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महाविकास आघाड़ी सरकार के प्रस्ताव पर लगी मुहर : विसरा जांच के लिए नहीं करना होगा इंतजार! …अब रेलवे पुलिस नहीं होगी बेजार

मुंबई और ठाणे के ६ अस्पतालों में होगा परीक्षण
धीरेंद्र उपाध्याय / मुंबई
संदिग्ध हालात में मौत के कारणों का पता लगाने के लिए विसरा जांच रिपोर्ट का रेलवे पुलिस को महीनों इंतजार करना पड़ता है। विसरा रिपोर्ट आने में देरी से इसका सीधा असर पुलिस की जांच पर पड़ता है और प्रभावित होता है, क्योंकि इस रिपोर्ट से मौत के कारणों का पता चलता है। इससे पुलिस की कार्रवाई आगे बढ़ पाती है। हालांकि, रेलवे पुलिस के लिए तब परेशानी बढ़ जाती है, जब विसरा रिपोर्ट आने में समय लगता है। इस कारण रेलवे पुलिस बेजार सी नजर आती है। हालांकि, रेलवे पुलिस को इस समस्या से छुटकारा दिलाने के लिए ईडीए सरकार ने मुंबई और ठाणे के छह अस्पतालों में विसरा परीक्षण की अनुमति दी है। बता दें कि यह प्रस्ताव साल २०२० में महाविकास आघाड़ी सरकार के कार्यकाल में तैयार किया गया था, जिस पर अब मुहर लगी है।
उल्लेखनीय है कि मुंबई के जेजे अस्पताल में विसरा नमूनों की जांच हो रही थी। इस कारण अस्पताल में ६,५०० विसरा नमूने जमा हो गए, जिसकी जांच में तीन से छह महीने का वक्त लगता। इस समस्या को देखते हुए तत्कालीन महाविकास आघाड़ी सरकार ने २२ दिसंबर २०२० को जेजे अस्पताल में लंबित विसरा नमूनों के निपटान के लिए जिलेवार मेडिकल कॉलेजों की तरह पुलिस स्टेशनों और मुंबई के चार मुख्य मेडिकल कॉलेजों के बीच समानांतर विभाजन करने का पैâसला किया था। इसके तहत मविआ सरकार ने विसरा जांच की रिपोर्ट सौंपने में देरी से बचने के लिए पुलिस स्टेशनों को जिलेवार मेडिकल कॉलेज के हिसाब से बांट दिया था। हालांकि, किन्हीं कारणों की वजह से इसमें रेलवे पुलिस आयुक्तालय के अधिकार क्षेत्र में आनेवाले १७ पुलिस स्टेशन शामिल नहीं थे। ऐसे में रेलवे पुलिस आयुक्त द्वारा हाल ही उपरोक्त पुलिस स्टेशनों को शामिल करने का आग्रह किया गया था, जो कई महीनों से ईडीए सरकार के पास विचाराधीन था।

जारी किया गया शासनादेश
रेलवे पुलिस आयुक्तालय के अधीन १७ पुलिस स्टेशन शामिल नहीं थे। हालांकि, गृह विभाग के साथ-साथ रेलवे पुलिस आयुक्त द्वारा किए गए आग्रह के बाद १७ रेलवे पुलिस स्टेशनों के विसरा जांच के लिए चिकित्सा शिक्षा व औषधि विभाग ने अस्पतालों का बंटवारा कर दिया है। इसके तहत मुंबई के जेजे अस्पताल में सेंट्रल और हार्बर रेलवे के क्रमश: चार-चार, वेस्टर्न के १२, केईएम में सेंट्रल के तीन, हार्बर के नौ, सायन अस्पताल में सेंट्रल के १२, हार्बर के १२, नायर अस्पताल में सेंट्रल के १४, वेस्टर्न के नौ, कूपर अस्पताल में वेस्टर्न के १३ और ठाणे मनपा के कलवा स्थित छत्रपति शिवाजी अस्पताल में सेंट्रल व ट्रांस हार्बर के ३३ और वेस्टर्न के सात रेलवे स्टेशनों के मामलों को शामिल किया गया है।

क्या कहते हैं विशेषज्ञ
विशेषज्ञ ने बताया कि किसी भी व्यक्ति की मौत होने पर अगर हत्या का मामला सामने आता है तो ऐसे में बयान लिए जाते हैं। अगर बयान में किसी पर हत्या करने का आरोप लगाया जाता है तो ऐसे में मौत होने का जो कारण बताया गया, मौत वैसे हुई की नहीं यह जानने के लिए विसरे की जांच ही माध्यम है। इसके अलावा अगर कोई मौत होने की गलत वजह बताता है तो वो भी विसरे की जांच में स्पष्ट हो जाता है। विसरे की जांच होने पर ही आरोपी के खिलाफ एक्शन लिया जाता है या ज्यूडिशियरी में केस की सुनवाई के दौरान सबूत के तौर पर रिपोर्ट को प्रस्तुत किया जाता है।

इन परिस्थितियों में विसरे की जांच होती है
बीमार होने के अलावा अगर किसी की मौत जलने से, जहर निगलने से, गोली लगने से, गला रेतने से, करंट लगने से, रेप से या डूबने से होती है, तो इन स्थितियों में शक के आधार पर पुलिस की मांग पर विसरे का सैंपल केमिकल एग्जामिनर के पास भेजा जाता है। रिपोर्ट देरी से आने से विवादास्पद केस पेंडिंग रह जाते हैं, कई बार रिपोर्ट अनुमान के अनुसार आने पर किसी केस में आरोपी बने लोगों को परेशानी भी झेलनी पड़ती है।

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