मुख्यपृष्ठसमाचारहाशिए पर `माया'! ...१५ सालों में लगातार गिरा बसपा का ग्राफ

हाशिए पर `माया’! …१५ सालों में लगातार गिरा बसपा का ग्राफ

• यूपी में मायावती के पास अब एक विधायक
सामना संवाददाता / लखनऊ । उत्तर प्रदेश में २००७ के विधानसभा चुनाव में पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाने वाली बसपा के पास सिर्फ एक विधायक है। २००७ में मायावती की पार्टी को ३० फीसदी वोट मिला था, जो २०२२ में घटकर १३ फीसदी हो गया। इतना ही नहीं इस चुनाव में बसपा के २९० प्रत्याशी तो अपनी जमानत तक नहीं बचा पाए। ऐसा क्या हुआ जो मायावती सियासी रूप से राज्य में हाशिए पर चली गईं
दिग्गजों ने एक-एक कर छोड़ा साथ
२००७ से २०१२ ये वो समय है जब प्रदेश में बसपा की पूर्ण बहुमत की सरकार थी। हर जाति-वर्ग के नेताओं की एक लंबी फौज बसपा में थी। २०१४ लोकसभा चुनाव तक स्थिति ठीक थी लेकिन जैसे ही केंद्र में मोदी सरकार आई, ८० लोकसभा सीटों वाले राज्य में बसपा की सीटें शून्य हो गर्इं। बसपा नेताओं का पार्टी से मोहभंग होने लगा। दिग्गज बृजेश पाठक, स्वामी प्रसाद मौर्य जैसे नेताओं की राहें बसपा से जुदा हो गर्इं। ये सिलसिला २०२२ तक लगातार चला। २०१७ में १९ विधायकों वाली बसपा २०२२ चुनाव आते-आते अपने ११ विधायकों को खो चुकी थी।
दलित-मुस्लिम का साथ छूटा
२००७ में सोशल इंजीनियरिंग फॉर्मूला (दलित-मुस्लिम-ब्राह्मण) कामयाब रहा था। इसी फॉर्मूले ने मायावती को यूपी का चौथी बार मुख्यमंत्री बनाया था। हालांकि २०१४ के लोकसभा चुनाव में दलित वोटर्स में सेंधमारी करने में भाजपा को कामयाबी मिली और बसपा को एक भी सीट नहीं मिली। २०१९ में मायावती ने सपा से गठबंधन किया तो दलितों में नाराजगी और बढ़ी। २०२२ विधानसभा चुनाव में तो दलित रुठ ही गए। इतना ही नहीं मुस्लिमों ने भी बसपा के बजाय सपा का साथ दिया।
युवाओं-महिलाओं पर फोकस नहीं
मायावती ने आकाश आनंद को भले ही २०१९ से आगे कर दिया था लेकिन आकाश आनंद भी २०२२ में कोई कमाल नहीं दिखा पाए। वो युवाओं को बसपा से जोड़ने में नाकाम रहे। मायावती ने चुनाव में सिर्फ २१ महिला प्रत्याशियों को टिकट दिया। खुद महिला होकर वह महिलाओं को अपनी पार्टी से जोड़ नहीं सकीं।
सोशल मीडिया पर सक्रियता नहीं
मायावती भले ही हर मुद्दे पर ट्वीट करती रहती हों लेकिन सोशल मीडिया पर उनकी पार्टी की सक्रियता बेहद कम है। भाजपा ने फर्क साफ है जैसा वैंâपेन चलाया तो सपा ने अखिलेश आ रहे हैं। कांग्रेस का लड़की हूं लड़ सकती हूं थीम भी लोगों का ध्यान खींचने में कामयाब रहा लेकिन मायावती की पार्टी न ही ऐसा कोई वैंâपेन चला पाई और न ही मायावती की इमेज को सोशल मीडिया पर मजबूती से पेश कर पाई।

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