मुख्यपृष्ठस्तंभसाहित्य शलाका : भारतीय राष्ट्रीय काव्यधारा के पोषक-मैथिली शरण गुप्त

साहित्य शलाका : भारतीय राष्ट्रीय काव्यधारा के पोषक-मैथिली शरण गुप्त

डॉ. दयानंद तिवारी

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त का जन्म ३ अगस्त, १८८६ को चिरगांव जिला झांसी में हुआ था। आप खड़ी बोली के रचनाकार और द्विवेदी युग के प्रमुख हस्ताक्षर रहे हैं। मैथिलीशरण गुप्त जी की प्रमुख रचनाएं साकेत, यशोधरा, द्वापर, पंचवटी, सैरन्ध्री, नहुष, भारत भारती आदि हैं। साकेत महाकाव्य की रचना सन १९३१ में हुई, जिसमें कुल १२ सर्ग हैं। साकेत का अर्थ है- अयोध्या। साकेत का प्राणतत्व लक्ष्मण की अर्धांगिनी उर्मिला को माना गया है। साकेत में सीता जी को, यशोधरा महाकाव्य में यशोधरा जी को संघर्ष, त्याग, बलिदान की प्रतिमूर्ति दिखाया गया है। मैथिलीशरण गुप्त की मृत्यु १२ दिसंबर, १९६४ को हुई थी।
किसी भी राष्ट्र की आत्मा उसकी सभ्यता और संस्कृति में निवास करती है। ईश्वर के प्रति प्रेम और देश के प्रति सम्मान, सद्भाव की भावना को राष्ट्र भावना कहते हैं। मैथिलीशरण गुप्त के संपूर्ण काव्य ग्रंथों में सर्वत्र राष्ट्रीय चेतना परिलक्षित होती है। गुप्त जी की कविता में राष्ट्रप्रेम, राष्ट्र उत्थान, राष्ट्र कल्याण आदि जो भाव छिपे हुए हैं, वे अन्यत्र दुर्लभ हैं। गुप्त जी की प्रथम कृति ‘भारत भारती’ है, जिसमें गुप्त जी ने आत्म गौरव का सम्मान बढ़ाने का प्रयास किया है।
‘भारत-भारती’, मैथिलीशरण गुप्तजी द्वारा स्वदेश प्रेम को दर्शाते हुए वर्तमान और भावी दुर्दशा से उबरने के लिए समाधान खोजने का एक सफल प्रयोग कहा जा सकता है। भारत दर्शन की काव्यात्मक प्रस्तुति ‘भारत-भारती’ निश्चित रूप से किसी शोध से कम नहीं आंकी जा सकती। लेकिन १९१४ में छपी ‘भारत-भारती’ और १९३१ में आई ‘साकेत’ जैसी रचनाएं आज भी उतनी ही सटीक हैं, जितनी उस समय रही होंगी। उनके द्वारा लिखी गयी पंक्तियां किसी के भी दिल में देशप्रेम भर सकती हैं।
‘जो भरा नहीं है भावों से जिसमें बहती रसधार नहीं।
वह हृदय नहीं पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।’
मैथली शरण गुप्त ने कविता का सही अर्थ अपने इस वाक्य में बताया है- ‘केवल मनोरंजन न कवि का कर्म होना चाहिए, उसमें उचित उपदेश का भी मर्म होना चाहिए।’
गुप्त जी राष्ट्रकवि केवल इसलिए नहीं हुए कि देश की आजादी के पहले राष्ट्रीयता की भावना से लिखते रहे। वे देश के कवि बने क्योंकि वह हमारी चेतना, हमारी बातचीत, हमारे आंदोलनों की भाषा बन गए। व्यक्तिगत सत्याग्रह के कारण उन्हें १९४१ में जेल जाना पड़ा। तब तक वह हिंदी के सबसे प्रतिष्ठित कवि बन चुके थे।
‘साकेत’ और ‘पंचवटी’ १९३१ में छपकर आए। साकेत में उर्मिला की कहानी के जरिए गुप्त जी ने उस समय की स्त्रियों की दशा का सटीक चित्रण किया। राम, लक्ष्मण और सीता की कहानी तो हम सुनते ही आए थे, लेकिन यह गुप्त जी थे जो उर्मिला के त्याग के दर्द को सामने लाए। १९३२ में ‘यशोधरा’ का प्रकाशन हुआ। यह भी महिलाओं के प्रति उनकी गहरी संवेदना दिखाता है।
किसी की जाति जन्म-जात नहीं होती। मैथिली शरण गुप्त ने अपनी कविताओं में यह बात स्पष्ट रूप से कही। उन्होंने कहा मनुष्य स्वयं बनाता है। राक्षसी होकर भी (जन्म से) हिडिम्बा स्वयं को मनुष्य जाति में- एक नारी के रूप में- भीम के समक्ष प्रस्तुत करती है और अपने जन्म से ऊपर उठ जाती है। उनकी रचनाएं यही कहती हैं कि-
होकर भी राक्षसी मैं, अंत में तो नारी हूं।
जन्म से मैं जो भी रहूं जाति से तुम्हारी हूं।।
गुप्त जी ने राष्ट्रीय भावना में अपनी मातृभाषा हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने का मार्ग प्रशस्त किया है। इस दृष्टिकोण से आपने कविता ‘नागरी और हिंदी’ लिखी है कि-
एक लिपि एक विस्तार होना योग्य हिंदुस्तान में।
अब आ गई यह बात सब विद्वतजनों के ध्यान में।।
मैथिलीशरण गुप्त की कृति ‘भारत भारती’ ने उन्हें राष्ट्रकवि बना दिया है। यद्यपि यह कविता गुप्त जी की उग्र राष्ट्रीय चेतना का परिचायक बन गई थी, जिसे अंग्रेजों ने जप्त कर लिया था। आपने भारत भारती में वर्तमान परिवेश को लेखनी के माध्यम से बड़े दुख के साथ व्यक्त किया है- गुप्त जी अपने देश के सम्मान में मातृभूमि की रक्षा के लिए प्रथम वंदना करते हैं। मातृभूमि को पूज्य बताते हुए आप लिखते हैं-
जिसको न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है।
वह नर नहीं, नर पशु निरा और मृतक समान है।।
जो जननी का भी सर्वथा थी पालन करती रही।
तू क्यों न हमारी पूज्य हो मातृभूमि मात मही।।
हमारे देश भारत को ‘सोने की चिड़िया’ की संज्ञा दी गई थी, जिसकी महानता का वर्णन करते हुए गुप्त जी ने भारत के प्रति दुख प्रकट करते हुए लिखा है-
सुख का सब साधन है इसमें। भरपूर भरा धन है इसमें।
पर हां! अब योग्य रहे न हमीं। इससे दुख की जड़ आ जमी।।
हमारे समाज को सुधारने के साथ राष्ट्र भावना निर्माण की अभिव्यक्ति भी मैथिलीशरण गुप्त जी ने अपने काव्य में की है। सदाचार के माध्यम से इस पावन भूमि को स्वर्ग बताते हुए कहा है-
बना लो जहां, वहीं स्वर्ग है। स्वयंभूत थोड़ा वहीं स्वर्ग है।।
राष्ट्रकवि गुप्त जी ने अपनी विख्यात कविता ‘भारत भारती’ में भूतकाल, वर्तमान काल और भविष्य काल का वर्णन बड़े मार्मिक ढंग से किया है। जिसमें आम-खास भारतीय नागरिक को प्रेरणादायक और नया संदेश दिया है कि हम सब मिलकर देश की उन्नति के लिए विचार करें-
हम कौन थे? क्या हो गए और क्या होंगे अभी?
आओ विचारें आज मिलकर यह समस्याएं सभी।।
गुप्त जी ने अपनी प्रसिद्ध कृति ‘यशोधरा’ में गौतम बुद्ध की पत्नी यशोधरा के माध्यम से देश प्रेम को व्यक्त करते हुए लिखा है-
मधुर बनाता सब वस्तुओं का नाता है।
भाता वहीं उसको, जहां जो जन्म पाता है।।
द्विवेदी युग के प्रखर कवि मैथिली शरण गुप्त के अंदर अपने देश के प्रति उन्नतिशील राष्ट्रीय भावना कूट-कूट कर भरी हुई थी, जिससे प्रभावित होकर महात्मा गांधी जी ने मैथिलीशरण गुप्त को राष्ट्रकवि की संज्ञा दी है। गुप्त जी की कुछ प्रसिद्ध पंक्तियां इस तरह देखी जा सकती हैं।
 चारुचंद्र की चंचल किरणें, खेल रहीं हैं जल थल में
स्वच्छ चांदनी बिछी हुई है अवनि और अम्बरतल में।
पुलक प्रकट करती है धरती, हरित तृणों की नोकों से
मानो झूम रहे हैं तरु भी, मंद पवन के झोंकों से।।
 सखि, वे मुझसे कहकर जाते,
सखि, वे मुझसे कहकर जाते,
कह, तो क्या मुझको वे अपनी पथ-बाधा ही पाते?
मुझको बहुत उन्होंने माना
फिर भी क्या पूरा पहचाना?
मैंने मुख्य उसी को जाना
जो वे मन में लाते।
सखि, वे मुझसे कहकर जाते।
स्वयं सुसज्जित करके क्षण में,
प्रियतम को, प्राणों के पण में,
हमीं भेज देती हैं रण में –
क्षत्री-धर्म के नाते
सखि, वे मुझसे कहकर जाते।
 विचार लो कि मर्त्य हो न मृत्यु से डरो कभी।
मरो परन्तु यों मरो कि याद जो करें सभी।।
हुई न यों सुमृत्यु तो वृथा मरे वृथा जिये।
नहीं वहीं कि जो जिया न आपके लिए।।
यही पशु–प्रवृत्ति है कि आप आप ही चरे
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।।

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