मुख्यपृष्ठस्तंभअर्थार्थ : सीओपी-२८... भारत के सनातन अर्थशास्त्र में छुपा है इसका हल

अर्थार्थ : सीओपी-२८… भारत के सनातन अर्थशास्त्र में छुपा है इसका हल

पी जायसवाल मुंबई

मिस्र में हुए सीओपी-२७ के बाद फिर कई देशों के प्रमुख, मंत्री और वार्ताकार, जलवायु कार्यकर्ताओं, मेयर, नागरिक समाज के प्रतिनिधि और सीईओ एक साथ बैठकर जीवाश्म र्इंधन वाले इलाके में से एक यूएई के तटीय शहर दुबई में जलवायु कार्रवाई पर सबसे बड़ी वार्षिक सभा कर रहे हैं, जिसे नाम दिया गया है सीओपी-२८। इस सभा में भारत के प्रधानमंत्री मोदी तो जा रहे हैं। दुनिया में सबसे ज्यादा इसके लिए जिम्मेदार दो देश के मुखिया जो बाइडेन एवं शी जिनपिंग नहीं आ रहे। उन्होंने अपने जलवायु दूतों को भेज दिया है। इससे फिर एक चर्चा उठ गई है कि क्या इस सीओपी-२८ के बाद भी हम लक्ष्यों को पा जाएंगे।
इस पर आगे पढ़ने के लिए ये जान लेते हैं कि सीओपी-२८ है क्या? सीओपी का मतलब है कॉन्प्रâेंस ऑफ पार्टीज। यह जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र प्रâेमवर्क कन्वेंशन के पक्षकारों का २८वां सम्मेलन है, जो सीओपी-२७ के परिणामों पर आधारित है। इसका मुख्य उद्देश्य है जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न आपातकाल से निपटने के लिए महत्वपूर्ण मुद्दों पर कार्रवाई की जा सके। बढ़ते ऊर्जा संकट, रिकॉर्ड ग्रीनहाउस गैस सांद्रता और बढ़ते गरम मौसम की घटनाओं का सामना करते हुए, सीओपी-२८ लोगों और पृथ्वी ग्रह के लिए ऐतिहासिक पेरिस समझौते के लंबित मसलों को पूरा करने हेतु देशों के बीच नए सिरे से एकजुटता चाहता है। पेरिस समझौते में विकसित देशों ने जो विकासशील देशों से वादा किया था, उस पर भी इस बैठक में बात होगी।
हमारा लिखित इतिहास लगभग ५ हजार वर्षों से है। उससे भी लाखों वर्ष पूर्व से मानवों का क्रमिक विकास है। इन लाखों वर्ष से लगायत सन १७६० तक पृथ्वी पर ऐसी कोई दस्तक नहीं हुई थी, जो पृथ्वी पर मानव जीवन के साथ इस ग्रह को भी खतरे में डाल सके। यूरोप की अगुवाई में औद्योगिक क्रांति के झंडे तले जैसे ही मशीनों ने प्रवेश किया, इसने प्रकृति में प्रयोग की दस्तक दे दी, जिसके साइड इफेक्ट्स अब सामने आने लगे हैं। औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप सतत अर्थशास्त्र, जिसे सनातन अर्थशास्त्र भी कहते हैं की जगह जैसे ही अति उत्पादन आधारित मूल्यांकन जीडीपी को विकास का पैमाना माना गया। विकास उलटे ट्रैक पर दौड़ गया और मानव समेत जैव विविधता और पृथ्वी भी खतरे में आ गई।
जीडीपी वैसे भी पृथ्वी पर विकास का उचित पैमाना नहीं है। यह अति उत्पादन को बढ़ावा देनेवाला है, जो मशीनों से ही प्राप्त किया जा सकता है, जिससे प्रदूषण और कार्बन उत्सर्जन होना स्वाभाविक है। इसकी जगह हमें पड़ोसी देश भूटान का मॉडल अपनाना चाहिए जहां जीएनएच (ग्रॉस नेशनल हैप्पीनेस) का पैमाना है। पृथ्वी पर आपातकाल बीते लाखों वर्षों में नहीं आया, इसकी प्रस्तावना लिखी गई १७६० में, लेकिन अंधाधुंध जीडीपी आधारित विकास हमने शुरू किया और बीते १०० वर्षों में जब जीवाश्म र्इंधन कोयला और पेट्रोलियम पदार्थों का अंधाधुंध दोहन शुरू किया। इसलिए इस बार का सीओपी-२८ की जगह भी मायने रखती है, क्योंकि खाड़ी देश ही जीवाश्म र्इंधन के अगुवा और पैरोकार भी हैं।
इन सौ वर्षों में भी बीते ५० वर्षों में हमने सबसे ज्यादा नुकसान अपनी पृथ्वी को पहुंचाया। जीवाश्म र्इंधन के अलावा ‘यूज एंड थ्रो’ की सभ्यता हमने बीते ५० वर्षों में ही शुरू की, जिससे अनावश्यक उत्पादन और उस कारण अनावश्यक कार्बन उत्सर्जन में वृद्धि हुई। इस सीओपी-२८ में जिन चिंताओं को रेखांकित कर समाधान खोजे जाएगे, उन चिंताओं को रेखांकित कर भारत सनातन काल से ही प्रकृति और पारिस्थितिकीय और जैव विविधता संरक्षण की व्यवस्था में रहा है। हमारा ताना-बाना भी ऐसा ही रहा है। लेकिन लगातार पिछले ५० वर्षों में भारत की इस मूल आत्मा पर भी इस नई उपभोक्ता संस्कृति ने चोट पहुंचाई है। वैसे भी भारत के सनातन अर्थशास्त्र आधारित व्यवस्था वैâसे सीओपी की मीटिंगों के परिणामों जैसे ही रही है, जिसे उन्हीं लोगों ने बिगाड़ा है, जो आज पेरिस, ग्लास्गो, मिस्त्र और दुबई में बैठक कर रहे हैं।
भारत की परंपरावादी मरम्मत करनेवाले व्यवस्थागत समाज में बढ़ई, लोहार, दर्जी, चर्मकार जैसे कामगार वर्ग का ताना-बाना मिल जाता था, जिसे आधुनिक शब्दों में सर्वुâलर इकोनॉमी बोलते हैं। जो सनातन अर्थव्यवस्था का एक प्रकार है। यह ताना-बाना भारत में बचत और मितव्ययिता को बढ़ाता था, प्रकृति को न्यूनतम नुकसान पहुंचता था और कार्बन उत्सर्जन को कम करने में योगदान देता था।
अगर इस सामाजिक व्यवस्था की बसावट और बनावट में बढ़ई, लोहार, दर्जी, चर्मकार जैसे कामगार वर्ग की व्यवस्था को बरकरार रखने की व्यवस्था की जाए तो यह हजारों करोड़ की बचत कराने में सक्षम तो होंगे ही, यह संयुक्त राष्ट्र के सीओपी के उद्देश्यों के अनुकूल भी होंगे। कुछ लोग कह सकते हैं कि यदि सभी लोग ऐसे ही मरम्मत करवाते रहे तो उद्योगों का क्या होगा? उत्पादन कम होगा तो जीडीपी कम होगी। मेरा मानना है उत्पादन और जीडीपी कम होना मायने नहीं रखता। पुनर्चक्रीय व्यवस्था के तहत चमड़ा उत्पादन और जीव हत्या में कमी आएगी। फिर बचत तो विनियोग के रूप में प्रयोग होगा ही न। हमें औद्योगिक उत्पादन और जीडीपी की अंधी दौड़ में नहीं दौड़ना है। जो भी पृथ्वी के इकोसिस्टम के अनुकूल नहीं है, उसे हतोत्साहित करना है। प्रोत्साहित उसे करना है, जो ग्रीन इकोनॉमी के अनुकूल है। उद्योग में जरूरत भर का उत्पादन करें। बाजार का हिस्सा इन कुटीर कारीगरों के लिए भी छोड़ें, जो असल में प्रकृति संरक्षक की भूमिका में भी हैं। यदि हम रिपेयर इकोनॉमी को इग्नोर कर यदि अति औद्योगिक उत्पादन की तरफ बढ़ेंगे तो हम खुद ही अपने और समाज के मौत का दस्तावेज लिख रहे हैं।
हमारी सतत सनातन सामाजिक अर्थव्यवस्था में इनकी बसावट और बनावट ऐसी थी, जो पृथ्वी और मानव समाज के इकोसिस्टम के अनुकूल था औद्योगिक उत्पादन उतना ही था जितने की मौलिक जरूरत थी लेकिन आज के उपभोक्ता वाद ने समाज का पूरा आर्थिक और सामाजिक ताना-बाना बदल दिया है। आज हम रिपेयर इकोनॉमी की जगह रिप्लेसमेंट इकोनॉमी वाले चरण में आ गए हैं। ऐसा इसलिए है कि यह बाजारवाद और पूंजीवाद की अंधी दौड़ है। हर आदमी अपना सामान बेचना चाहता है और खूब पैसा संचय करना चाहता है।
अगर हम और सरकारी नीतियां बढ़ई, लोहार, दर्जी, चर्मकार जैसे कामगार वर्ग का संरक्षण प्रोत्साहन और सम्मानजनक जीवन देने में असफल रहे तो एक दिन भयंकर आर्थिक दुष्प्रभाव देखने को मिलेंगे। ये बढ़ई, टेलर, लोहार आदि की जो सामाजिक व्यवस्था है यह समाज में पैदा हो रहे आर्थिक टॉक्सिन को बाहर कर व्यक्ति को आर्थिक सक्षमता देने में सहायता करती है, यह उनके बचत को बढ़ाते हुए राष्ट्रीय विनियोग में वृद्धि करती है। ये एक छोटा धंधा या छोटे लोग नहीं हैं, ये पृथ्वी पर सुंदर कपड़े के मजबूत धागे हैं। जिन्हें मजबूत रखना जरूरी है, तभी हम सतत रूप में आर्थिक तौर पर मजबूत होंगे।

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