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मोदी, महाराज और मोहब्बत

(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक हैं। देश के प्रमुख प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

मध्य प्रदेश में इस बार पिछले सारे रिकॉर्ड तोड़ते हुए ७७ फीसदी वोटिंग हुई है। यह पिछले चुनाव से एक फीसदी ज्यादा है। इस बार महिलाओं ने मतदान में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया है। बढ़े हुए इस मतदान के मायने तलाशे जा रहे हैं। भाजपा इससे काफी उत्साहित है जबकि कांग्रेस बंपर वोटिंग को बदलाव का संकेत मान रही है। पिछले विधानसभा चुनाव में जब उस से पहले हुए चुनाव से ज्यादा भारी मतदान हुआ था तब कांग्रेस की सरकार बनी थी। हालांकि, बाद में ज्योतिरादित्य सिंधिया के पाला बदलने से भाजपा की सत्ता में वापसी हो गई। पिछले कई विधानसभा चुनाव के नतीजे और आंकड़े बताते हैं कि ७५ फीसदी से ज्यादा वोटिंग राज्य में बदलाव का संकेत होते हैं। इस बार भाजपा और कांग्रेस के बीच कड़ी टक्कर है। हालांकि, कई विधानसभा सीटों पर त्रिकोणीय मुकाबला भी है। सपा-बसपा ने भी जमकर प्रचार किया है। यही बात कांग्रेस के खिलाफ जा रही है क्योंकि वोटों का बिखराव होगा। `मोदी का चेहरा’, `महाराज की गद्दारी’ और `मोहब्बत की दुकान’ के इस संघर्ष पर सबकी निगाहें लगी हैं।

तेलंगाना में चतुष्कोणीय मुकाबला?

तेलंगाना में चुनावी समीकरण दिन- ब-दिन रोचक होता जा रहा है। सत्तारूढ़ बीआरएस ने ९५ सीटें जीतने का दावा किया है। कांग्रेस ने अपनी जीत तय मान रखी है। भाजपा भी जीत के दावे कर रही है। एमआईएम को इतनी सीटों की उम्मीद है कि वह सत्ता का खेल बिगाड़ सके। जमीन खोने से नाराज गन्ना किसान, बेरोजगार युवा, राज्य सिविल सेवा परीक्षा आयोजित करने में सरकार की विफलता के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करनेवाले युवा सरकार के खिलाफ लामबंद हुए हैं। चुनाव को त्रिकोणीय या चतुष्कोणीय बनाने का हर संभव प्रयास हो रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में अपने कमजोर संगठनात्मक ढांचे के कारण भाजपा बीआरएस को सीधे चुनौती देने की स्थिति में नहीं दिखती है, लेकिन शहरी क्षेत्रों में बीआरएस विरोधी वोटों को विभाजित करके कांग्रेस को परेशान करने का उसने मंसूबा बनाया है। अल्पसंख्यकों के खिलाफ जहर उगलने वाले एक विवादित विधायक को पूरी छूट दे रखी है। मुस्लिम इलाकों में ओवैसी के खिलाफ बोलकर ध्रुवीकरण का खेल हो रहा है। कांग्रेस और बीआरएस इस नूरा कुश्ती से कैसे निपटते हैं यह देखना दिलचस्प होगा।

मैन ऑफ द इलेक्शन !

३ दिसंबर को पांच राज्यों के चुनावी नतीजों की घोषणा हो जाएगी। तब तक राजनीतिक अटकलबाजियों का दौर चलता रहेगा। छत्तीसगढ़ में भी सीएम पद को लेकर अभी से चर्चा शुरू हो गई है। कांग्रेस की तरफ से सीएम की कुर्सी के दो दावेदारों सीएम भूपेश बघेल और डिप्‍टी सीएम टीएस सिंहदेव के बीच रस्साकशी होनी तय है। छत्तीसगढ़ के बाबा यानी डिप्टी सीएम टीएस सिंह देव भी सीएम पद के बड़े दावेदार हैं। हालांकि, उन्होंने वर्तमान मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को प्राथमिकता देने पर सहमति दर्शाई है। उनका मानना है कि अगर बाकी लोगों पर भी विचार किया जाएगा तो यह उनके नाम के बाद होगा। वैसे वह विराट की कप्तानी और शमी के मैन ऑफ द मैच का उदाहरण देकर शायद बघेल को कप्तान और खुद को `मैन ऑफ द इलेक्शन’ बताना चाह रहे हैं कि चुनाव उन्होंने जितवाया। साथ ही अब `मैं चुनाव नहीं लड़ूंगा कहकर वह कांग्रेस हाईकमान को अपने पक्ष में तैयार करना चाहते हैं। बघेल तो खैर बड़े दावेदार हैं ही। नतीजों से पहले दोनों फिलहाल चुप ही रहें तो बेहतर है, क्योंकि जनता का पैâसला आना अभी बाकी है।

राजस्थान का रण

राजस्थान विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और भाजपा ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। भाजपा पीएम मोदी और कांग्रेस राहुल गांधी के जरिए माहौल बना रही है। भाजपा का पूरा फोकस इस बार कांग्रेस के किले में सेंध लगाने पर है। हालांकि, गहलोत और पायलट ने अब तक ऐसा कोई मौका नहीं दिया है। आश्चर्यजनक तौर पर ईडी के घेरे में आए अशोक गहलोत के बेटे के पक्ष में प्रेस कॉन्प्रâेंस कर सचिन पायलट ने कइयों को चौंकाया था। अशोक गहलोत के कई ट्वीट्स को उन्होंने रीट्वीट कर यह संदेश दिया कि पार्टी में अब सब ठीक है। सोनिया गांधी, प्रियंका और राहुल गांधी की मौजूदगी में भी दोनों सहज रूप से तस्वीरें खिंचवाते नजर आए। भाजपा दोनों के बीच की अनबन को अब तक भुना पाने में असफल रही है। हां, अशोक गहलोत महिला सुरक्षा को लेकर जरूर निशाने पर हैं। राजस्थान में महिलाओं के खिलाफ होनेवाले अत्याचार के मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा लगातार मुख्यमंत्री अशोक गहलोत पर हमलावर हैं। राजस्थान के रण में काफी कुछ महिलाओं की भूमिका पर निर्भर है कि वह इस मुद्दे पर क्या रुख अपनाती हैं।

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