मुख्यपृष्ठस्तंभमध्यांतर : मध्य प्रदेश की राजनीति गरमाई, भाजपाइयों में शुरू है लड़ाई!

मध्यांतर : मध्य प्रदेश की राजनीति गरमाई, भाजपाइयों में शुरू है लड़ाई!

प्रमोद भार्गव: ग्वालियर संभाग क्रिकेट एसोसिएशन की बहुप्रतीक्षित कार्यकारिणी के गठन के बाद मध्य प्रदेश में भाजपा खेमे की राजनीति गरमा गई है। इस संगठन का उपाध्यक्ष केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के पुत्र महाआर्यमन सिंधिया को बना दिया गया है। सिंधिया परिवार के इस युवराज के लिए क्रिकेट के जरिए सार्वजनिक एवं राजनीतिक जीवन में यह पहली पारी की शुरुआत सुनियोजित ढंग से कर दी गई है। याद रहे माधवराव सिंधिया और उनके पुत्र ज्योतिरादित्य भी क्रिकेट के बहाने सार्वजनिक जीवन में आए थे। इसी क्रम में वरिष्ठ क्रिकेटर संजय आहूजा को मानसेवी सचिव का महत्वपूर्ण दायित्व सौंपा गया है। अध्यक्ष सेवानिवृत्त आईएएस प्रशांत मेहता होंगे। मेहता माधवराव के समय से ही सिंधिया परिवार के विश्वासपात्र सहयोगी रहे हैं। उसी समय से जीडीसीए सिंधिया परिवार की एक तरह से जेबी संस्था रही है।
लंबे समय से इस कार्यकारिणी के गठन का इंतजार क्रिकेट प्रेमियों को था। दो साल पहले मानसेवी सचिव पद से रवि पाटनकर मुक्त हो गए थे। इस पद को लेकर पूर्व से ही अंदाजा लगाया जा रहा था कि ज्योतिरादित्य की मर्जी के अनुरूप कार्यकारिणी का गठन होगा, जो सही निकला। इस गठन के ठीक पहले ज्योतिरादित्य अपने परिवार के साथ दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिले थे, जिसकी तस्वीर मीडिया में बड़ी खबर बनी थी। एक सप्ताह के भीतर घटी इन दोनों घटनाओं ने तमाम आशंकाओं और उम्मीदों को जन्म दे दिया है। खासतौर से भाजपा के वे कद्दावर नेता सकते में हैं, जो अपने पुत्रों को मध्य प्रदेश की राजनीति का उत्तराधिकारी बनाना चाहते हैं। इस कतार में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के पुत्र भी खड़े हैं, जो एकाएक महाआर्यमन की राजनीतिक पटल पर उपस्थिति से ठिठक गए हैं।
यदि ज्योतिरादित्य चाहते तो महाआर्यमन को भाजपा के केंद्रीय या प्रांतीय संगठन में बड़ा पद दिला सकते थे। परंतु उन्होंने फिलहाल राजनैतिक पद की जगह पुत्र को क्रिकेट के संगठन से जोड़कर नेतृत्व दक्षता हासिल करने के लिए आगे बढ़ा दिया है। ताकि वह इस पारी से अनुभव लेकर राजनीति के मैदान में कुशलता के साथ उतर सकें। हालांकि महाआर्यमन ज्योतिरादित्य के चुनावी प्रचार में बढ़-चढ़कर भागीदारी करते रहे हैं। ग्रामों में नुक्कड़ सभाओं के साथ-साथ कार्यकर्ताओं को चुनावी व्यूह रचना का पाठ पढ़ाते रहे हैं। लेकिन उनका कार्य अब तक चुनाव प्रचार तक ही सीमित रहा है। किंतु अब लगता है ज्योतिरादित्य ने बेटे को बाकायदा राजनीति में उतारने के लिए सुनियोजित पहल कर दी है। इसकी पहली कड़ी में ज्योतिरादित्य अपने समूचे परिवार समेत नरेंद्र मोदी से मिले। इसमें उनकी मां माधवीराजे, पत्नी प्रियदर्शनी राजे और पुत्र महाआर्यमन शामिल थे। महाआर्यमन को मोदी से कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा किया गया, जिससे उनकी अलग पहचान बने और राजनीति के हल्कों में संदेश जाए कि सिंधिया परिवार की चौथी पीढ़ी ने राजनीति में कदम आगे बढ़ा दिया है। मालूम हो कि आजादी के बाद ज्योतिरादित्य की दादी विजयाराजे सिंधिया ने पहले कांग्रेस से और फिर जनसंघ व भाजपा में अहम राजनेत्री की भूमिका निभाई थी। संघ और भाजपा को खड़ा करने में उनका योगदान रहा है। अयोध्या मंदिर आंदोलन में भी विजयाराजे की रेखांकित करनेवाली भूमिका रही है। इसीलिए अटलबिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और नरेंद्र मोदी उन्हें अपना आदर्श मानते रहे हैं। इकलौते पुत्र माधवराव को जनसंघ के माध्यम से विजयाराजे राजनीति में लाई थीं। गुना-शिवपुरी लोकसभा सीट से १९७१ में जनसंघ के उम्मीदवार रहते हुए ही माधवराव पहली बार सांसद बने थे। किंतु आपातकाल के बाद वे इंदिरा गांधी से प्रभावित होकर कांग्रेस में चले गए। माधवराव की इंदिरा गांधी से पहली मुलाकात प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने कराई थी। दरअसल, दिग्विजय इंदिरा जी की आंख का तारा इसलिए बन गए थे, क्योंकि ग्वालियर-चंबल संभाग की ३४ विधानसभा सीटों में से केवल वही कांग्रेस की टिकट पर जीत पाए थे। इंदिरा गांधी १९८० में जब प्रधानमंत्री बनीं, तब उन्होंने दिग्विजय सिंह की हैसियत को चार चांद लगाते हुए उनके विधानसभा क्षेत्र राघौगढ़ में खाद कारखाना खोल दिया था। हालांकि उनकी कालांतर में माधवराव से नहीं पटी। ये संबंध तब और कटु हो गए, जब १९९४ में माधवराव ने दिग्विजय की जगह मोतीलाल बोरा को मुख्यमंत्री बना देने की खुली पैरवी की थी। कटुता की यह विरासत ज्योतिरादित्य के साथ भी कायम रही। ज्योतिरादित्य के कांग्रेस से बगावत का एक बड़ा कारण यह कटुता भी मानी जाती है।
खैर, ज्योतिरादित्य ने अपने पुत्र को प्रधानमंत्री से मुलाकात कराकर राष्ट्रीय फलक पर जो पहचान दी है, उससे मध्य प्रदेश की राजनीति में हलचल पैदा हो गई है। इसे महाआर्यमन का राजनीति में शुभारंभ माना जा रहा है। इस घटना के ठीक बाद महाआर्यमन को जीडीसीए का उपाध्यक्ष बना दिया गया। ऐसा माना जा रहा है कि इस सुनियोजित घटनाक्रम के पीछे गृहमंत्री अमित शाह का दिमाग है। कुछ समय से अमित शाह ने अपने पुत्र जय शाह को ज्योतिरादित्य का साथी बना दिया है। लिहाजा, माना जा रहा है कि ज्योतिरादित्य अमित शाह के कहने पर ही एक-एक कदम आगे बढ़ रहे हैं। सोचनेवाली बात यह है कि नरेंद्र मोदी सिंधिया परिवार के आगे लचीला रुख अपनाते क्यों दिख रहे हैं? फिलहाल, राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे विधायक और उनके पुत्र दुष्यंत सिंह लोकसभा सांसद हैं। मध्य प्रदेश में यशोधरा राजे सिंधिया खेल एवं युवा कल्याण मंत्री हैं और ज्योतिरादित्य मध्य प्रदेश के ही कोटे से राज्यसभा सदस्य होने के साथ केंद्रीय नागरिक एवं उड्डयन मंत्री हैं और अब आर्यमन की लॉन्चिंग से ये अटकलें बढ़ रही हैं कि उन्हें २०२३ में मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में विधायक बनाकर उपमुख्यमंत्री तक बनाया जा सकता है। या फिर २०२४ में वे ग्वालियर अथवा गुना लोकसभा सीट से उम्मीदवार होंगे। इन अटकलों से प्रदेश की राजनीति का पारा गरमा गया है।
हर भाजपा नेता अपनी राजनीति चमकाने के लिए दूसरे भाजपा नेता की कटिंग करने से नहीं चूक रहा है। दरअसल, मुख्यमंत्री शिवराज सिंह स्वयं अपने पुत्रों कार्तिकेय और कुणाल को आगे बढ़ा रहे हैं। कार्तिकेय तो पूरे मध्यप्रदेश में उन इलाकों में सक्रिय हैं, जहां-जहां किरार-धाकड़ समाज की बहुलता है। शिवराज इसी समाज से आते हैं और प्रदेश में इनकी बड़ी आबादी है। केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर भी अपने पुत्र देवेंद्र और प्रबल प्रताप सिंह को आगे बढ़ा रहे हैं। प्रदेश के गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा के पुत्र सक्रिय राजनीति में उतर चुके हैं। नरोत्तम के अग्रज आनंद मिश्रा के पुत्र डॉ. विवेक मिश्रा ने भी ग्वालियर-संभाग के भारतीय युवा मोर्चा ग्रामीण का प्रभावी बनकर गांव-गांव दखल देना शुरू कर दिया है। प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष रहे प्रभात झा के पुत्र तुष्मुल झा भी विधानसभा टिकट लेने की होड़ में लगे हैं। वैâलाश विजयवर्गीय के पुत्र आकाश विजयवर्गीय पहले से ही इंदौर से विधायक हैं। गोपाल भार्गव अपने पुत्र अभिषेक भार्गव को आगे बढ़ा रहे हैं।
भाजपा की सत्तारूढ़ रही पहली पीढ़ी के नेताओं के पुत्र राजनीति में स्थापित हो चुके हैं। इनमें मुख्यमंत्री रहे सुंदरलाल पटवा के पुत्र सुरेंद्र पटवा, वैâलाश जोशी के पुत्र दीपक जोशी का पुनर्वास हो चुका है। कैलाश सारंग के पुत्र विश्वास सारंग भी मंत्री हैं। मसलन भाजपा वंश या परिवारवाद का विरोध भले ही मंचों से करती रही हो, बावजूद भाजपा में वंशवृक्ष की लंबी शृंखला है। यदि महाआर्यमन राजनीति में विधायक और सांसद बनते हैं, तो यही माना जाएगा कि भाजपा की कथनी और करनी में अंतर है। हालांकि कहे कोई कुछ भी भारत की आत्मा अंतत: जाति और धर्म की राजनीति में ही बसती है। इन्हीं सब मुद्दों को लेकर मध्य प्रदेश में आजकल भाजपा की आपसी लड़ाई जोरों पर है। हर भाजपाई खेमा अपनी राजनीति चमकाने की फिराक में है।
(लेखक, वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार हैं।)
(उपरोक्त आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। अखबार इससे सहमत हो यह जरूरी नहीं है।)

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