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बेशुमार ख़्वाहिशें

ख़्वाब एक ‘अदद ज़िंदगी’ के बिखरते गए
‘उम्र की दहलीज’  से पांव मेरे सरकते गए।

ज़माना हमें, ना हम ज़माने को समझ  सके
‘फासले नासमझियों के’ आए दिन बढ़ते गए।

हक़ीक़त बदलती नहीं, मगर ये भी सच है कि
यहॉं ‘रिश्तों के चेहरे ‘ अक्सर बदलते गए।

कितने ‘मासूम ‘थे, या हम थे ‘नादां’  इतने
जिस सांचे में ढाला ‘हुज़ूर ‘ हम ढलते गए।

वो रास्ता हमारा नहीं  ‘जनाब’ हमें मालूम था
फिर भी जाने क्यों, उसी डगर हम चलते  गए।

“ख्वाहिशें बेशुमार” थीं अपनी भी ‘त्रिलोचन’
ज़िंदगी की जुस्तजू ‘ में ,’अरमां ‘ उलझते गए।

त्रिलोचन सिंह’अरोरा’  • नई मुंबई  •

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