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वकीलों के चैंबर में की जा सकती है शादी! …सुप्रीम कोर्ट ने जीवन साथी चुनने के मौलिक अधिकार को बरकरार रखा

सामना संवाददाता / नई दिल्ली
सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि वकील के चैंबर में एक-दूसरे को माला पहनाकर और उंगली में अंगूठी पहनाकर शादी की जा सकती है। कोर्ट ने ये कहते हुए मद्रास हाई कोर्ट के फैसले को खारिज कर दिया। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने जीवन साथी चुनने के मौलिक अधिकार को बरकरार रखा। जस्टिस एस रवींद्र भट और जस्टिस अरविंद कुमार की बेंच ने मद्रास हाई कोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया। हाई कोर्ट ने कहा था कि अगर कुछ अजनबियों के साथ गुप्त रूप से विवाह किया जाता है तो विवाह वैध नहीं होगा।
हाई कोर्ट ने वैध विवाह के लिए हिंदू विवाह अधिनियम की धारा ७ और ७-ए के तहत आवश्यकता का हवाला दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इनमें से कोई भी समारोह, अर्थात एक-दूसरे को माला पहनाना, या उंगली में अंगूठी डालना वैध विवाह को पूरा करने के लिए पर्याप्त होगा। सुप्रीम कोर्ट ने ५ मई, २०२३ को मद्रास हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली एक अपील को अनुमति दी। हाई कोर्ट के आदेश के तहत उन वकीलों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू की गई थी, जिनके तत्वावधान में कथित तौर पर एक नाबालिग लड़की की शादी हुई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जो वकील अदालत के एक अधिकारी के रूप में कार्य नहीं कर रहे हैं, लेकिन मित्र / रिश्तेदार /सामाजिक कार्यकर्ता जैसी अन्य क्षमताओं में कार्य कर रहे हैं, वे हिंदू विवाह अधिनियम (तमिलनाडु राज्य संशोधन) की धारा ७ (ए) के तहत विवाह करा सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने ये भी कहा कि धारा ७-ए रिश्तेदारों, दोस्तों या अन्य व्यक्तियों की उपस्थिति में संपन्न दो हिंदुओं के बीच किसी भी विवाह पर लागू होती है। इस प्रावधान के मुताबिक किसी वैध विवाह समारोह के लिए पुजारी की उपस्थिति आवश्यक नहीं है। इसके साथ सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया। हाई कोर्ट ने कहा था कि वकीलों द्वारा कराई गर्इं शादियां वैध नहीं हैं। सुयम्मरियाथाई विवाह यानी आत्म-सम्मान विवाह को गुप्त रूप से संपन्न नहीं किया जा सकता है।

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