मुख्यपृष्ठस्तंभअर्थार्थ: ओएनडीसी ई-कॉमर्स में संपूर्ण क्रांति

अर्थार्थ: ओएनडीसी ई-कॉमर्स में संपूर्ण क्रांति

पी.जायसवाल

ओएनडीसी, जिसका मतलब है ओपन नेटवर्क फॉर डिजिटल कॉमर्स, इसे जल्द सरकार शुरू करनेवाली है। सरकार ने यह योजना ई-कॉमर्स मार्केट  में एकाधिकार खत्म करने के लिए बनाई है। सरकार के मुताबिक डिजिटल पेमेंट स्पेस में जो काम यूपीआई का है, वही ई-कॉमर्स स्पेस में ओएनडीसी का होगा और मकसद डिजिटल ई-कॉमर्स स्पेस में सबके लिए बराबरी के मौके देना और समूची वैल्यू चेन डिजिटाइज करना होगा, जिससे ई-कॉमर्स की कारोबारी प्रक्रिया स्टैंडर्डाइज हो जाएगी। ज्यादा-से-ज्यादा सप्लायर ऑनलाइन स्पेस में आ सकेंगे और कस्टमर्स को ज्यादा वैल्यू मिलेगी। इसके नाम से स्पष्ट है कि यह एक ओपन डिजिटल कॉमर्स प्लेटफॉर्म होगा, जिसका सोर्स कोड विक्रेत , क्रेता, सर्विस प्रोवाइडर, लॉजिस्टिक, पेमेंट गेटवे या कोई भी सबके लिए खुला रहेगा। इसे अमली जामा पहनाने और इस क्षेत्र में एकाधिकार तोड़ने के लिए सरकार ने अपना निजी और क्लोज्ड प्लेटफॉर्म चलानेवाले लोगों जैसे कि अमेजन और फ्लिपकार्ट से लगायत सभी ई-कॉमर्स कंपनियों  को इस प्लेटफॉर्म पर आना अनिवार्य करेगी। इसे ठीक ऐसे समझ लीजिए कि यूपीआई आने से पहले पेटीएम या अन्य फिनटेक कंपनियों के अपने निजी प्लेटफॉर्म थे। यूपीआई लॉन्च करने के बाद सरकार ने सबको यूपीआई प्लेटफॉर्म पर आना अनिवार्य कर दिया। अब पेमेंट की टेक्नोलॉजी पर किसी का एकाधिकार नहीं है। यूपीआई का सोर्स कोड का इस्तेमाल कर फिनटेक कंपनियां पेमेंट सुविधा दे सकती हैं और ग्राहक किसी भी यूपीआई ऐप को डाउनलोड कर किसी भी पेमेंट ऐप से किसी दूसरे पेमेंट ऐप पर भुगतान कर सकता है।
इसे समझने हेतु हमें मौजूदा ई- कॉमर्स मॉडल और यूपीआई मॉडल समझना पड़ेगा। जैसे अमेजन जिसमें बेचने और खरीदनेवाले को सिर्फ अमेजन पर जाकर ही सौदे करने होते हैं। आप अमेजन पर जाकर फ्लिपकार्ट पर रजिस्टर विक्रेता  से माल नहीं खरीद सकते हैं। अब ओएनडीसी ने इस मसले को हल कर दिया है। अब यूपीआई मॉडल समझते हैं, यूपीआई से पहले पेमेंट का लेन-देन हम देख चुके हैं। अब तो हर मोबाइल यूजर, दुकानदार का अपना-अपना क्यूआर कोड है। हर जगह वह क्यूआर कोड दिख जाएगा और कोई भी उस कोड के माध्यम से पेमेंट ले और दे सकता है। अब यह यूपीआई काम कैसे करता है? दरअसल, यह यूपीआई एक ओपन नेटवर्कवाला डिजिटल कॉमर्स इकोसिस्टम है, इसमें एक तरफ फिनटेक कंपनियां एवं बैंक एक सर्विस प्रोवाइडर एप्लिकेशन के माध्यम से क्रियाशील हैं तो दूसरी तरफ हम जैसे ग्राहक या दुकानदार यूजर एप्लिकेशन के द्वारा जुड़े हुए हैं। इस प्लेटफॉर्म पर दोनों तरफ के एप्लिकेशन जुड़े हुए हैं। ग्राहक अपने एक यूजर एप्लिकेशन जैसे कि उसने यदि पेटीएम डाउनलोड किया है तो वह भीम-पे, जी-पे, फोन-पे से लगायत किसी भी सर्विस प्रोवाइडर के एप्लिकेशन पर पैसा ट्रांसफर कर सकता है। ऐसा नहीं है कि पेटीएम वाला केवल पेटीएम वाले को ही पैसा ट्रांसफर कर सकता है। ठीक उसी तरह दूसरे एंड पर पैसा प्राप्त करनेवाला एप्लिकेशन है तो ऐसा नहीं है कि वह केवल जी-पे का है तो जी-पे वाले से ही पैसा प्राप्त करेगा। वह किसी भी एप्लिकेशन से आए पैसे को स्वीकृत करेगा। मतलब यूपीआई एक ऐसा ओपन नेटवर्क है, जिसने इस एप्लिकेशन के निजी एकाधिकार को खत्म कर इसे और इन्हें सबके लिए खुला कर दिया है, भेदभाव रहित। और यूपीआई सुविधा के इस्तेमाल के लिए उन्हें इसी इकोसिस्टम का यूज करना पड़ेगा, अलग से कोई अन्य निजी प्लेटफॉर्म नहीं होगा।
अब इसे ऐसे समझिए कि यह यूपीआई की तरह ही अब हम सबके मोबाइल और गली-मोहल्ले और सबके यहां दिखने वाला है। यह हमारे पास और हम इसके पास जानेवाले हैं। यह ई-कॉमर्स को किसी एक कंपनी  या किसी वेबसाइट के एकाधिकार से तोड़कर जनतांत्रिक करनेवाला है। यूपीआई की तरह यह एक ऐसा ओपन नेटवर्वâ डिजिटल कॉमर्स इकोसिस्टम होगा, जिसमें ई-कॉमर्स के सभी किरदार एक साथ इस पर होंगे, चाहे वह ई-कॉमर्स के मौजूदा प्लेटफॉर्म हों, परदे के पीछे रहनेवाले सर्विस प्रोवाइडर जैसे की लॉजिस्टिक हो, पेमेंट गेटवे हो, किसी अनजान जगह का कोई कारीगर हो या हम जैसे ग्राहक हों। सिर्पâ एक इकोसिस्टम जिस पर सभी ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म वाले को आना अनिवार्य किया जानेवाला है, पर अब सब मिलेंगे। अब आप अमेजन पर जाएंगे तो सिर्पâ अमेजन से जुड़े सेलर की ही लिस्टिंग नहीं दिखेगी आपको आपके सर्च क्राइटेरिया के आधार पर इस पर पंजीकृत हुए आपके सर्च अनुसार सभी सेलर मिलेंगे। भले ही वह अमेजन की जगह फ्लिपकार्ट या किसी और प्लेटफॉर्म से जुड़े हों या अपना खुद का पोर्टल हो।
इस खुले नेटवर्क पर निजी ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म जो कि एक बॉक्स की तरह काम करते थे जिसमें एक बंधन बंडल के रूप में लॉजिस्टिक प्रोवाइडर, सेलर, पेमेंट गेटवे, कूपन आदि बंधे रहते थे अब वह सब अनबंडल हो जाएंगे। मतलब स्वतंत्र रूप से इस प्लेटफॉर्म पर आ जाएंगे और पुन: आवश्यकतानुसार रीबंडल होंगे। एक सर्विस प्रोवाइडर या एक छोटा-सा दुकानदार अब लॉजिस्टिक समस्या से मुक्त रहेगा उसे इसी प्लेटफॉर्म पर कई मौजूद लॉजिस्टिक प्रोवाइडर मिल जाएंगे जिसके साथ वह टाई अप कर अपना धंधा बढ़ा सकता है। अब तकनीक चुनिंदा हाथों की बपौती नहीं रहेगी। यह ओपन फॉर आल रहेगी। चूंकि यह ओपन सोर्स कोड का प्लेटफॉर्म होगा अत: कोई भी इसका इस्तेमाल कर इसका एप्लिकेशन बनाकर इस प्लेटफॉर्म पर आ सकता है जैसे कि एंड्रॉइड।
बहुत से लोग इसे सुपर एग्रीगेटर, सुपर प्लेटफॉर्म या प्लेटफॉर्म का प्लेटफॉर्म समझते हैं लेकिन यह सत्य नहीं है। यह एक ओर्केस्ट्रा  की तरह काम करता है, जो सभी प्रक्रियाओं को पहले अनबंडल करता है फिर उन्हें खुले बाजार में छोड़ देता है अपने सर्वश्रेष्ठ को प्राप्त करने के लिए और यह पुन: आवश्यकतानुसार रीबंडल होते हैं और बिल्कुल एक ओर्केस्ट्रा  की तरह काम करते हैं, जिसमें कोई एक अकेला नहीं होता है। आपस में एक-दूसरे से जुड़े सौदे की एक रिद्म का निर्माण करते हैं और यह जितना ज्यादा होगा, उस रिद्म की आवाज उतनी ही ऊंची होगी। यह एक फैसिलिटेटर के रूप में काम करनेवाला है न कि खुद एक ऑपरेटर। यह एक ऑपरेटर के रूप में संचालित स्वयंभू विशाल मंच-केंद्रित मॉडल से एक फैसिलिटेटर के रूप में संचालित इंटर ओपेरेबल विकेंद्रीकृत  नेटवर्क  की तरफ एक बदलाव है, जिसमें इस डिजिटल इकोसिस्टम के सब प्लेयर भागीदार हैं। यह पृथक-पृथक प्लेटफॉर्मों में अंतर्निहित समस्याओं के कारण खुद एक सुपर प्लेटफॉर्म बनने या प्लेटफॉर्मों के प्लेटफॉर्म बनने की बजाय यह सबको अनबंडल कर पुन: एकीकृत करता है। ओपन नेटवर्क के माध्यम से और उन्हें मांग के आधार पर रीबंडल करने की स्वतंत्रता और सुविधा देता है।
यह सनातन अर्थशास्त्र का अनुप्रयोग ही है, जिसने डिजिटल इकोसिस्टम में अंतर्निहित और अदृश्य वैल्यू को ढूंढ निकाला है, जो अलग-अलग प्लेटफॉर्म के दरवाजे पर बिखरी पड़ी थी। इसे ऐसे समझ लें, यह एक ऑर्केस्ट्रा की तरह पृथक-पृथक वाद्ययंत्रों की जगह सभी वाद्ययंत्रों के जरूरत आधारित स्वत: अनुशासित सम्मिलन से सौदों की ऐसे-ऐसे संगीत की खोज की है, जो अनंत तरीके की संगीत और उसका मूल्य पैदा करेगा।
यह खुला नेटवर्क सप्लाईचेन को बिचौलियों के चंगुल से निकाल सभी प्लेयर्स उपभोक्ताओं, व्यापारियों और समर्थन सेवाओं के प्रदाताओं को शक्तिमान बनाएगा। यह छोटे व्यवसायों के लिए सबसे अधिक प्रभावशाली होगा जो नवाचार को अनलॉक करना चाहते हैं और डिजिटल कॉमर्स के माध्यम से अपने संचालन को बढ़ाना चाहते हैं, जो पहले पहुंच से बाहर होने के कारण कर नहीं पाते थे अब डिजिटल होना उतना ही आसान होनेवाला है, जितना यूपीआई हो गया है। यह अवधारणा अब रिटेल सेक्टर तक ही सीमित नहीं है। यह किसी भी डिजिटल कॉमर्स तक बढ़ाया जा सकता है चाहे थोक, मोबिलिटी, खाद्य वितरण, रसद, यात्रा, शहरी सेवाएं आदि कोई भी चाहे बीटूसी या बीटूबी। यह खरीदारों और विक्रेताओं  की स्वायत्तता को भी सक्षम बनाएगा और उन्हें किसी एक प्लेटफॉर्म के खूंटे से बांधने के बंधन से मुक्त कराएगा, ये अब किसी के भी सर्च इंजन पर दिखेंगे। बस इन्हें इसके आसान खुले प्रोटोकॉल के माध्यम से डिजिटल मैदान में आ जाना है, जो मैदान अब सबके लिए लेवल प्लेइंग फील्ड है और अब यहां किसी एक की मनमानी नहीं चलने वाली है।
(लेखक अर्थशास्त्र के वरिष्ठ लेखक एवं आर्थिक, सामाजिक तथा राजनैतिक विषयों के विश्लेषक हैं।)

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