिट्ठे’ उनकी सर्वाधिक चर्चित कृति है। वे ‘भारत मित्र’ अखबार के संपादक के रूप में भी जाने जाते हैं। भाषा के प्रति उनका दृष्टिकोण उन्हें अपने समकालीनों में विशिष्ट बनाता है। गुप्तजी हिंदी को संस्कृतनिष्ठ बनाने के पक्षधर नहीं थे। वे भाषा को आम बोलचाल के शब्दों से समृद्ध करना चाहते थे। हिंदी का स्वरूप निर्धारित करने में उनका योगदान सर्वविदित है फिर भी उस समय के प्रख्यात आलोचकों द्वारा उनकी उपेक्षा की गई। इस संदर्भ में रामचंद्र शुक्ल का नाम लिया जा सकता है। एक बार ‘अस्थिरता’ शब्द को लेकर ‘सरस्वती’ पत्रिका के संपादक महावीर प्रसाद द्विवेदी और उनमें विवाद होता है, जिसमें दोनों संपादक अपने-अपने लेखों के द्वारा मजबूती से अपना पक्ष रखते हैं। उनके इस विवाद में अन्य आलोचक भी हस्तक्षेप करते हैं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल इस प्रकरण में महावीर प्रसाद द्विवेदी के पक्ष में खड़े दिखाई देते हैं। लेकिन गुप्तजी तर्वâ के साथ मोर्चे पर डटे रहते हैं। यह उनकी और उनकी शैली की विशेषता है।

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