मुख्यपृष्ठनए समाचारमोदी जी, आप ही बताइए ... देश में कितने गरीब हैं?

मोदी जी, आप ही बताइए … देश में कितने गरीब हैं?

सरकारी डेटा कहता है १८.५० करोड़, फिर ८० करोड़ को मुफ्त में राशन क्यों?

देश के ५ राज्यों में विधानसभा के चुनावों की प्रक्रिया चल रही है और लोकसभा २०२४ का चुनाव भी कुछ महीने दूर है, ऐसे में देश में चुनावी बिसात पर सियासी चालें चली जा रही हैं। मगर इस चक्कर में देश की जनता उलझन में है कि आखिर सच क्या है? देश में गरीबी पर न जाने कितने चुनाव लड़े जा चुके हैं। मगर कन्फ्यूजन यह है कि इस वक्त देश में कितने गरीब बचे हैं? केंद्र सरकार का डेटा बताता है कि देश में १८.५० करोड़ गरीब बचे हैं, जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद एक चुनावी रैली में यह संख्या ८० करोड़ बताई है। ऐसे में किसके ऊपर विश्वास किया जाए? अब सरकार और प्रधानमंत्री कोई अलग तो नहीं हैं। ऐसे में क्यों न सीधे प्रधानमंत्री से ही पूछा जाए कि मोदी जी, आप ही बताइए कि देश में कितने गरीब हैं?
दरअसल, दो दिन पहले ही एशिया-पैसेफिक ह्यूमन डेवलपमेंट रिपोर्ट जारी हुई है। इसमें इस बात पर चिंता जाहिर की गई है कि हिंदुस्थान में आय और संपत्ति में असमानता बढ़ती जा रही है। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि हिंदुस्थान में बहुआयामी गरीबी के नीचे रहने वालों की संख्या २०१५-१६ में कुल आबादी की २५ फीसदी थी। २०१९-२१ के दौरान यह घटकर १५ फीसदी पर आ गई है। यह १८.५० करोड़ है। इनकी आय १८० रुपए से भी कम है। ये डेटा नीति आयोग से लिया गया है। अब मोदी सरकार अपनी पीठ थपथपा रही है कि बीते पांच सालों के उसके कार्यकाल के दौरान १३.५० करोड़ लोग गरीबी रेखा से ऊपर उठ गए। बहुआयामी गरीबी सूचकांक मापने के तीन आधार हैं, जिसमें स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन स्तर शामिल हैं।इसमें तीन स्वास्थ्य, दो शिक्षा और ७ जीवन स्तर से जुड़े हैं। नीति आयोग ने बताया कि देश में बहुआयामी गरीबी के नीचे आने वाली जनसंख्या में गिरावट की बड़ी वजह पोषण में सुधार, स्कूली वर्ष में इजाफा, स्वच्छता और रसोई गैस की उपलब्धता में सुधार है। बाल और किशोर मृत्यु दर, मातृ स्वास्थ्य, स्वच्छता, पेयजल, बिजली, आवास, परिसंपत्ति और वित्तीय समावेषण के चलते भी ये संभव हो सका है। हालांकि, नीति आयोग के बहुआयामी गरीबी सूचकांक पर सवाल भी उठते रहे हैं, क्योंकि इसमें डेटा कोरोना काल का है। तब से गंगा में कितना पानी बह चुका है। पहले देश में गरीबी को मापने के लिए पांच सालों के अंतराल पर खपत के डेटा का इस्तेमाल किया जाता था, लेकिन २०११ के बाद से ऐसा कोई सर्वे डेटा उपलब्ध नहीं है। ऐसे में देश के आर्थिक विकास दर में तेजी के साथ सभी आय वाले वर्गों के खपत में बढ़ोतरी को आधार मानकर गरीबी के डेटा का पता लगाया जा रहा है।

तेंदुलकर कमिटी की सिफारिश से तय होती है गरीबी
तेंदुलकर कमिटी ने शहरी क्षेत्र में गरीबी रेखा के नीचे आने वाले परिवारों की पहचान करने के लिए १,००० रुपए प्रति व्यक्ति मासिक आय निर्धारित किया था, जबकि ग्रामीण परिवारों के लिए ८१६ रुपए निर्धारित किया गया। २०१४ में रंगराजन कमिटी का गठन गरीबी रेखा के नीचे रह रहे लोगों का पता लगाने के लिए किया गया, पर आज भी देश में गरीबी रेखा के नीचे आने वालों की पहचान तेंदुलकर कमिटी द्वारा तय किए गए नियम के तहत ही की जाती है।

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