" /> जम्मू कश्मीर में लाॅकडाउन के साए में मनी ईद

जम्मू कश्मीर में लाॅकडाउन के साए में मनी ईद

कश्मीर की बदकिस्मती ही कही जा सकती है कि पिछले दो साल से लॉकडाउन में रह रहे कश्मीरियों को चौथी ईद पाबंदियों के बीच मनानी पड़ी है। दो बार ईद सुरक्षाबलों के लॉकडाउन में मनाई गई थी और दो बार की ईद कोरोना के कारण पैदा हुई परिस्थितियों में लागू लॉकडाउन में। इतना जरूर था कि महामारी के कारण कश्मीर में 153 साल में यह तीसरा अवसर था कि ईद उल जुहा महामारी के बीच मनाया गया है।

वर्ष 2019 में पांच अगस्त को राज्य के दो टुकड़े करने और उसकी पहचान खत्म किए जाने की कवायद के बाद लागू किए गए लॉकडाउन में ही कश्मीरियों ने तीन ईद मनाई थी। इस बार के लॉकडाउन में फर्क सिर्फ इतना है कि उन्हें खरीददारी करने की इजाजत जरूर मिली थी।

जबकि इस तथ्य को नकारा नहीं जा सकता कि 153 सालों में तीसरी बार लोग महामारी के कारण लॉकडाउन में ईद उल जुहा मनाने को मजबूर हुए हैं। इससे पहले वर्ष 1868 में कश्मीर में प्लेग फैलने पर लोगों ने पूर्ण बंद के बीच ईद मनाई थी।
ऐसी ही स्थिति इन दिनों कोरोना संक्रमण के कारण पैदा हुई है। बताया जाता है कि वर्ष 1868 में जम्मू-कश्मीर में डोगरा प्रशासन ने महामारी पर काबू पाने के लिए पूर्ण बंद किया था। जम्मू-कश्मीर में किसी के प्रवेश या प्रस्थान पर रोक लगाई गई थी। स्वास्थ्य विशेषज्ञों की ओर से जारी दिशा-निर्देशों पर अमल करने की हिदायत दी गई थी। इतिहासकारों के अनुसार महामारी पर काबू पाने में डेढ़ वर्ष लगे थे और सैकड़ों लोग हताहत हुए थे। बंद का उल्लंघन करनेवालों के खिलाफ कार्रवाई भी की जाती थी। किसी संक्रमित के छुपे होने पर उसे अस्पताल में भर्ती करवाया जाता था, तब प्लेग फैलने पर लोगों को अपने घरों की चहारदीवारी के बीच ईद मनानी पड़ी थी। ईद उल जुहा के मौके पर बहुत कम लोग जानवरों की कुर्बानी दे पाए थे।

कश्मीर विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग में तैनात एक स्कालर डार अजीज के बकौल कश्मीर में 1868 में प्लेग और 1918 में कालरा ने तांडव मचाया था। इस महामारी को हवा-ए रद्दी (दूषित हवा) नाम दिया गया था। उस समय कश्मीर की आबादी 6.5 लाख थी, लेकिन महामारी फैलने के बाद अधिकांश लोग दूसरे स्थानों पर पलायन कर गए थे, जबकि सैकड़ों इस महामारी की भेंट चढ़ गए थे। महामारी खत्म होने तक कश्मीर की आबादी 2.5 लाख रह गई थी। अजीज ने कहा कि 1918 में ईद उल फितर से पहले महामारी पर काबू पा लिया गया था और अब 1918 के बाद पूरे सौ साल के बाद कश्मीर फिर से वैसी ही परिस्थितियों से गुजर रहा है।