मुख्यपृष्ठस्तंभअर्थार्थ : चांद के पार बड़ा है बाजार

अर्थार्थ : चांद के पार बड़ा है बाजार

 पी. जायसवाल
मुंबई
मैंने अपनी एक पुस्तक लिखी है, सनातन अर्थशास्त्र और उसका लब्बोलुआब है कि पश्चिम के अर्थशास्त्रियों के बनिस्पत सनातन अर्थशास्त्र कहता है कि ज्ञात-अज्ञात ब्रह्मांड में संसाधनों की अनंत असीमित संभावनाएं हैं। हमारी आवश्यकताएं या पहुंच ही अर्थशास्त्र की सीमा और परिभाषा निर्धारित करती हैं और उसमें अंतरिक्ष में पैâले अनंत संसाधन के रूप में ग्रह, एस्टेरोइड, खनिज, गैस समेत सब आते हैं। कल जब हम चांद के साउथ पोल पर पहुंचे तो एक वैज्ञानिक ने सही कहा कि वहां से हमें कई खनिज मिनरल हीलियम का स्रोत मिल सकता है, जो धरती के लिए मूल्यवान हो सकता है। मतलब चीजें तो वहीं थी जस की तस हम ही नहीं पहुंचे थे।
चंद्रयान-३ की सफलता यह बताती है कि अनंत के खोज की यह यात्रा अनायास नहीं है। धरती के लिए यह मूल्यवान है। भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम जो कि डॉ. विक्रम साराभाई की संकल्पना है, जिन्हें भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम का जनक कहा जाता है, आज राष्ट्रीय विकास का एक महत्वपूर्ण आधार है। नेहरू जी ने शुरू में अंतरिक्ष अनुसंधान को परमाणु ऊर्जा विभाग की देख-रेख में रखा। भारतीय परमाणु कार्यक्रम के जनक होमी भाभा ने अंतरिक्ष अनुसंधान के लिए इसके लिए भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष अनुसंधान समिति (इनकोस्पार) का गठन किया और डॉ. साराभाई को सभापति नियुक्त किया। भारत अंतरिक्ष कार्यक्रम ने देशी तकनीक कच्चे माल एवं तकनीक आपूर्ति में आत्मनिर्भरता की आवश्यकता को भांपते हुए अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) का गठन किया। आज यह भारत सरकार के ‘अंतरिक्ष विभाग’ द्वारा प्रबंधित है तथा सीधे भारत के प्रधानमंत्री को रिपोर्ट करता है। नेहरू के स्वप्न से शुरू हुआ भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम आज भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा व्यक्तिगत दिलचस्पी लेने के कारण सूर्य और शुक्र के अभियान की तरफ बढ़ रहा है।
हमारी इस प्रगति पर शुरू में कई विकसित देशों ने इसका मजाक बनाया था, लेकिन आज भारत अपने कम बजट में ही उच्च अंतरिक्ष तकनीक को हासिल कर श्रेष्ठ अंतरिक्ष तकनीक वाले देशों की कतार में शामिल हो गया है। कम बजट के स्वदेशी उपग्रह और प्रक्षेपण की किफायत लागत के कारण वैश्विक स्तर पर भारत की साख बढ़ रही है। वर्ष २०१७ में इसरो ने ही १०४ उपग्रहों को एक साथ अंतरिक्ष की कक्षा में स्थापित किया था, जिसमें १०१ स्वदेशी उपग्रह थे। इस कारण भारत उपग्रहों के प्रक्षेपण करनेवाले पसंदीदा देश के रूप में उभरने लगा। कई देश अब भारत के ही प्रक्षेपण यान से अपने उपग्रहों को अंतरिक्ष में भेज रहे हैं, जिससे भारत का उपग्रह प्रक्षेपण कारोबार तेजी से आगे बढ़ रहा है। चंद्रयान-३ की सफलता इस कारोबार को और गति देगी। संयुक्त राष्ट्र की मानें तो १५ साल पहले करीब ६० से १०० सेटेलाइट लॉन्च किए जाते थे, जबकि वर्ष २०२० में ही १,२०० से अधिक उपग्रह लॉन्च हुए। भारत के इस अंतरिक्ष बाजार में इंटरनेट तथा DTH सेवाओं का हिस्सा सबसे ज्यादा है, जो कई उद्योगों के डिजिटल इकोसिस्टम का आधार है।
इसरो अब २०३० तक अंतरिक्ष में अपना अंतरिक्ष स्टेशन स्थापित करने की भी सोच रहा है। यह सारी परियोजनाएं भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के आर्थिक दोहन की संभावनाओं को बलवती कर रही हैं। पिछले ही दिनों सरकार ने अंतरिक्ष नीति, २०२३ को मंजूरी दी, जिसके तहत अंतरिक्ष उत्पाद एवं सेवा संबंधी गतिविधियां जैसे उपग्रह निर्माण तथा उपग्रह प्रक्षेपण आदि कार्यों के लिए निजी क्षेत्र को बढ़ावा दिया जाएगा। इस नीति से नए बुनियादी ढांचे के निर्माण को प्रोत्साहन मिलेगा। साथ में अनुसंधान, शिक्षा, स्टार्टअप और उद्योगों को भी बढ़ावा मिलेगा। देखा जाय तो आज वैश्विक अंतरिक्ष बाजार में हम चार फीसदी से भी कम है, लेकिन इस सफलता के साथ ही इसे १० फीसदी करने में भारत की नई अंतरिक्ष नीति भी सहायता करेगी। अब भारत का निजी क्षेत्र भी विकसित देशों की तर्ज पर उपग्रह निर्माण में सहयोग तथा अपना निजी प्रक्षेपण स्टेशन भी विकसित कर सकेगा। तीन साल पहले ही सरकार ने इस क्षेत्र में १०० प्रतिशत एफडीआई की अनुमति निजी क्षेत्र को दी है, आज तीन वर्षों में देश में लगभग १४० के आसपास स्टार्टअप्स इस क्षेत्र में आए हैं।
कुछ दशक पहले वैश्विक अंतरिक्ष क्षेत्र में कुछ ही देशों का दबदबा था। विक्रम साराभाई की दूरदर्शिता एवं भारतीय वैज्ञानिकों का टैलेंट एवं मेहनत का ही परिणाम है कि आज हम इसमें विकसित देशों के साथ खड़े हैं। २०१४ में हम विश्व में प्रथम प्रयास में ही मंगल पर पहुंचनेवाले देश बन चुके हैं। २०२४ तक भारत की अंतरिक्ष में मानव एवं रोबोट को भेजने की योजना है।
आज अंतरिक्ष के अनंत संसाधन पृथ्वी की जरूरत बनते जा रहे हैं। इन संसाधनों से मीडिया, इंटरनेट, विमानन, रक्षा, रिटेल, एयरोस्पेस आदि क्षेत्रों में तेजी से विकास हो रहा है। मौसम की भविष्यवाणी हो, आपदा प्रबंधन, मत्स्य पालन, शहरी प्रबंधन, रेलवे, सड़क और पुल निर्माण, टेली-मेडिसिन, जंगलों के संसाधनों का मानचित्रण, जीपीएस कवरेज, कृषि उपज, भूजल और जल संग्रहण क्षेत्र के विश्लेषण में अंतरिक्ष विज्ञान महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। नेविगेशन सेटेलाइट सिस्टम द्वारा अब भारत अपने पड़ोसी क्षेत्रों में भी सेवाएं दे रहा है। इसरो के अनुसंधान विकास ने रक्षा उत्पादन, दूरसंचार, सामग्री, रसायन और परिशुद्धता इंजीनियरिंग जैसे कई क्षेत्रों को फायदा पहुंचाया है।
(लेखक वरिष्ठ अर्थशास्त्री व सामाजिक तथा राजनैतिक विश्लेषक हैं।)

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