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मध्यांतर : महाराजा श्रीमंत की छवि तोड़ने में लगे सिंधिया…वाल्मीकि समाज की सफाईकर्मी के छुए पैर दिया सिंहासन

प्रमोद भार्गव। आज कल मध्यप्रदेश की राजनीति में केंद्रीय नागरिक एवं उड्डयन मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया अपनी पारंपरिक ‘महाराजा-श्रीमंत’ की छवि तोड़ने की कोशिश में लगे हैं। एक-एक करके वे उन सब मिथकों को तोड़ रहे हैं, जो उनकी दादी विजयाराजे सिंधिया, पिता माधवराव सिंधिया एवं बुआ वसुंधरा राजे एवं यशोधरा राजे सिंधिया नहीं तोड़ पाईं। हाल ही में उन्होंने ग्वालियर में आयोजित स्वच्छता अभियान कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए अनूठा काम कर दिखाया। इस आयोजन में सिंधिया मुख्य अतिथि थे और उन्हें महिला एवं पुरुष सफाईकर्मियों को शॉल एवं श्रीफल उड़ाकर सम्मान करना था। सिंधिया जब आयोजन स्थल पर पहुंचे, तब उन्हें सरस्वती माता की प्रतिमा की अर्चना के लिए बुलाया गया। सिंधिया ने श्रीमती बबीता वाल्मीकि को अपने साथ लिया और प्रतिमा की पूजा उन्हीं से कराई। बबीता ने प्रफुल्लित होकर प्रतिमा को माला पहनाई, दीपक प्रज्वलित किया। इसके बाद बबीता जब अपनी जगह बैठने को चलने लगीं, तो एकाएक सिंधिया ने उनके पैर छुए और उन्हें बाजू पकड़कर मंच पर अपने पास वाली विशिष्ट कुर्सी पर बिठा दिया। साथ ही सिंधिया बोले, ‘सफाईकर्मी हमारे देवता हैं और देवताओं के चरण छुए और धोए जाते हैं।’ गदगद बबीता ने सिंधिया को मुख्यमंत्री बनने का आशीर्वाद दिया। बबीता के पहले जैन ऋषि भी उन्हें मुख्यमंत्री बनने का आशीर्वचन दे चुके हैं।
सिंधिया की ही नहीं उनके परिवार की राजनीतिक संस्कृति में यह बड़ा बदलाव है, जिससे भाजपा ही नहीं कांग्रेस के राजनीतिक हलकों में हलचल मच गई है। हालांकि भाजपा में दलितों के पैर धोकर छूना कोई नई बात नहीं रह गई है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एजेंडे में यह शामिल है। छत्तीसगढ़ के भाजपा नेता दिलीप सिंह जूदेव ने वनवासियों और दलितों के पैर धोने व छूने की इस परंपरा की शुरुआत की थी। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान एवं भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री वैâलाश विजयवर्गीय वनवासी और वाल्मीकि समाज की कन्याओं एवं महिलाओं के कई मर्तबा पैर धो व छू चुके हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी वाराणसी में सफाईकर्मियों के पैर धोए व छुए हैं। अतएव दलित समाज को भाजपा से जोड़ने का यह राजनीतिक एजेंडा भी है, जिसे सुनियोजित ढंग से आगे बढ़ाया जा रहा है।
भाजपा के दलित नेता विजय सोनकर शास्त्री अपनी किताब ‘हिंदू वाल्मीकि जाति‘ में यह दावा कर चुके हैं कि देश के भीतर दलितों की अनेक जातियां ब्राह्मण एवं क्षत्रिय समाजों से थीं। आक्रामणकारी मुस्लिमों की वजह से इन्हें दलित सफाईकर्मी बनने को मजबूर होना पड़ा। संघ प्रमुख मोहन भागवत ने इस पुस्तक का विमोचन किया था। दरअसल सनातन हिंदू धर्म को बचाए रखने के लिए इन जातियों को मुस्लिम शासकों एवं उनकी बेगमों के मल-मूत्र ढोने को विवश होना पड़ा था। मैला ढोने की कुप्रथा की शुरुआत भी यहीं से हुई। पिछले डेढ़ हजार साल के भीतर मुस्लिमों ने पराजित व हिरासत में लिए गए हिंदूओं को या तो मर जाने या धर्म बदलकर मुस्लिम बन जाने या फिर मैला ढोने को विवश किया। इनमें क्षत्रिय और ब्राह्मण जातियों के लोग शामिल थे। वाल्मीकि बनाने का यह काम
कुतुबुद्दीन ऐबक और लोदी के समय वर्ष १२ सौ से १५ सौ के बीच सबसे ज्यादा हुआ। इसी समय से ‘मार-मार कर …’ बनाने की कहावत प्रचलन में आई। डॉ. भीमराव आंबेडकर, डॉ. तुलसीराम और प्रसिद्ध उपन्यासकार अमृतलाल नागर ने अपने उपन्यास ‘मानस का हंस’ में किया है।
दरअसल सिंधिया जब कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुए हैं, तब ऐसी अटकलें लगाई गर्इं थीं कि सिंधिया जिस सामंती संस्कृति से आए हैं, उसके चलते भाजपा और संघ से सामंजस्य नहीं बैठा पाएंगे। लेकिन इन अटकलों पर विराम लगता दिखाई दे रहा है और लगातार उनका कद, कद्दावर होता जा रहा है। सिंधिया की इस हैसियत के बढ़ते जाने से दाएं-बाएं जो प्रमुख नेता मुख्यमंत्री बनने की अंदरूनी कोशिशों में थे, वे बगलें झांकते दिख रहे हैं। अब मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के बाद प्रमुख चेहरों में जो प्रमुख नाम हैं, उनमें केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर, प्रदेश भाजपा अध्यक्ष वीडी शर्मा और राज्य के गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा के नाम शेष रह गए हैं। वैâलाश विजयवर्गीय और गोपाल भार्गव हाशिए पर चले गए हैं। प्रदेश की राजनीति इसलिए भी गरमा गई है, क्योंकि पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने एलान कर दिया है कि यदि कांग्रेस कार्यकर्ता एकजुट होकर चुनाव नहीं लड़े तो २०२३ का चुनाव कांग्रेस के लिए आखिरी चुनाव होगा। इस कथन से यह भाव लक्षित होता है कि भाजपा प्रदेश में मजबूत स्थिति में है और सिंधिया के भाजपा में शामिल होने के बाद सिंधिया समर्थक विधायकों ने जो बगावत दिखाई, उसके परिणाम के चलते कमलनाथ को मुख्यमंत्री पद से हाथ धोना पड़ गया था। तब से कांग्रेस में कोई उभार भी देखने में नहीं आ रहा है। अलबत्ता ग्वालियर-अंचल की ३४ सीटों पर भाजपा ही मजबूती दिखाई दे रही है। इधर कमलनाथ को कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाने की मुहिम भी तेज हो गई है। पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अरुण यादव ने सोनिया गांधी से मिलकर अपनी सक्रियता बढ़ा दी है। अरुण से कदमताल मिलाने को अब प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के पुत्र अजय सिंह भी आगे बढ़ रहे हैं।
दरअसल सिंधिया का कद बीते दो साल में लगातार बढ़ रहा है। उन्हें इस दौरान तीन मर्तबा विभिन्न पदों से अलंकृत किया जा चुका है। पहले वे राज्यसभा सदस्य बने। फिर केंद्रीय मंत्री बन गए। भाजपा ने उन्हें ४ अक्टूबर २०२१ को राष्ट्रीय कार्य समिति में भी जगह दे दी थी। साफ है, सिंधिया का दल और संगठन दोनों में ही पकड़ मजबूत होती जा रही है। सिंधिया भी पाला बदलने के बाद विनम्र होने के साथ उन मिथकों को तोड़ रहे हैं, जो सिंधिया परिवार की प्रकृति में रोड़े अटकाने वाले रहे हैं। सिंधिया नागपुर जाकर सरसंघचालक मोहन भागवत से मिल आए। सिंधिया ने इससे भी बड़ा काम यह कर दिखाया कि वे एक दिन अचानक १८५७ की वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई की ग्वालियर स्थित समाधि स्थल पर श्रद्धांजलि अर्पित कर आए। जबकि उनके पूर्व इस समाधि पर जाने से उनके परिजन झिझकते रहे हैं। एक तरह से यह उपस्थिति परिवार की भूलों का प्रायश्चित भी माना जा रहा है। साफ है, सिंधिया भविष्य में बड़ी जगह बनाने के लिए हर तरह के समझौते करने को तत्पर दिखाई देने लगे हैं। इसीलिए वे ग्वालियर-अंचल के उन सब नेताओं के घर हो आए, जो ज्योतिरादित्य को कोसने में लगे रहते थे। हालांकि ये सब नेता अंदर से अपने वर्चस्व को लेकर चिंतित हैं।
प्रदेश मंत्रिमंडल में सिंधिया समर्थक १९ विधायकों में से ११ प्रदेश सरकार में महत्वपूर्ण मंत्री पदों पर काबिज हैं। हाल ही में सिंधिया ने श्योपुर के पूर्व विधायक बृजराज सिंह चौहान को भाजपा का प्रदेश उपाध्यक्ष बनवा देने में कामयाबी हासिल की है। यही नहीं सिंधिया ने उपचुनाव में हारे हुए विधायकों को भी निगम एवं मंडलों का अध्यक्ष बनवाकर उनकी हैसियत में चार चांद लगा दिए हैं। यही वजह है कि प्रदेश राजनीति में सिंधिया के बढ़ते राजनीतिक प्रभाव को नजरअंदाज करना मुश्किल हो रहा है। अलबत्ता सिंधिया की राजनीतिक संस्कृति के साथ दुविधा यह पेश आ रही है कि वे उन्हीं लोगों को पदों पर मनोनीत कर रहे हैं, जो कांग्रेस के समय से उनके निष्ठावान अनुयायी रहे हैं। भाजपा में आने के बाद से लेकर अब तक एक भी मूल भाजपाई नेता को वे स्वीकार नहीं पाए हैं। इस कारण उनका कार्यकर्ताओं के संख्याबल के रूप में दायरा नहीं बढ़ रहा है, बल्कि एकतरफा मनोनयन से भाजपाइयों में कसक बढ़ रही है, जो चुनाव के समय भितरघात की स्थिति उत्पन्न कर सकती है। यह स्थिति तब और बढ़ जाएगी, जब सिंधिया केवल अपने साथ आए कांग्रेसी, भाजपाइयों के लिए विधानसभा टिकट लेने की जिद करेंगे।
(लेखक साहित्यकार एवं वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

(उपरोक्त आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। अखबार इससे सहमत हो यह जरूरी नहीं है।)

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