मुख्यपृष्ठस्तंभमैथिली व्यंग्य : रक्षक /भक्षक

मैथिली व्यंग्य : रक्षक /भक्षक

डॉ. ममता शशि झा मुंबई

नीना जैधी के बियाह में सासुर जेबाक प्रोग्राम बना रहल छलथी त बेटी रिंकी कहलकनी, ‘हमहु चलब।’ ‘ठीक छई’, नीना कहलखिन। सोचलनी नैहर होईते जायब, रिंकी के दुनु ठाम गेला बहुत समय भ गेल छलई। ई ओही समय के बात अछी जहन दिनों में स्त्रीगण के असगरे यात्रा केनाई सुरक्षित नहीं मानल जाईत छल। सोचलखिन बाबूजी के फोन के क आब के सूचना द दई छियनी, पटना एयरपोर्ट स गाम जाय लेल गाड़ी ठीक के क राखी लेता। पतिदेव पहिनहे गाम चली गेल छलाह। माँ, बाबूजी के कहलियनी त दुनु गोटे के मोन गदगद भ गेलनी।
नीना भोरका फ्लाइट के टिकट बुक करा लेलथी, मोने मोन में सोचलथी जे भने एकदम भोरका फ्लाइट अछी, दिने-देखारे गाम पहुंच जायब, ओकरा प्रात ससुर लेल बिदा भ जायब। जहिया से मां के पता चललई जे हम सब बला छिययी ओहि दिन सं मोटरी बन्हनाई शुरू क देलक, नीना मोने मोन सोचलनि जे दुनिया भले चांद पर चली जाए, मां के मोटरी में कोनो परिवर्तन नहीं आबी सकईया। सबहक मां के आनंद के जरिया होई छई अपन बच्चा के अलग-अलग पदार्थ बना क खुआब में और ससुर बसल बेटी के सब चीज बान्हि क देब में। नीना और रिंकी भोरे ९.३० बजे पटना पहुंच गेलथी। मां के आज्ञा अनुसार, बाबूजी रिंकी के जलखई कराब लेल जगह ताक लगला, कियाक त ओकरा बुझल छई जे, जे धिया-पुता सब के कांडी ल क घर में खुआब पड़ई छई, ओकरा बाहर जाईते भूख लागी जाईत छई। कोनो जगह रिंकी के पसंद नहीं पड़नी, कोनो ढाबा पर माछी भिनभिनाईत, त कोनो पर छोटभैया सबहक जमाव, बाबूजी परेशान, जे नतनी के कत खुआऊ? सुरक्षा और स्वाद के मेल भेटनाई मुश्किल बुझा रहल छलन्हि। एक जगह पर बाबूजी ड्राइवर के उतरी क देख आब लेल कहलखिन। ओ कहलकनी, ‘मालिक खा सकई छी। साफ-सुथरा छई, आ गरम-गरम सिंघारा छना रहल अछी।’
बाबूजी कहलथी, ‘ठीक छई।’
बाबूजी कनी आगु जा क देख क भयभीत स्वर में कहलखीन, ‘गाड़ी में बैसू ओत पुलिस सब बैसल छई।’
रिंकी, ‘पुलिसे त छई। ते त।’
ड्राइवर गाडिये में सिंघाड़ा आनी क द देलक। बाबूजी सोचई छला जे बदमसबा सब जे किछु करत त पुलिस लग जायब, लेकिन पुलिस के शिकायत ककरा स करब? समझदारी अछी जे अपना आप के सुरक्षित घर पहुंचायल जाय।

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