मुख्यपृष्ठनमस्ते सामनाखुद गरीबी में दिन काटकर बेटों को बनाया कामयाब

खुद गरीबी में दिन काटकर बेटों को बनाया कामयाब

अशोक तिवारी

मेहनत से इंसान अपनी किस्मत किस तरह बदल सकता है, इसका जीता- जागता प्रमाण कुर्ला के हलाव पुल के हरीश नारायण गुजेटी ने कर दिखाया है। कुर्ला के निवासी हरीश नारायण गुजेटी आंध्र प्रदेश के तेलंगाना प्रांत के कुरनूल जिले के एक छोटे से गांव से करीब ४५ वर्ष पहले मुंबई आए थे। शुरुआत के दिनों में उन्होंने होटल में काम कर अपना जीवन यापन किया। कुछ वर्षों तक छोटी-मोटी नौकरी करने के बाद जब परिवार का आर्थिक संकट दूर नहीं हुआ तो हरीश गुजेटी ने प्राइवेट नौकरी करते हुए खुद को मजबूत किया। अपने कुछ दोस्तों की मदद से उन्होंने ५०० रुपए जमा किया और इंटीरियर डिजाइनिंग का काम शुरू किया। कुछ दिनों तक धंधा ठीक-ठाक चला लेकिन नौकरी की वजह से हरीश गुजेटी व्यापार को समय नहीं दे पा रहे थे, जिसकी वजह से व्यापार में नुकसान हो गया। इसके बाद उन्होंने प्राइवेट नौकरी छोड़ दी और पूरा ध्यान बिजनेस पर केंद्रित किया। कुछ बरसों में बिजनेस चल पड़ा। भगवान शिव के अनन्य उपासक हरीश नारायण गुजेटी बताते हैं कि ईश्वर की कृपा से उन्हें जुड़वां पुत्र प्राप्त हुए, जिन्हें अमिताभ बच्चन की एक फिल्म से प्रेरित होकर उन्होंने बच्चों का नाम अमर और प्रेम रखा। धीरे-धीरे बच्चों को एमएससी आईटी की डिग्री दिलवाई, जिसके बाद बड़ा बेटा अमर यूनाइटेड किंगडम के लंदन शहर में एक कंपनी में मैनेजर बन गया है। कभी एक-एक पाई के लिए मोहताज हरीश नारायण गुजेटी का दूसरा बेटा मुंबई की एक आईटी कंपनी में सीनियर मैनेजर के पद पर कार्यरत है। बड़ा बेटा अमर अब लंदन में ही बस गया है। अब वहां पर उसने अपनी मां और बहन को भी बुला लिया है। हरीश नारायण गुजेटी कहते हैं कि उनका बेटा उन्हें भी लंदन में बसने की जिद कर रहा है लेकिन हिंदुस्थान की माटी से प्यार है इसलिए वे विदेश नहीं जाना चाहते हैं। आज भी उन्होंने अपना व्यापार बंद नहीं किया है। कुर्ला के हलाव पुल क्षेत्र में हरीश नारायण गुजेटी नशे की गिरफ्त में फंस चुके युवाओं को बाहर निकालने के लिए एनजीओ के माध्यम से शिविर आयोजित करते हैं। इसके अलावा वह क्षेत्र में गरीब और विधवा महिलाओं की बेटियों की शादी करने के लिए भी लोगों से चंदा मांग कर उनकी मदद करते हैं। हरीश बताते हैं कि उनकी पहल पर अभी तक सैकड़ों युवाओं ने नशे को बाय-बाय कर दिया है और समाज की मुख्य धारा में लौट चुके हैं।

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