मुख्यपृष्ठस्तंभअर्थार्थ : आदि उद्यमी किसान क्यों है हैरान-परेशान?

अर्थार्थ : आदि उद्यमी किसान क्यों है हैरान-परेशान?

पी. जायसवाल मुंबई

पिछले कुछ सालों में हमने दो किसान आंदोलन देख लिए और उन किसानों को लेकर हमने लोगों के कई नजरिए देख लिए। आज हम चर्चा करेंगे कि पृथ्वी के सबसे आदि उद्यमी को आज भी क्यों संघर्ष करना पड़ रहा है? सेकेंडरी उद्योगों को इन प्राथमिक उत्पादकों से क्यों ज्यादा तवज्जो दी जा रही है? अगर इसकी जड़ में जाएंगे तो कहीं न कहीं हमारी नीतियां जिम्मेदार मिलेंगी। आज के एमबीए एवं इंजीनियरिंग शिक्षा के दौर में बहुत कम लोगों को पता होगा कि सन् १९५२ में आईआईटी खड़गपुर में कृषि एवं खाद्य इंजीनियरिंग में बीटेक की शिक्षा शुरू की गई थी, लेकिन समय के साथ बाजार के किसी अनजाने दबाब ने इसे कंप्यूटर एवं इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी जैसा लोकप्रिय रोजगारपरक विषय नहीं बनाया। आईआईटी या इंजीनियरिंग कॉलेजों में भी पोस्ट हार्वेस्टिंग के कोर्स की जानकारी ज्यादा मिलेगी, जो कि द्वितीयक उत्पादकों के लिए ज्यादा काम की है न कि इन आदि प्राथमिक उत्पादकों के। कोर्स की ड्राफ्टिंग में ही कृषि एवं खाद्य इंजीनियरिंग को एक साथ जोड़ देने से शिक्षा एवं रोजगार का ज्यादा फोकस खाद्य इंजीनियरिंग वाले पक्ष पर ज्यादा चला गया। आप गूगल करेंगे तो पता चलेगा कि रोजगार द्वितीयक उद्योग में खाद्य इंजीनियरिंग के ज्यादा मिलेंगे बजाय कृषि उद्यमी बनने के। नियोक्ताओं की लिस्ट भी इतनी आकर्षक नहीं है, जिससे कि युवा वर्ग कृषि विषय पर आकर्षित हो।
अगर युवाओं को इसके लिए आकर्षित करना हो तो इसे रोचक बनाना होगा और उसके पहले जानना पड़ेगा कि इसके आर्थिक रोचक पहलू क्या हैं। जरूरत है आज इसे इसका वास्तविक हक दिलाने का। दुनिया में सबसे अधिक उत्पादन कृषि का है। दुनिया के प्रत्येक देशों की जीडीपी महंगाई और अर्थव्यवस्था का मूल आधार कृषि उत्पादन है। दुनिया के कई देशों में कृषि उत्पादन नगण्य है, मसलन खाड़ी देश जहां निर्यात की अनंत संभावना है। कृषि यह पूरी दुनिया का एक ऐसा उत्पादन है, जिसकी पूंजीगत और मशीनरी लागत अन्य उद्योगों की तुलना में नगण्य है और इसका नेचुरल प्लांट जमीन है। कृषि की मांग कभी भी कम नहीं हो सकती है, आबादी बढ़ने के साथ ही इसकी मांग बढ़ती जाती है। इसका उपयोग भारत एवं विश्व में १०० प्रतिशत व्यक्ति और यहां तक जानवरों द्वारा दिन-रात किया जाता है।
आज कृषि इलाके के पिछड़ेपन का कारण उनकी कृषि शक्ति का सर्वोत्तम उपयोग न होना और नई पीढ़ियों द्वारा मुंह मोड़ना रहा है। आज देश के कृषि इलाकों की हालत ऐसे घर सी हो गई है, जहां सारे इलेक्ट्रॉनिक संसाधन के मौजूद होने के बावजूद लगता है जैसे करंट नहीं है और सबके सब निष्क्रिय पड़े हैं। चाहे वो प्रिâज हो या वॉशिंग मशीन सब अलमारी की तरह कपड़ा रखने के काम आ रहा है। कहने का मतलब है कि जब किसी संसाधनों को उसका उचित मूल्य नहीं प्राप्त होता है तो वह यही गति प्राप्त करेगा। आज भी आपको इन इलाकों में कई युवा सर्वोत्तम सुविधा के अभाव में टूटते भटकते हुए दिखाई देंगे, जिनमें से कई को तो उनके सर्वोत्तम मूल्य प्राप्त करने की उम्र निकल गई है तो कई अभी भी टकटकी लगाए बैठे हैं।
कृषि संभावनाओं के दृष्टिकोण से बात करें तो आज भी ये इलाके अपने कृषि एवं मानव संसाधन क्षमता का कुछ प्रतिशत ही मूल्य प्राप्त कर पाते हैं, क्योंकि इन कृषि उत्पादों के लिए न तो अनुकूल राज्य की नीतियां है न अनुकूल कृषि बाजार, न भंडारण की व्यवस्था है और न ही यहां का युवा वर्ग रोजगार के अवसर के रूप में कृषि को अपना रहा है और न ही वह यहां टिक रहा है। शिक्षा के आरंभ में ही कृषि विज्ञान को गैर वरीयता वाले विषयों की सूची में रख दिया जाता है और करियर काउंसिलिंग के दौरान भी कोई बमुश्किल ही इस विषय के बारे में विद्यार्थियों के मन में अभिरुचि पैदा करा पाता है, जिसके कारण युवा कृषि के प्रति उदासीन है और गांवों से आज भी उत्पादक युवाओं का पलायन जारी है। अब तो हालत यह है कि देश का किसान भी यही चाहता है कि उसका बेटा या बेटी आगे चलकर खेती न करे।
कृषि की तरफ युवा उदासीनता का एक प्रमुख कारण शैक्षिक पाठ्यक्रमों में चाहे वो एमबीए हो या इंजीनियरिंग कृषि को इसकी महत्ता से परिचित नहीं कराना है। कृषि की तरफ युवा उदासीनता का दूसरा कारण भारत में पेशेवर शिक्षा के बाद युवा वर्ग का पलायन है, वह गांव में रहना नहीं चाहता है, कारण गांव में शहरों जैसी सुविधा नहीं है। बड़ी बारीकी से इन सुविधाओं का आप अध्ययन करेंगे तो इसमें इस नव युवा वर्ग को चाहिए २४ घंटे बिजली, इंटरनेट बच्चों के लिए अच्छा स्कूल, अच्छी चिकित्सा सुविधा और परिवहन के लिए अच्छी सड़कें। नीतियां भी शहरीकरण की ही बन रही हैं, जबकि सरकार को गांवों के उन्नत बनाने पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
युवाओं की इस उदासीनता जिसके कारण इन कृषि भूमि का सर्वोत्तम प्रयोग नहीं हो पा रहा है, पैदा किए जा सकने वाले संभावित उत्पादों और स्थानीय श्रम और दिमाग का उपयोग नहीं हो पा रहा है। पलायन हो रहा है, इस पलायन को रोकने के लिए बुनियादी स्तर पर आगे बताए गए उपाय किए जा सकते हैं। रोजगारपरक पाठ्यक्रम जैसे कि एमबीए, इंजीनियरिंग, आईटीआई, आईआईटी में कृषि को रोचक और आकर्षक रूप में प्रस्तुत किया जाय। कृषि के लिए सर्वोत्तम सप्लाई चेन का विकास किया जाय, जिसमें समुद्री एवं हवाई कार्गो एयरपोर्ट से लेकर अन्य शृंखलाबद्ध चीजें हों। इन शिक्षाओं के बाद इनके अनुप्रयोगों को विकसित करके जैसे कि इस तरह के कृषि, कृषि पूर्व और कृषि पश्चात एग्रो पार्क एवं स्थानीय जैसे उद्यमों को विकसित करना, जहां इस शिक्षा का उपयोग किया जा सके। रोजगार के विभिन्न विकल्पों के विकास के साथ-साथ कृषि उद्यमिता को बढ़ावा देते हुए विशिष्ट वैज्ञानिक कृषि प्रबंधन को बढ़ावा देना। अशहरीकरण एप्रोच अपनाकर अगर सरकार शहरों की तरह पलायन रोककर इन मूलभूत और आधारभूत सुविधाओं को गांवों और गांवों के आस-पास बसे कस्बों के इर्द-गिर्द विकसित कर दे तो इन युवाओं का शहरी पलायन रोका जा सकता है। जैसे कि २४ घंटे बिजली, इंटरनेट बच्चों के लिए अच्छा स्कूल, अच्छी चिकित्सा सुविधा और परिवहन के लिए अच्छी सड़क। अगर कस्बों को विकसित करने पर ज्यादा ध्यान दिया जाय तो एक बड़ी आबादी को वहां पर रोका जा सकता है। गांव के लिए उनका प्रथम शहर और प्रथम बाजार कस्बा ही होता है। अत: कस्बों को ध्यान में रखकर कृषि उद्यमिता पर कार्य करना चाहिए।
ऐसी करने से निम्न फायदे होंगे। युवा को स्थानीय रोजगार प्राप्त होंगे। युवा अपने बूढ़े होते हुए मां-बाप के साथ रहेगा। युवा अपनी पत्नी और बड़े होते बच्चे के साथ रहेगा, जिससे बड़े होते हुए नौनिहालों को पिता का प्यार और दादा-दादी का मार्गदर्शन और संचित ज्ञान मिलेगा। युवा और उनके नौनिहालों को स्वस्थ वातावरण मिलेगा तो स्वास्थ्य भी अच्छा रहेगा और पूरा परिवार अवसाद से दूर रहेगा। परिवार और समाज में सहकारिता का विकास होगा, जिससे जोतों का बंटवारा नहीं होगा। परिवार और समाज में सौहार्दता के साथ समृद्धि और खुशहाली आएगी। युवाओं के वहां पर निवास करने से वहां खरीददारी ज्यादा होगी और नकदी संकट की समस्या समाप्त होगी। स्थानीय लोगों का जागरूक युवाओं के साथ रहने से उन्हें नूतन मार्गदर्शन और तकनीक का ज्ञान होता रहेगा। रियल इस्टेट की महंगाई की समस्या समाप्त हो जाएगी। युवा अपनी कमाई का मोटा हिस्सा शहर में फिर से एक नए आशियाने बसाने में खर्च करने से बच जाएगा और इसी बचत का उपयोग कहीं पर वह चल पूंजी के रूप में प्रयोग करके ज्यादा लाभ कमाएगा। युवाओं के गांव में रहने से गांव को भी इनके सानिध्य और सामर्थ्य के अनेक लाभ मिलेंगे और ये युवा अपनी नए सोच से अपने क्षेत्र की राजनीति से लेकर अर्थ तक क्रांतिकारी बदलाव लाएंगे। जीवनयापन के खर्च भी कम होंगे। अत: बचत ज्यादा होगी। बचत ज्यादा होगी तो विनियोग ज्यादा होगा और विनियोग ज्यादा होगा तो देश की जीडीपी बढ़ेगी। क्षेत्र और देश की जीडीपी बढ़ेगी और सर्वांगीण विकास होगा तथा किसानों आंदोलित नहीं होंगे।
(लेखक वरिष्ठ अर्थशास्त्री व सामाजिक तथा राजनैतिक विश्लेषक हैं।)

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