मुख्यपृष्ठस्तंभसाहित्य शलाका : श्री रामचरित उपाध्याय , राष्ट्रीय काव्यधारा के यशस्वी कवि

साहित्य शलाका : श्री रामचरित उपाध्याय , राष्ट्रीय काव्यधारा के यशस्वी कवि

डॉ. दयानंद तिवारी

 

द्विवेदी युगीन कवियों ने देशभक्ति संबंधित जागरण कविता द्वारा देशप्रेम का भाव पैदा किया है। इस युग की कविता राष्ट्रीय भावनाओं से ओत-प्रोत है। राष्ट्रीय काव्यधारा ने स्वाधीनता आंदोलन को प्रेरित करने, देशवासियों को उनकी गुलामी का अहसास कराने, उनकी निष्क्रियता अकर्मण्यता की मनोवृत्ति को स्पष्ट करने का प्रयास कविता द्वारा किया है। उस समय लोकमान्य की राजनीतिक स्वतंत्रता की मांग और स्वदेशी वस्तु के प्रति प्रेम आदि भावना का विकास कांग्रेस की ओर से किया जा रहा था। साहित्य में भी इसके प्रतिबिंब आए हैं। देश प्रेम कविता का विषय हो गया फिर कविता छोटी हो या प्रबंधात्मक मैथिलीशरण गुप्त का साकेत, अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध का प्रिय प्रकाश, रामचरित उपाध्याय का रामचरित चिंतामणि और सत्यनारायण कविरत्न का भ्रमरगीत आदि रचनाएं हिंदी भाषा के गौरव ग्रंथ होने के साथ-साथ देशभक्ति और अतीत की ज्वलंत विभूतियों के भव्य निर्देशक भी हैं। इसमें वर्तमान भारतीय स्थिति पर करुणा प्रकट की गई है और अतीत को गौरवशाली बताया गया है। इस युग की कविता ने किसी प्रकार की जातिगत, धर्मगत सक्रियता को आश्रय नहीं दिया। संपूर्ण भारत एक है का भाव कविता में आया। इस व्यापक चेतना को पैâलाने में ‘हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई सब आपस में भाई-भाई’ का नारा पैâलाया। जिसमें शिक्षित भारतीय जनता में नव संचार हुआ और वह आजादी के आंदोलन में आत्मोत्सर्ग करने के लिए तत्पर हुआ। नई राजनीतिक चेतना का भाव ब्रिटिश शासन को भी था इसलिए इस काल की पत्रकारिता पर कड़े कानून लागू किए गए। कवि शंकर ने आत्मोत्सर्ग एवं स्वतंत्रता प्राप्ति के संदर्भ में अपनी कविता बलिदान गण में कहा है कि-
देशभक्ति वीरों मरने से निक नहीं डरना होगा
प्राणों का बलिदान देश के बेदी पर करना होगा।।
प्रत्येक कवि देश की हीन-दीन दशा और उसके प्रति जो भाव व्यक्त करता है। मिथ्या दंभ अभिमान को निकालकर देश दशा पर ध्यान देने का आग्रह करता है। राय देवी प्रसाद पूर्ण की कविता आलस, फुट, खुदगर्जी, मिथ्या, कुलीनता आदि अभिशापों पर भी इस युग का कवि दृष्टि डालता है। उसके निराकरण की कामना करता है।
भारत खंड का हाल जरा देखो है कैसा
आलस का जंजाल जरा देखो है कैसा।।
जरा फुट की दशा खोलकर आंखें देखो
खुदगर्जी का नशा खोलकर आंखों देखा।।
है शोखी दौलत की कहीं, बाल का कहीं गुमान है
है खानदान का मद कहीं, कहीं नाम का ध्यान है।।
द्विवेदी युग के कवियों ने देशवासियों को उनकी स्थिति से अवगत कराकर आजादी के लिए संघर्ष करने की प्रेरणा दी। इसलिए उन्होंने कुप्रथाओं, बाह्य आडंबरों, सामाजिक कुरीतियों और देश की दुर्दशा को कविता का विषय बनाया।
श्री रामचरित उपाध्याय इसी युग के कवियों में से एक हैं। आपका जन्म सन् १८७२ में उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले में हुआ था। प्रारंभ में ये ब्रजभाषा में कविता करते थे। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी के प्रोत्साहन से इन्होंने खड़ी बोली में रचना प्रारंभ की और इनकी रचनाएं ‘सरस्वती’ तथा हिंदी की अन्य पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगीं। यह राष्ट्रीय जागरण का युग था इसलिए इन्होंने भी ‘भारत भक्ति’, ‘भव्य भारत’ तथा ‘राष्ट्रभारती’ जैसी युगानुरूप रचनाएं करके राष्ट्रीय जागरण में योगदान दिया।
इन्होंने ‘रामचरित चिंतामणि’ नामक प्रबंध काव्य की भी रचना की। युग की चेतनता से स्पंदित होकर राम के लोकोत्तर रूप का चित्रण न करके मानवीय रूप की प्रतिष्ठा की। इस प्रकार इस काव्य के पौराणिक पात्र अतीत काल के प्राणी न रहकर आधुनिक विचारधारा और विकासोन्मुख जीवन से ओतप्रोत हैं।
इन्होंने सूक्ति एवं नीति के पद्य भी लिखे, जिनका संग्रह ‘सूक्ति मुक्तावली’ नामक पुस्तक में हुआ है। इन्होंने महाभारत की कथा के आधार पर एक महिला उपयोगी उपन्यास ‘देवी द्रौपदी’ की भी रचना की। बहुमुखी साहित्यसेवा के कारण द्विवेदी युग के साहित्यकारों में इनका विशिष्ट स्थान है। आप व्यक्तित्व संस्कृत के अच्छे ज्ञाता थे।
कृतित्व-
‘रामचरित चिंतामणि प्रबंध काव्य, सूक्ति ‘मुक्तावली’ तथा ‘राष्ट्रभारती’, ‘देवदूत’, ‘देवसभा’, ‘विचित्र विवाह’ आदि काव्य।
साहित्यिक विशेषताएं-
विविध छंदों का प्रयोग प्रबंध काव्य में किया है। भाषा की सफाई तथा वाग्वैदग्ध्य है। आपको समझने के लिए आपकी कुछ पंक्तियों को जानना आवाश्यक है।
छत्र लगाये धनरिधर, बिहंसि बजावत वेनु।
बसौ हिये हरि हित-सहित, ग्वाल ग्वालिनि धेनु।।
उर लगियत, परियत पगन, हौं ही करियत कान।
मौन गहौ मानौ कही, मैं न गही पिय मान।।
कीजत इतौ न आतुरी, तजौ चातुरी चाल।
भावत घर रहनो न जौ, क्यौं आवत घर लाल।।
दुरत न करत दुराव कत, अनत बसे जेहि हेत।
नयन नकारे देत हैं, आप नकारे देत।।
केतिकहू सिख दीजियत, मन गहि मान सवैâन।
होत पराये आपने, वा नैनन मिलि नैन।।
तजहु सकुच उर निठुर उठु, अजहु तजी नहीं देहु।
नेक नवाजस करहु तौ, एव नवाजस लेतु।।
प्रन न टरै तव, मम टरैं, प्रान-नाथ ये प्रान।
नभ घेरे आवहिं जलद, कीजे जलद पयान।।
अलि मिस बोलि बुलाय कछु, हा साहस इतराय।
इतै चितै चट चोरि चित, लली चली यह जाय।।
करि न दुराव दुरै न किहुं, देहिं कहे रति रैन।
अलि साने मद बैन ये, ये अलसाने नैन।।
मो तन तकि बतराय कछु, सखि सन सैनन माहिं।
छत से उतरि गई कहूं, चित ते उतरत नाहिं।।
तप बल गरब न कीजिये, बरु करिये तप नाहिं।
गाधि-सुअन लखि मेनका, दौरि गहे गर माहिं।।
दुर्लभ सो नर जगत में, मानव कुल सिंरनेत।
जो बिनु मागे ही रहे, जो बिनु मांगे देत।।
पतिबरता, अरु पुत्रिणी, पाक-प्रवीन पवित्र।
रूपवती पंडित तिया, दुरलभ ‘राम चरित्र’।।
सुख सपनो, दुख दुुगुन नित, आंतर दिन उपवासु।
भोगत नरक सदेह सो, गेह कुनारी जासु।।
नृप, ज्ञानी, तिय प्रौढ़, रस-काव्य, सिखायो अस्व।
चारहुं ते जुग चारिहूं, पैयत सुख सर्वस्व।।
नारी गृह भूखन बसन, नूतन रहे बखान।
दास वैद मंत्री महिप, तंदुल पान पुरान।।
मरन-हरन सुनि होय जो, पंडित हू हिय खेद।
तौ ज्ञानी अरु मूढ़ में, कछुक रह्यौ नहि भेद।।
गुरु अंत्यज, ब्राह्मण निपढ़, बूढ़ गृही, यति ज्वान।
रसिक-अधन, तपसी धनी, षट दुख हेतु समान।।
नहिं कोऊ ऐसो कहूं, जाको रिपु जग माहिं।
मीन कहा केहिको दुखद, हने जाहिं जल माहिं।।
श्री रामचरित उपाध्याय हिंदी काव्यधारा के यशस्वी कवि के रूप में चर्चित रहे हैं आपका साहित्य स्वाधीनता आंदोलन में आंदोलनकारियों के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता रहा है। आज भी आपकी कविताएं देश प्रेम के भावजागृत करने का कार्य कर रही हैं।

(लेखक श्री जेजेटी विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में प्रोफेसर व सुप्रसिद्ध शिक्षाविद् और साहित्यकार हैं।)

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