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मेहनतकश : अखबार बेचकर बेटी को बनाया डॉक्टर

अनिल मिश्रा

कहते हैं कि हर एक की जिंदगी में बुरे वक्त के बाद अच्छा वक्त जरूर आता है। कड़ी मेहनत और किस्मत व्यक्ति को फर्श से अर्श तक ले जाती है। किशनचंद लासी के साथ भी ऐसा ही हुआ। वैसे बता दें कि सिंधी भाषी समाज ने मेहनत के बल पर अपनी बुलंदियों को छुआ है। उन्हीं में से एक नाम है किशनचंद लासी का। कड़ी मेहनत पर विश्वास करनेवाले किशनचंद लासी ने अखबार बेचकर अपने दो बच्चों को अच्छे मुकाम तक पहुंचाया है। इसके बावजूद किशनचंद बच्चों से हमेशा कहते हैं कि `जब तक है दम, तब तक हैं हम।’
किशनचंद लासी बताते हैं कि वे सितंबर सन १९९० यानी ३२ साल से पेपर बेचने का काम कर रहे हैं। ठंडी हो या गर्मी या हो बरसात सुबह ४ बजे उठकर उल्हासनगर रेलवे स्टेशन जाकर पेपर लाते हैं और उल्हासनगर वैंâप नंबर दो, खेमानी चौक पर पेपर बेचते हैं, बिना थके, बिना रुके। इतना ही नहीं, लोगों के घरों में वे पेपर ले जाकर भी पहुंचाते हैं। पेपर बेचकर बेटे आशीष को मुंबई के नामी कालेज से बी.एस़ सी. आई.टी. पढ़ाया। आशीष आज विद्याविहार की एक नामी कंपनी में सहायक मैनेजर हैं। वहीं उनकी बेटी स्नेहा जोगेश्वरी में पशु चिकित्सक अर्थात पशु डॉक्टर की पढ़ाई कर रही हैं। अपनी संघर्ष गाथा को बयां करते हुए किशनचंद ने बताया कि बच्चों की पढ़ाई में मेरी आर्थिक स्थिति को देखकर शिक्षकों के अलावा नवजीवन बैंक का भी काफी सहयोग रहा है। उन्होंने नवजीवन बैंक के प्रबंधक वर्ग का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि बैंक ने भी सामाजिक धर्म को निभाया है। उन्होंने कहा कि कोरोना काल में काफी दिक्कत आती पर बेटे ने एहसास नहीं होने दिया। बरसात व साप्ताहिक अवकाश के दिन थोड़ी तकलीफ होती है। अखबारों को लेकर किशनचंद का कहना है कि अब इलेक्ट्रॉनिक युग आने के साथ ही नई पीढ़ी की रुचि ऑनलाइन पढ़ाई की ओर अधिक होने के चलते पेपर की बिक्री भी काफी घट गई है। शहर के कई धन्ना सेठों ने पेपर के बिल नहीं दिए। इसके कारण भी परेशानी का सामना करना पड़ा। लेकिन कुछ भी हो पर अखबार के चलते ही मैं अपने बच्चों को काबिल बना पाया हूं।
गौरतलब है कि लासी प्रतिदिन १८ घंटे मेहनत करते हैं। उनकी खेमानी स्कूल के पास एक छोटी सी दुकान है, जिसमें पहले लेखन सामग्री, पाठ्यपुस्तक बेचते थे, पर जबसे सरकार ने नि:शुल्क पुस्तक देना शुरू कर दिया है। उसके बाद अब केवल पेपर ही बेचते हैं। परिवार में पत्नी दो बच्चे, एक बड़े भाई नारायणदास (८०) हैं, जो अकेले हैं।

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