मुख्यपृष्ठस्तंभमध्यांतर: राम-पथ-गमन में शिवराज से आगे निकल गए बघेल!

मध्यांतर: राम-पथ-गमन में शिवराज से आगे निकल गए बघेल!

प्रमोद भार्गव/शिवपुरी (मध्य प्रदेश)। मध्यप्रदेश सरकार के मुख्यमंत्रीr शिवराज सिंह चौहान ने प्रदेश की सीमा में भगवान राम के वनगमन पथ को विकसित करने का ढिंढोरा तो खूब पीटा, लेकिन परिणाम ढाक के तीन पात रहा। इधर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने बिना कोई हो-हल्ला किए राम की मां कौशल्या मंदिर चंद्रखुरी का जीर्णोद्धार और सौंदर्यीकरण करके जनता को लोकार्पित भी कर दिया। इसके कायाकल्प की शुरुआत वर्ष २०१९ में भूमिपूजन करके राम वनगमन पर्यटन परिपथ के निर्माण की नींव रखी थी। इसी का परिणाम था कि रामनवमी के अवसर पर बड़ी संख्या में धार्मिक श्रद्धालुओं की संख्या में उम्मीद से ज्यादा वृद्धि देखने में आई। दरअसल, छत्तीसगढ़ की परंपरा में प्रभु श्रीराम रचे-बसे हुए हैं। छत्तीसगढ़ की मनोरम भूमि राम को भांजे के रूप में पूजती है। राजधानी रायपुर से मात्र २७ किमी की दूरी पर चंद्रखुरी (आरंग) स्थित है। यही स्थल माता कौशल्या की जन्मभूमि और राम का ननिहाल है। इसे ही वाल्मीकि रामायण में दक्षिण कोसल कहा गया है। राम ने अयोध्या से चलकर रामेश्वरम की वनवास के कालखंड में यात्रा की थी और रावण द्वारा सीता हरण के बाद इसी दक्षिण क्षेत्र के वनवासियों को एकत्रित करके राक्षसराज रावण को पराजित किया था। राम की उत्तर से जोड़नेवाली इसी यात्रा को सांस्कृतिक यात्रा भी कहा जाता है। छत्तीसगढ़ के ७५ स्थलों से राम ने भ्रमण किया था और ६५ स्थलों पर रात्रि विश्राम किया था। इन सब स्थलों को विकसित करने का संकल्प भूपेश बघेल ने लिया है। जबकि मध्यप्रदेश सरकार पथ निर्माण को चिह्नित करने के लिए शोध समितियां बनाकर टालती रही है।
मध्य प्रदेश की कमलनाथ सरकार ने जरूर २०१९ में राम वनगमन पथ बनाने का संकल्प लेते हुए २२ करोड़ रुपए के बजट का प्रावधान किया था। यह प्रस्ताव अध्यात्म विभाग ने तैयार किया था। चित्रकूट से अमरकंटक तक बनाए जाने वाले इस मार्ग पर प्राचीन समय की वास्तुकला को पुनर्जीवित करने के साथ पुराने समय की ही शहरी व्यवस्था को बाहल करना था। अतएव इस मार्ग पर जो प्राचीन नगर स्थित हैं, उनकी ऐतिहासिक विरासत का पुनरुद्धार किया जाना था। इस रास्ते में चित्रकूट, पन्ना, बुधवारा, रामघाट, राम मंदिर तालाब, मंडला, शडहोल, डिंडौरी और अमरकंटक शामिल हैं। इन सभी स्थलों में एक ही तरह के विकास कार्य विकसित किए जाएंगे। श्रद्धालुओं के लिए पैदल पथ, धर्मशालाएं, यात्री निवास, बांस की झोपड़ियां आदि बनाया जाना प्रस्तावित था। इस दृष्टि से २२ करोड़ रुपए ऊंट के मुंह में जीरे के समान थे। कांग्रेस ने अपने चुनावी वचन-पत्र में भाजपा के मुद्दों को हथियाने की दृष्टि से यह कठिन काम भी पत्र में शामिल कर लिया था लेकिन इस काम को जितना विस्तार दिया गया था, उतना काम एकाएक आसान नहीं था। प्राचीन भवनों को तत्कालीन स्वरूप देना बड़ा कठिन काम है। गोया, इस संकल्प को पूरा करने के लिए करोड़ों रुपए की जरूरत तो थी ही, संकल्प को साकार रूप देने में लंबे समय की भी जरूरत थी। ऐसे में ज्योतिरादित्य सिंधिया ने पलटी मारकर कमलनाथ सरकार को ही औंधे मुंह गिरा दिया। नतीजतन, सिर मुड़ाते ही ओले पड़ गए। बावजूद कमलनाथ की मंशा अच्छी थी। कमलनाथ नरम हिंदुत्व की धारा को अपनाते हुए राम १४ वर्ष के वनवास के दौरान पत्नी सीता और अनुज लक्ष्मण के साथ जिन मार्गों से गुजरे थे, उस ‘राम-वन-गमन-पथ’ को नई पहचान देने के इच्छुक थे।
चौदह साल पहले शिवराज सिंह चौहान सरकार ने ‘राम-वन-गमन-पथ’ विकसित करने की घोषणा की थी। साथ ही यह भी दावा किया था कि भगवान राम जिन स्थलों पर ठहरे थे अथवा आततायियों से युद्ध लड़ा था, उन स्थलोें को भी रामायण-काल के अनुरूप आकार दिया जाएगा। २००७ में की गई इस घोषणा पर न तो उन्होंने २०१८ तक कोई काम जमीन पर उतारा और न ही २०२० में कमलनाथ सरकार को अपदस्थ करने के बाद इस योजना को कोई गति दी। जबकि २००८ और २०१३ के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने इस मुद्दे को भुनाते हुए कांग्रेस को राम विरोधी सिद्ध करने की चाल चली थी। इस मुद्दे को भुनाने में भाजपा इसलिए भी सफल हुई क्योंकि २०१३ में समुद्र में निर्माणधीन ‘जल-डमरू-मध्य-मार्ग’ बनाने के परिप्रेक्ष्य में केंद्र की मनमोहन सिंह सरकार ने यह शपथ-पत्र देने की बड़ी भूल की थी कि भगवान राम काल्पनिक हैं और राम-सेतु मानव निर्मित नहीं है। कांग्रेस की छत्तीसगढ़ सरकार अब हिंदुत्व से जुड़े उन मुद्दों को कुरेद रही है, जिनसे उसे नई ऊर्जा मिल सके। बहुसंख्यक आबादी के धार्मिक हितों को यह साधने की कोशिश है।
हालांकि प्रदेश की शिवराज सरकार ‘राम-वन-गमन-पथ’ को लेकर तब जाग जाती है, जब कोई कांग्रेस सरकार या नेता राम-पथ गमन को मुद्दा बनाने लग जाता है। इस सिलसिले में शिवराज की आंखें तब खुलीं थीं, जब दिग्विजय सिंह ने नर्मदा परिक्रमा के दौरान इस मुद्दे को हवा दी थी। इसी का परिणाम रहा था कि २०१७ में प्रदेश सरकार ने ६९ करोड़ रुपए का एक प्रस्ताव बनाकर केंद्र सरकार को भेजा और इसे जल्द मंजूरी मिल जाने का दावा किया था। जबकि यह राशि इतनी छोटी थी कि इसका खर्च स्वयं प्रदेश सरकार उठा सकती थी? लेकिन शिवराज सरकार यह भलि-भांति जानती थी कि इस काम को पूरा करने के लिए मोटी धनराशि के साथ काम को जमीन पर लाने के लिए लंबी अवधि भी लगेगी। इसलिए उसने वह उपाय किया, जिससे सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे।
वैसे राज्य सरकार के संस्कृति विभाग ने ११ विद्धानों की एक समिति बनाकर ‘राम-वन-गमन-पथ’ का मानचित्र बना लिया है। इसके अनुसार भगवान राम ने सीता व लक्ष्मण के साथ चित्रकूट से वर्तमान मध्य-प्रदेश में प्रवेश किया था। तत्पश्चात अमरकंटक होते हुए वे रामेश्वरम और फिर श्रीलंका तक गए। पौराणिक मान्यता और वाल्मीकि रामायण भी यही दर्शाते हैं। साथ ही यह भी मान्यता है कि १४ वर्ष के वनवास में भगवान राम ने लगभग ११ वर्ष ५ माह इन्हीं वनों में व्यतीत किए और वनवासियों को अपने पक्ष में संगठित किया। इस कालखंड में राम जिन मार्गों से गुजरे और जहां-जहां ठहरे, उनमें से ज्यदातर सतना, रीवा, पन्ना, छतरपुर, शडहोल और अनूपपुर जिलों में हैं। इस मानचित्र और प्रतिवेदन को तैयार करने में रामकथा साहित्य, पुरातत्व, भूगोल, हिंदी और भू-गर्भ शास्त्र के विषयों से जुड़े करीब २९ विद्धानों की मदद ली गई। हालांकि जनश्रुतियों में ये सभी स्थान पहले से ही मौजूद हैं और भगवान राम से जुड़े होने के कारण पूजा और पर्यटन से भी जुड़े हैं। इस मार्ग के मानचित्र भी इतिहास की पुस्तकों में दर्ज हैं।
फिलहाल प्रदेश सरकार केवल चित्रकूट को प्राचीन स्वरूप देने की इच्छुक है। भगवान श्रीराम ने वनवास के कालखंड में सबसे ज्यादा समय चित्रकूट में ही व्यतीत किया था। इसका जीर्णोद्धार किया जाना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि एक तो यहां यात्रियों की संख्या निरंतर बढ़ रही है, दूसरे इस धार्मिक पर्यटन से स्थानीय लोगों को रोजगार और सरकार को मोटी आय भी होती है। २००१ में यहां पांच लाख लोग धर्म-लाभ लेने आए थे, जबकि यह संख्या २०१३ में बढ़कर १.६७ करोड़ हो गई। २०२१ में २.५० करोड़ पर्यटक यहां आए। इस क्षेत्र में कामदगिरी पर्वत के दर्शन का बड़ा महत्व है। इसके साथ रामघाट, हनुमानधारा, भरतमिलाप मंदिर और मंदाकिनी नदी प्रमुख धर्मस्थल हैं। यदि इस पूरे क्षेत्र में सुगम पथ, ठहरने व खान-पान और वाहनों के आवागमन व पार्विंâग की उचित व्यवस्था हो जाती है तो यात्री संख्या में वृद्धि के साथ सरकार की आय में भी इजाफा होगा। फिलहाल तो मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने यह जता दिया है कि ढिंढोरा पीटे बिना भी भगवान राम के कार्यों को हनुमान की तरह परिणाम तक पहुंचाया जा सकता है।
(लेखक, वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार हैं।)

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