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जीवन जीना सरल नहीं

गीत चले हृदय के तट से
सुर चले अधरों पे आके
अब कौन सुनाए राग प्रेम का,
पीड़ा जो गान प्रेम का…
है कहाँ मेरा प्रियें,
दे गया जो मुझे उलझन
है जीवन जीना, इतना सरल नहीं
जितना है इसमें, गरल कहीं

कितने रोके आँसू नैन में
कितने व्याकुल हुए ये मन
क्या जाने वो, परदेस में जाकर
बेरंग हुए जो मेरे तन..

उसका अब कोई संदेश नहीं
कैसे बीते दिन ऐसे दुःख में
कैसे रह रही अकेली मैं..
वो जानता नहीं कैसी हूँ…

मनोज कुमार गोण्डा उत्तर प्रदेश

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