मुख्यपृष्ठस्तंभकिस्सों का सबक : पारिश्रमिक

किस्सों का सबक : पारिश्रमिक

डॉ. दीनदयाल मुरारका
विख्यात बांग्ला लेखक एवं महान कहानीकार शरद चंद्र चट्टोपाध्याय ने लेखन की शुरुआत की ही थी। अक्सर उनकी रचनाएं लौटा दी जातीं और यदि कभी-कभार अगर छप भी गर्इं तो छपने के बाद उन्हें अन्य लेखकों के बनिस्बत कम पारिश्रमिक मिलता।
एक बार उन्होंने ‘स्वामी’ शीर्षक नामक अपनी रचना उस समय की चर्चित पत्रिका ‘नारायणा’ में प्रकाशन के लिए भेजी। पत्रिका के संपादक को यह रचना इतनी पसंद आई कि अगले ही अंक में वह पत्रिका की कवर स्टोरी के रूप में छाप दी गई। उस समय ‘नारायणा’ में प्रकाशित एक कहानी या लेख का पारिश्रमिक कम-से-कम ५० रुपए हुआ करता था। लेकिन कई बार इससे ज्यादा पारिश्रमिक भी दिया जाता था।
इसका निर्णय रचनाकार और लेखक की प्रतिष्ठा देखकर संपादक गण करते थे। लेकिन शरद चंद्र की इस रचना के बारे में संपादक मंडल कोई निर्णय नहीं ले सका। उनकी दृष्टि में यह रचना अमूल्य थी। तय हुआ कि इसका पैâसला शरद चंद्र जी स्वयं ही करें। दो दिनों के बाद उनके पास पत्रिका के कार्यालय से एक कर्मचारी आया और उन्हें प्रधान संपादक की एक चिट्ठी सौंपी। चिट्ठी में लिखा था कि पत्र के साथ एक हस्ताक्षरित ब्लैंक चेक आपको भेज रहा हूं। एक महान लेखक की इस महान रचना के लिए मुझे बड़ी सी बड़ी रकम लिखने में भी संकोच हो रहा है। कृपा करके खाली चेक में आप खुद ही अपना पारिश्रमिक डाल लें। मैं आपका आभारी रहूंगा।
शरद चंद्र जी ने राशि की जगह केवल ७५ रुपए भरकर प्रधान संपादक को पत्र लिखा- मान्यवर आपने मुझे जो सम्मान दिया है। उसका कोई मूल्यांकन नहीं किया जा सकता। आपका यह पत्र मेरे लिए बेशकीमती है और यही मेरा सम्मान है। उनका पत्र पढ़कर संपादक गण बेहद प्रभावित हुए। महान लेखक की गरिमा ने उन्हें नतमस्तक कर दिया था।

 

 

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