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चुनावी साल में बढ़ेंगी मोदी की मुश्किलें … तेल की कीमतें बढ़ने से भड़केगी महंगाई!… हूतियों के हमले से समुद्री परिवहन प्रभावित

हिंदुस्थान के लिए यह चुनावी साल है। मोदी सरकार राम मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा समारोह को मेगा इवेंट बनाकर माहौल बनाने की कोशिश कर रही है, पर महंगाई मोदी सरकार का खेल खराब कर सकती है। दरअसल, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जो खेल चल रहा है, उससे कच्चे तेल की कीमतें बढ़ रही हैं। तेल के महंगा होने से परिवहन महंगा हो जाएगा और इसका असर सीधे खाद्य सामग्रियों की माल ढुलाई पर पड़ेगा और वे महंगी हो जाएंगी। ऐसे में इस चुनावी साल में मोदी की मुश्किलें बढ़ना तय है।
दरअसल, हिंदुस्थान से ४,००० किमी दूर हो रहे एक संघर्ष ने चुनावी साल में मोदी सरकार की चिंता बढ़ा दी है। ईरान के सपोर्ट वाले यमन के हूती विद्रोहियों ने लाल सागर में आतंक मचा रखा है। नवंबर से ही वे ही व्यवसायिक जहाजों को निशाना बना रहे हैं। इससे दुनिया की बड़ी शिपिंग कंपनियों ने लाल सागर के रास्ते अपने ऑपरेशन रोक दिए हैं। वे स्वेज नहर की बजाय वैâप ऑफ गुड होप रूट का इस्तेमाल कर रहे हैं। यह बहुत लंबा और खर्चीला रास्ता है। इससे हिंदुस्थान की चिंता बढ़ गई है। रूस से आने वाला हिंदुस्थान का कच्चा तेल लाल सागर के रास्ते आता है। साथ ही हिंदुस्थान से यूरोप को पेट्रोलियम प्रॉडक्ट्स का निर्यात भी इसी रास्ते होता है। अगर लंबे समय तक लाल सागर में तनाव की स्थिति रहती है तो इससे हिंदुस्थान में महंगाई बढ़ना तय है। इस साल देश में आम चुनाव होने हैं और इससे पहले महंगाई बढ़ने से सरकार की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। हिंदुस्थान के लिए बड़ी चिंता की बात यह है कि उसका सबसे ज्यादा कच्चा तेल रूस से आ रहा है। इसका अधिकांश हिस्सा स्वेज नहर के रास्ते आ रहा है। नवंबर में हिंदुस्थान ने रूस से रोजाना १७.३ लाख बैरल कच्चे तेल का आयात किया था। अगर यह संकट गहराता है तो खासकर रूस से होने वाले कच्चे तेल के आयात पर असर पड़ सकता है। हिंदुस्थान को वैकल्पिक रास्ता खोजना होगा। हालांकि, दोनों देशों ने नंवबर में संकेत दिए थे कि वे ईस्टर्न मेरिटाइम कॉरिडोर का इस्तेमाल कर सकते हैं। यह चेन्नई को रूस के व्लादीवोस्तोक पोर्ट से जोड़ता है, लेकिन अभी तक यह ऑपरेशनल नहीं हुआ है। शुरुआत में ग्लोबल ऑयल मार्वेâट ने हूती विद्रोहियों की इस करतूत को हल्के में लिया था, लेकिन इस कारण कच्चे तेल की कीमत में काफी तेजी आई है। १९३ किमी लंबी इस नहर का ग्लोबल ट्रेड में १२ फीसदी योगदान है। दुनिया का ३० फीसदी कंटेनर मूवमेंट इसी रास्ते से होता है। हूती विद्रोही अब तक कई जहाजों पर ड्रोन और एंटी-शिप मिसाइलों से हमला कर चुके हैं। इन जहाजों को बाब अल-मंदेब में निशाना बनाया गया है। स्वेज नहर की अहमियत को इस बात से समझा जा सकता है कि मार्च २०२१ में जब एक बड़ा जहाज छह दिन तक स्वेज नहर में अटक गया था तो ग्लोबल सप्लाई चेन पर संकट खड़ा हो गया था। यह नहर एशिया और यूरोप की लाइफलाइन है। यूरोप को तेल और डीजल की सप्लाई इसी रास्ते होती है। इसके साथ ही पाम ऑयल और अनाज की सप्लाई भी इसी रास्ते होती है। २०२१ में स्वेज नहर में जहाज फंसने से हिंदुस्थान भी प्रभावित हुआ था। तब हिंदुस्थान का करीब २०० अरब डॉलर का समुद्री व्यापार इसी रास्ते होता था। लेकिन कोरोना महामारी के बाद इसमें काफी बढ़ोतरी हुई है। हिंदुस्थान स्वेज नहर के रास्ते यूरोप को पेट्रोलियम उत्पाद, फूड प्रॉडक्ट्स और इलेक्ट्रॉनिक सामान एक्सपोर्ट करता है। जहाजों को अब काला सागर के लंबे रास्ते को इस्तेमाल करना पड़ रहा है। इससे जहाजों को यूरोप से हिंदुस्थान पहुंचने में १५ दिन का ज्यादा समय लगता है। शिपिंग इंडस्ट्री के सूत्रों का कहना है कि जहाजों की लागत बढ़ जाएगी। इनकी एक दिन की लागत ६०,००० डॉलर बैठती है। इंडिया-यूरोप रूट पर कंटेनर की कॉस्ट १.५ से दोगुना बढ़ जाएगी। अब तक प्रâेट रेट्स में कोई बड़ा बदलाव देखने को नहीं मिला है लेकिन आने वाले दिनों में इसका असर दिखने की आशंका है।

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