मुख्यपृष्ठस्तंभसाहित्य शलाका : वैदिक साहित्य में शिव महात्म्य

साहित्य शलाका : वैदिक साहित्य में शिव महात्म्य

डॉ. दयानंद तिवारी

हमारे यहां आदिकाल से ही चले आ रहे देवताओं में शिव का विशिष्ट स्थान है। विश्व के आदि ग्रंथ ऋग्वेद में इन्हें रुद्र के नाम से पुकारा गया और उसके रुद्र स्तवन में उनकी विशेष चर्चा की गई। अन्य वेदों में भी शिव का उल्लेख है और रुद्र के अतिरिक्त उनके अन्य अनेक नामों की भी चर्चा वैदिक साहित्य में है। ब्राह्मण तथा आरण्यक ग्रंथों में भी शिव के बारे में विशद वर्णन है। अनेक उपनिषदों में शिव के बारे में विस्तार से चर्चा की गई है। श्वेताश्वतरोपनिषद् तथा नील रुदोपनिषद जैसे कुछ उपनिषद् तो मुख्य रूप में शिव पर ही आधारित है। पुराणों में भी लगभग सभी में शिव तथा शिवलिंग पूजन की चर्चा है। शिव पुराण, लिंग, पुराण, स्कंदपुराण, मत्स्य पुराण, कूर्म पुराण और ब्रह्मांड पुराण- ये छह पुराण तो पूर्णत: शैव पुराण ही हैं और इस रूप में इनमें शिव और पार्वती के बारे में विस्तृत चर्चा है। शैव पुराणों के अतिरिक्त वैष्णव पुराणों में भी शिव-पार्वती का पर्याप्त उल्लेख है और उनकी अनेक कथाओं की विस्तार से चर्चा है। पौराणिक साहित्य में शिव पुराण विशेष उल्लेखनीय है। इसमें शिव, सती, पार्वती, लिंग-पूजन तथा इनसे संबंधित अनेक बातों तथा अंतर्कथाओं का विस्तृत उल्लेख है। शिवलिंग का निर्माण वैâसे और किस रूप में हो, उसका पूजन किस प्रकार से किया जाए तथा इस पूजन से कौन-कौन से फल मिलते हैं, इन सब बातों की विवेचना इस ग्रंथ में की गई है। लिंग पूजन की दार्शनिक पृष्ठभूमि और इसके साथ जुडी विभिन्न भ्रांतियों को भी इसमें विस्तार से स्पष्ट किया गया है।
शिव तथा शिवलिंग पूजन की चर्चा वाल्मीकि रामायण में भी की गई है। रावण पक्का शिव भक्त था और इसलिए उसके प्रसंग में वाल्मीकि रामायण के उत्तरकांड में कहा गया है कि शिव भक्त रावण जहां-जहां जाता है, वहां स्वर्णलिंग भी जाता है, जिसे बालू की वेदी पर प्रतिष्ठित कर वह विधिवत पूजन करता है और लिंग के सामने नृत्य करता है। रामायण के उपरांत तो शिव साहित्य की बाढ़ सी आ गई। राम और कृष्ण के बाद सर्वाधिक साहित्य सृजन शिव पर ही हुआ। महाभारत के अनुशासन पर्व में शिव से संबंधित अनेक कथाओं और उनके हजार नामों की चर्चा है। तंत्रग्रंथ और स्मृतियों में भी शिव संबंधी उल्लेख काफी अधिक है। तंत्रों में शिव के माध्यम से विभिन्न प्रकार के ज्ञान को उद्घाटित किया गया है। लिंगार्चन तंत्र में लिंग पूजन की अर्चना विधि को स्पष्ट किया गया है। स्मृतियों में भी कर्मकांड संबंधी मामलों में शिव पूजन का उल्लेख हुआ है। श्री नरहरि स्वामकृत ग्रंथ बोधसार में शिव से संबंधित विभिन्न तत्वों का दार्शनिक विवेचन प्रस्तुत किया गया। शिव की दिगंबरता, त्रिनेत्रता, भुजंग भूषणता, श्मशान प्रेम, भस्म और जटाजूट धारण करने की प्रवृत्ति आदि की प्रतीकात्मक व्याख्या करके इस ग्रंथ में शिव के व्यक्तित्व को एक नए सिरे से देखने का प्रयत्न किया गया। शिव से संबंधित साहित्य का प्रसार अत्यधिक व्यापक है। कहीं पर वे आदिदेव के निराकार स्वरूप में प्रकट हुए हैं, कहीं लिंग स्वरूप में और कहीं स्थूल स्वरूप में भी। साहित्य में कहीं उनका योगी स्वरूप उभरा है, कहीं मस्त भोले भंडारी वाला स्वरूप, कहीं नटराज और कलाकार वाला स्वरूप तथा कहीं सत्य के पक्ष में संघर्ष करनेवाले शूरवीर का स्वरूप भी। शिव की कथाएं अनेक हैं और उनसे संबंधित उनके स्वरूप भी अनेक हैं। इससे साहित्य में उनकी छवि भी विविधता को लिए हुए है।
शिवरात्रि और महाशिवरात्रि में अंतर यह है कि प्रत्येक मास के कृष्णपक्ष की चतुर्दशी शिवरात्रि कहलाती है, लेकिन फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी महाशिवरात्रि कही गई है। इस दिन शिवोपासना भक्ति एवं मुक्ति दोनों देनेवाली मानी गई है, क्योंकि इसी दिन ब्रह्मा, विष्णु ने शिवलिंग की पूजा सृष्टि में पहली बार की थी और महाशिवरात्रि के ही दिन भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था इसलिए भगवान शिव ने इस दिन को वरदान दिया था और यह दिन भगवान शिव का बहुत ही प्रिय दिन है।
भगवान शिव अर्धरात्रि में शिवलिंग रूप में प्रकट हुए थे, इसलिए शिवरात्रि व्रत में अर्धरात्रि में रहनेवाली चतुर्दशी ग्रहण करनी चाहिए। कुछ विद्वान प्रदोष व्यापिनी त्रयोदशी विद्धान चतुर्दशी शिवरात्रि व्रत में ग्रहण करते हैं। नारद संहिता में आया है कि जिस तिथि को अर्धरात्रि में फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी हो, उस दिन शिवरात्रि करने से अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है। जिस दिन प्रदोष व अर्धरात्रि में चतुर्दशी हो, वह अति पुण्यदायिनी कही गई है।
माघकृष्ण चतुर्दश्यामादिदेवो महानिशि।
शिवलिंगतयोद्रूत: कोटिसूर्यसमप्रभ।।
ईशान संहिता के अनुसार इस दिन ज्योतिर्लिंग का प्रादुर्भाव हुआ, जिससे शक्तिस्वरूपा पार्वती ने मानवी सृष्टि का मार्ग प्रशस्त किया। फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को ही महाशिवरात्रि मनाने के पीछे कारण है कि इस दिन क्षीण चंद्रमा के माध्यम से पृथ्वी पर अलौकिक लयात्मक शक्तियां आती हैं, जो जीवनीशक्ति में वृद्धि करती हैं। यद्यपि चतुर्दशी का चंद्रमा क्षीण रहता है, लेकिन शिवस्वरूप महामृत्युंजय दिव्यपुंज महाकाल आसुरी शक्तियों का नाश कर देते हैं। मारक या अनिष्ट की आशंका में महामृत्युंजय शिव की आराधना ग्रहयोगों के आधार पर बताई जाती है। बारह राशियां, बारह ज्योतिर्लिंगों की आराधना या दर्शन मात्र से सकारात्मक फलदायिनी हो जाती हैं।
यह काल वसंत ऋतु के वैभव के प्रकाशन का काल है। ऋतु परिवर्तन के साथ मन भी उल्लास व उमंगों से भरा होता है। यही काल कामदेव के विकास का है और कामजनित भावनाओं पर अंकुश भगवद् आराधना से ही संभव हो सकता है। भगवान शिव तो स्वयं काम निहंता हैं, अत: इस समय उनकी आराधना ही सर्वश्रेष्ठ है। शिव आराधना के मूल मंत्र इस प्रकार हैं।
शिव नमस्कार मंत्र
नम: शिव जी को प्रसन्‍न करना है तो इस मंत्र का जाप पूजन से पहले करें।
शम्भवाय च मयोभवाय च नम: शंकराय च मयस्कराय च नम: शिवाय च शिवतराय च।।
ईशान: सर्वविध्यानामीश्वर: सर्वभूतानां ब्रह्माधिपतिमहिर्बह्मणोधपतिर्बम्हा शिवो मे अस्तु सदाशिवोम।।
पंचाक्षरी मंत्र
इस मंत्र का श्रद्धापूर्वक जाप करने से सभी संकटों तथा कष्टों से मुक्ति मिलती है
ॐ नम: शिवाय।
शिव नामावली मंत्र
सोमवार को पूजा करते समय नामावली मंत्रों का जाप करना अधिक फलदायी माना जाता है।
।।श्री शिवाय नम:।।
।।श्री शंकराय नम:।।
।।श्री महेश्वराय नम:।।
।।श्री सांबसदाशिवाय नम:।।
।।श्री रुद्राय नम:।।
।।ॐ पार्वतीपतये नम:।।
।।ॐ नमो नीलकण्ठाय नम:।।
महामृत्युंजय मंत्र
इस मंत्र का जाप नियमित रूप से करने से रोग, दोष तथा सभी संकट समाप्त हो जाते हैं।
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्।।
शिव गायत्री मंत्र
गायत्री मंत्र का जाप करने से पितृ दोष, कालसर्प दोष, राहु-केतु तथा शनि की पीड़ा से मुक्ति मिलती है।
।।ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्र: प्रचोदयात।।
लघु महामृत्युंजय मंत्र
जिन लोगों के लिए महामृत्युंजय मंत्र का जाप करना कठिन होता है, उन्हें लघु महामृत्युंजय मंत्र का जाप करना चाहिए इससे असाध्य रोग भी दूर हो जाते हैं।
ॐ हौं जूं स:।।

(लेखक श्री जेजेटी विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में प्रोफेसर व सुप्रसिद्ध शिक्षाविद् और साहित्यकार हैं।)

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