मुख्यपृष्ठस्तंभअर्थार्थ : विवाह भारत का सनातन उद्योग

अर्थार्थ : विवाह भारत का सनातन उद्योग

 पी. जायसवाल
मुंबई

भारत में विवाह सिर्फ एक संस्कार नहीं है, यह अपने आप में एक औद्योगिक व्यवस्था भी है, जो समाज के कई वर्गों को अपने आर्थिक ताने-बाने में बुनता है। यह समाज के आर्थिक जीवन को सतत चलने देने के लिए भारत में बुनी गई सामाजिक व्यवस्था का आर्थिक पहिया है, जो स्वत: ही इसके माध्यम से कई लोगों की आजीविका का माध्यम बन जाता है। यह व्यवस्था आदि काल से है इसलिए यदि इसे भारत का सनातन उद्योग कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी, क्योंकि यह उद्योग अपने आप में कई उद्योगों का प्लेटफॉर्म है। चाहे पुराने समय की शादियां हों या वर्तमान की, सारी शादियां अपने साथ में आर्थिक उद्योग और समाज के सभी वर्गों के ताने-बाने को जोड़ती हैं, ताकि इसे सामाजिक अर्थव्यवस्था का आधार बनाया जा सके। एक जोड़ा जब शादी का समारोह करता है तो वह सिर्फ शादी ही नहीं करता, समाज की इकोनॉमी में भी योगदान देता है।
पुराने जमाने की शादियों में और आज की शादियों में कोई बेसिक फर्क नहीं आया है। समाज के सभी वर्गों को जोड़ने के साथ-साथ समारोह उद्योग का आकार बढ़ गया है और समय के साथ बदलते हुए कई नए उद्योग जुड़ गए हैं। पहले और आज भी ब्राह्मण समाज, चर्मकार समाज, कुम्हार समाज, बढ़ई समाज, हलवाई समाज, कपड़े सिलनेवाला टेलर, बैंड बाजा, व्यापारी समाज, किसान समेत कई लोग जुड़े होते हैं, लेकिन बदलते परिवेश के साथ- साथ इसमें व्यापार के नए-नए आयाम और कई वर्ग जुड़ गए हैं और इस ताने-बाने का विस्तार हो गया है।
आज की शादी में जो सामाजिक अर्थव्यवस्था के अंगों का जुड़ाव हुआ है, उसमें बड़े पैमाने पर वेन्यू और होटल रिसॉर्ट हॉल, लॉन आदि का व्यापार करनेवाले, खानपान की व्यवस्था करने वाले, सब्जी और किराना का व्यापार करनेवाले, बैंड-बाजा वाले, फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी करनेवाले, वेडिंग प्लानर, शादी के जेवर का व्यापार करने वाले, कई समय के डिनर के कारण वैâटरिंग का व्यापार करने वाले, लेडीज संगीत जैसे कई कार्यक्रमों का विस्तार, फूल का व्यापार करनेवाले, पोशाक और ड्रेस डिजाइनर, बाल, मेकअप और मेहंदी का काम करनेवाले, लाइट एवं सजावट का काम करनेवाले, डीजे एवं संगीत का काम करनेवाले, दूधवाला, हलवाई, मिठाई, वाहन व्यापार के साथ कई तरह के ट्रासंपोर्ट, उपहार, निमंत्रण/स्टेशनरी का व्यापार करने वाले ये सब जुड़े रहते हैं। एक शादी में जितने भी खर्चे होते हैं, वे इन्हीं सब आयोजनों के बहाने समाज के नीचे तक सौदे के रूप में हस्तांतरित होते हैं। इसीलिए भारतीय समाज में शादी के आयोजन की संरचना मौजूदा बिजनेस प्रमोशन या व्यापार मेले की तुलना में कहीं बेहतर, मजबूत और निश्चित है। हमारी सामाजिक व्यवस्था के निर्माताओं ने विवाह जैसे समारोह को भी एक आर्थिक व्यवहार का रूप देकर यह सुनिश्चित किया था कि प्राकृतिक और सतत रूप से एक सामाजिक प्रसंग को आर्थिक वितरण का आधार वैâसे बनाया जा सकता है।
ऐसा अनुमान है कि भारत में नवंबर २०२३ से लगभग आगे के ४ माह के दौरान ३८ लाख से अधिक शादियों का आयोजन होगा और ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि इस ४ माह में लगभग ४.७५ लाख करोड़ की राशि खर्च होगी। ऐसा भी एक सर्वे है कि भारत में इस वर्ष विवाह की इस लगन के मौसम में सबसे अधिक खर्च करने का विश्व रिकॉर्ड बनाया जा सकता है। शादी के विभिन्न कार्यक्रमों में विभिन्न मदों पर होनेवाले खर्च के संबंध में भी अलग-अलग अनुमान लगाए गए हैं। जैसे कपड़ों और ज्वेलरी पर एक लाख करोड़ रुपए से अधिक की राशि, मेहमानों की खातिरदारी पर साठ हजार करोड़ रुपए से अधिक की राशि, शादी समारोह से जुड़े कार्यक्रमों पर साठ हजार करोड़ रुपए से अधिक की राशि खर्च होने जा रही है। भारत के अलावा दुनिया के किसी भी देश के पास एक ऐसा ऑटोमेटिक बाजार और उत्सव नहीं है, जो महीनों भारी भरकम राशि खर्च के माध्यम से समाज के सभी वर्गों और इकोनॉमी में वितरित करता हो। इसके लिए उन्हें समय- समय पर उत्सव डिजाइन करता है जबकि भारत में यह नेचुरली डिजाइन है।
भारत के उत्सवधर्मी प्रकृति के प्रभाव के कारण ही इसी अक्टूबर २०२३ में करीब २३ लाख वाहनों की बिक्री का आंकड़ा आया है, जिसमें बताया जा रहा है कि ४ लाख चार पहिया तो १९ लाख दोपहिया वाहन हैं। त्यौहार के बाद आने वाले शादियों के मौसम में भी वाहनों की जबरदस्त बिक्री होने की संभावना है। आज भारत में नव धनाढ्य वर्ग की संख्या भी तेजी से बढ़ रही है। अत: समस्त मेहमानों सहित अब डेस्टिनेशन वेडिंग का प्रचलन भी भारत में बहुत बढ़ गया है इसलिए ऐसी शादियों का औसत खर्च एक करोड़ से ज्यादा होने लगा है। ऐसा अनुमान है जो एक तरह से पुन: व्यापार के कई वर्गों में खर्च के माध्यम से वितरित हो रहा है। डेस्टिनेशन वेडिंग के इकोनॉमी में योगदान को देखते हुए पीएम मोदी ने भी कहा है कि विदेशों में शादी कर वहां खर्च करने की बजाय भारत में ही शादी कर भारत में ही खर्च करिए।
इस प्रकार देखें तो भारत के ताने-बाने में शादी जैसी घटना ऐसी बुनी गई है, जिससे दो जोड़े ही नहीं बने इससे समाज के सभी वर्गों को कुछ काम भी मिले। इसीलिए हमने देखा होगा की भारत के गांवों और कस्बों में शादी के मौसम में व्यापार और खुशहाली ज्यादा होती है। भारत का यह सांस्कारिक आयोजन, जो कि विश्व में यूनिक है, इसे हमें रोकना नहीं है अन्यथा यह भारत के सनातन अर्थशास्त्र और अर्थव्यवस्था पर ब्रेक लगाने देने जैसा होगा।
(लेखक वरिष्ठ अर्थशास्त्री व सामाजिक तथा राजनैतिक विश्लेषक हैं।)

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