मुख्यपृष्ठस्तंभमैथिली व्यंग्य: व्यक्तिगत विकास रुकि जायत!

मैथिली व्यंग्य: व्यक्तिगत विकास रुकि जायत!

डॉ. ममता शशि झा

शिखा छुट्टी भेटिते अहि बेर पहाड़ के तरफ निकलि गेलथि। अपन सखी निर्मला जे ओहि क्षेत्र के रहनिहारि, धनाढ्य परिवार से छलि हुनका संगे। शिखा के आलेख लिखबा के छलनि जंगल आ ओहि में रहनिहार लोक के जीवन में आयल परिवर्तन पर, ताहि के लेल ओ ओहि ठामक आंगनबाड़ी में काज कर बालि शैला के संग क बिदा भेलि। प्रकृति के सौंदर्य के बीच साफ-सुथरा घर, खेत में बनल मचान इ सब देख क शिखा, शैला के पुछलखिन `अहां त बहुत करीब स हिनका सबके देखइ छियनि कि परिवर्तन देखाइ देलक आदिवासी सबहक जीवन में? शैला बजति ताहि से पहिने निर्मला तपाक स बजलि’ आब इहो सब बड़ बुझ लगलइया, सर्व शिक्षा अभियान चला क सरकार एकरा सबके अक्षर के ज्ञान करा देलकइ, पाइ गिननाई सिख लेलकइ, पेठिया में पहीने एकरा सबके लोक सब कनि-मनि पाइ द दइ छलइ लेकिन अब गिन क लइ छई।

`निक बात ने, आब महाजन सब के ठकल नइ होइत हेतय’ शिखा कहलखिन। शैला बजलि पाइ गनइ बला आदिवासी इलाका में से महाजने के आदमी रहै छइ, बिचौलिया बनि के। शिखा पुन: प्रश्न केलखिन `आंगनबाड़ी आ सर्व शिक्षा अभियान से की परिवर्तन भेलइ?’
शैला बजलि `सबके पढ़-लिख दिस ध्यान होब देबहे नइ चाहइ छइ ओतुका छोट भैया सब, मुफ्त के आकर्षण दिमाग में भरि के अपन पछलग्गू बनने रहइ छथिन्ह, माछ खुअबई छथिन्ह मुदा पकड़नाइ नहीं सिखाब चाहै छथिन्ह, हुनको त बड़का नेता के सामने अपन मेनपावर देखेबाक रहइ छनि।’

निर्मला के शैला के बात निक नहीं लगलइ ओ कहलखिन `येकरा सबके लेल कतबो करतइ, तइयो नहीं सुधरतइ’ जुमला पेंâक देलखिन। अपन धर्म एक बोरी अनाज के लेल बदली लई छई।’

शैला बजलि `आदिवासी सबके जीवन भूख के इर्द-गिर्द समेट क राखि देल गेल छई, जानी-बुझि क येहन बना क राखल गेल छइ, येहन जनता नहीं रहतई, त नेता सब चुनावी घोषणा की करता, ककरा सुधारक लेल बड़का-बड़का बजट पास करेता, पाइ दे क वोट कोना खरिदता। शिखा सोचलनि, सहि में अगर ई क्षेत्र आ क्षेत्रक लोक विकसित भ जायत त बड़का- बड़का नेता के व्यक्तिगत विकास रुकि जायत!!

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