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यादें-मुलाकातें

उनकी याद तो हमें हर माह मिलती है,
जैसे किसी शख्स को दफ्तर से तनख्वाह मिलती है,
बाकी दिनों की मशक्कत का कोई मलाल नहीं,
क्योंकि एक ही रोज इतनी वाह-वाह मिलती है।
बात करें उनकी तो जैसे गर्मी खामख्वाह ही निकलती है,
ऐसा जलवा है, वो जिस भी महफिल में तशरीफ लाएं,
जाम में जमीं वो बर्फ अपने आप ही पिघलती है।
अंदाज लगाना मुश्किल है, वफा किसको मिलती है?
अब तक की मुलाकातों में तो वो खफा ही मिलती है,
कोशिशें दर कोशिशें जारी हैं, मुतासिर करने की,
ना जाने खुद को दवा-ए-वफा कब मिलती है?
सुना है कई बार मिलने को वो जरूर मचलती है,
फिर अपने अंदर के इस ख्वाब को खुद ही कुचलती है,
मिलने के मौके ढेरों आए, खाली गए
वक्त निकलने पर सिर्फ हाथ ही मलती है।
-अनिल ‘अंकित’, गुरुग्राम