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भारतीय समाज में असभ्याचार

डॉ. सुषमा गजापुरे `सुदिव’

एक देश समाज द्वारा बनता है और समाज व्यक्तियों द्वारा। अर्थात एक आदर्श और विकासशील देश के पीछे उस देश के नागरिकों का भी बहुत बड़ा योगदान होता है। आज जब हम विदेश की ओर दृष्टि डालते हैं तो निहाल हो जाते हैं। साफ सुंदर शहर, गांव, स्वच्छ रास्ते, बाजार, कॉलोनियां, वहां के परिवहन, रेलवे-स्टेशन, बस-स्टॉप, स्कूल, रेस्टोरेन्ट और वहां के अनुशासित और विनम्र लोग भी। जी हां, सब कुछ हमारे भारत से भिन्न। आखिर यह भिन्नता क्यों और वैâसे हुई? यह प्रश्न मन में आता है किंतु यह प्रश्न सरकार से पूछने से पहले हमें अपने आप से पूछना चाहिए। यहां हम अपने देश और विदेशों की कोई तुलना नहीं कर रहे, बल्कि आत्मचिंतन कर रहे हैं।
समस्त विश्व हमारी भारतीय संस्कृति को बड़े सम्मान से देखता है। किंतु हमारे देश में आज इतनी गंदगी, इतना शोर, बदमिजाजी, नियमों और कानूनों की अवहेलना इस स्तर पर हो रही है कि लगता नहीं कि हम एक सभ्य समाज हैं? क्या सोचते होंगे वह विदेशी पर्यटक जो हमारे देश में आते हैं और यह सब देखते हैं? जबकि हम अन्य देशों की सुंदरता, स्वच्छता, अनुशासन, बेहतर व्यवस्थाएं, लोगों का व्यवहार और एक शांतिपूर्ण वातावरण से आकर्षित होते हैं लेकिन हम अपने देश में ऐसा आचरण नहीं करते। हमारे आचरण में आखिर ऐसा विरोधाभास क्यों?
दरअसल, अनुशासन हमारे जीवन का एक ऐसा सूत्र है जो हमें एक आदर्श परिवार, समाज और सभ्य राष्ट्र के रूप में पहचान दिलाता है। जिसके लिए हमें सतत प्रयास करना होगा। आज सबसे अधिक असभ्यता हमारे बोलचाल में आई है। सरेराह, सरेआम गाली-गलौज करना जैसे सामान्य-सी बात हो गई है। अधिकांश लोगों ने विनम्रता से बात करना ही छोड़ दिया है। छोटी-छोटी बातों पर उग्र होकर वे आपा खो देते है और अमर्यादित भाषा का उपयोग करने लगते हैं। वे यह भी नहीं देखते कि आसपास बच्चे हैं, महिलाएं हैं। इतना ही नहीं, आजकल तो लोग आपस में सामान्य वार्तालाप में भी गालियों का उपयोग ऐसे करते हैं जैसे वह सामान्य है। आजकल के युवा-युवतियां भी अब खुलेआम गालियां देने में जरा भी नहीं हिचकते।
हमारे देश में स्वच्छता बहुत बड़ी समस्या है। अपना घर साफ करना और सारा कचरा कचरे के डिब्बे में न डालकर बाहर फेंक देना या बाहर कहीं खुले में या रास्ते पर फेंक आना, यह सोचकर कि अपना घर तो साफ हो गया अब सार्वजनिक स्थलों की सफाई का जिम्मा सरकार या नगरपालिका का है।
सड़क पर यातायात के नियमों की अवहेलना करना तो शायद हम भारतीयों का जन्मसिद्ध अधिकार है। हम सोचते हैं कि हमने सड़क का टैक्स दिया है तो मनचाहे गाड़ी वैâसे भी चलाएं लेकिन इससे सड़क पर कितनी दुर्घटनाएं होती हैं। जहां सार्वजनिक स्थलों में टिकिट की व्यवस्था होती है, जैसे रेलवे-स्टेशन, बस-स्टैंड, सिनेमाघर, हॉस्पिटल, बैंक या किसी कार्यालय में, जहां टिकिट के लिए कतारें लगती हैं तब कतार तोड़कर आगे आने की लालसा में भारतीय सबसे आगे रहते हैं।
सार्वजनिक स्थलों पर शौच या मूत्र विसर्जन करने में भारतीय पुरुषों को थोड़ी भी असहजता नहीं महसूस होती। न वे जगह देखते हैं, न सफाई का ध्यान रखते हैं। लोग वहां से गुजरेंगे तो उन्हें कितनी गंदगी, बदबू और बीमारियों का सामना करना पड़ेगा, क्या यह सोचना हमारी जिम्मेदारी नहीं है? आप किसी भी बड़े-बड़े सरकारी या पब्लिक दफ्तरों में जाएंगे तो वहां की दीवारें पान और गुटकों की पीक से रंगी हुई दिखाई देंगी। क्या यही हमारे भारत की संस्कृति है? शौचालयों की हालत तो बद से बदतर होती है। बसों और ट्रेनों में गंदगी करना तो आम है। शौचालयों में पानी डालना तो अक्सर लोग भूल जाते हैं। उनके बाद कोई और भी शौचालय का उपयोग करेगा, इतनी तो संवेदनशीलता होनी चाहिए।
पिकनिक स्थल हो या पार्क, नदियों या तालाबों के आसपास के खूबसूरत स्थल जहां भी लोग जाएंगे वहां भी गंदगी पैâलाएंगे, फूल-पत्ती तोड़ेंगे, चीजों को खराब करेंगे, पॉलीथीन-पेपर यहां-वहां पानी में फेंक आएंगे। खाने-पीने का जूठन वहीं छोड़ आएंगे, इस तरह हम अपना मनोरंजन तो पूरा कर लेते हैं लेकिन अपने पीछे कितनी गंदगी छोड़ आते हैं। क्या उसे साफ रखना हमारी जिम्मेदारी नहीं? बुजुर्गों और महिलाओं का सम्मान करना तो अब भूल ही जाइए। बुजुर्गों को तो सम्मान से जगह भी नहीं देते। दफ्तरों में लोग अपना काम ठीक से नहीं करते, समय पर आते नहीं, अपने ही काम करने के लिए रिश्वत मांगी जाती है। महिलाओं और युवतियों की छेड़छाड़ तो आम बात है, क्या सम्मान से जीना उनका अधिकार नहीं?
आजकल वीआईपी कल्चर बड़े जोर-शोर से अनुशासन तोड़ने में लगा हुआ है। मंदिरों, बैंकों, कार्यालयों या मतदान की कतारों में मंत्री, बड़े अफसर, अमीर कभी खड़े दिखाई नहीं देते। वे अपनी वीआईपी कल्चर की धौंस देकर आगे आते है या पहले चले जाते है। जब राजा ही अनुशासन तोड़ेगा तो प्रजा के लिए क्या उदाहरण प्रस्तुत करेगा। सार्वजनिक उत्सवों में लाउडस्पीकर लगाकर जो शोर होता है उससे छोटे बच्चों, बुजुर्गों, विद्यार्थियों और मरीजों को कितनी परेशानी होती है इस पर कोई विचार नहीं करता। सबके लिए नियम बने हैं लेकिन उन नियमों का पालन कौन करवाए?
हमारे प्राचीन स्मारक, संग्रहालय या ऐतिहासिक इमारतों में जाकर थूकना या अपना नाम कुरेदकर लिखना ये भी कोई अच्छी बात नहीं है। तीर्थ स्थलों की दशा किसी से भी छुपी नहीं है। देखा जाए तो गंदगी पैâलाकर हम धार्मिकता और शुद्धता का उपहास ही करते हैं। इस तरह कुछ दिनों में भारतीयों में नागरीय अनुशासन में भारी कमी आई है। आज आवश्यकता है कि हम अपने भीतर देखें, न की बाहर। सभ्यता, अनुशासन, संस्कृति और नैतिकता की बात तब करनी चाहिए जब हम स्वयं उसका पालन करते हों। विदेश में जाकर उस देश के सभी नियमों का पालन करना और उसका गुणगान करना और देश में लौटकर सभी नियम ताक पर रख देना, यह वैâसा सभ्याचार है?
(स्तंभ लेखक वैज्ञानिक, आर्थिक और समसामयिक विषयों पर चिंतक और विचारक है)

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