खोया हुआ बचपन

शहर की गगनचुम्बी इमारतों से
झांकता हुआ एक बच्चा
देखना चाहता है
उगता हुआ सूरज।
ये बड़ी बड़ी इमारतें
ढक रखी हैं
आसमान को,
कई दिनों तक
नहीं दिखता है
पूरब का क्षितिज।
तरसती हैं आंखें
देखने के लिए
प्रात के सूरज की
लालिमा लिए
मधुर मुस्कान।
मैं तो कहूंगा गांव चलो
मैं दिखाऊंगा तुम्हें
सुबह की स्वर्णिम आभा
जिसे देख कर तुम
जी लोगे अपना
खोया हुआ बचपन।।

कवि योगेन्द्र पाण्डेय
सलेमपुर, देवरिया

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