मुख्यपृष्ठस्तंभआज और अनुभव :  सुरंग का सामना... घुटन और घबराहट पर संयम...

आज और अनुभव :  सुरंग का सामना… घुटन और घबराहट पर संयम की जीत

कविता श्रीवास्तव

उत्तराखंड के उत्तरकाशी में सिल्क्यारा में निर्माणाधीन टनल में फंसे ४१ मजदूरों को केवल सकुशल बाहर निकलना ही नहीं, बल्कि लगातार १३ दिनों तक उनका हौसला बने रहना भी बहुत बड़ी उपलब्धि कही जाएगी। टनल का हिस्सा दीपावली के दिन धंसा था और मजदूर भीतर फंस गए। १३ दिनों तक वे जिंदगी और मौत की जंग के बीच अधर में लटके हुए थे। देश-विदेश के तमाम अभियांत्रिकी व तकनीकी विशेषज्ञों ने कोशिशें कीं। अनेक मशीनें एयरलिफ्ट करके लाई गर्इं। एनडीआरएफ, बीआरओ, सेना और अनेक एजेंसियां सतत प्रयासरत रहीं। लेकिन इतने दिनों में भीतर फंसे ४१ मजदूरों ने अपना हौसला नहीं तोड़ा। विपरीत परिस्थितियों में भी ढांढस बांधे रखा। जिंदगी और मौत के बीच अनिश्चितता में भी विचलित नहीं हुए। यह अद्भुत साहस का उदाहरण है। इनमें बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, उड़ीसा, हिमाचल प्रदेश के अलावा उत्तराखंड के मजदूर भी थे। उन्हें दवाइयां, पानी, ऑक्सीजन और कुछ खाद्य सामग्री दी जा रही थीं, लेकिन लगातार गुफा जैसे घुटनभरे वातावरण में कैद रहे इन श्रमिकों की मानसिकता कैसी हुई होगी इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है। मुझे याद आता है, जब हमारी बिल्डिंग की पांचवीं और छठीं मंजिल के बीच एक कामवाली बाई लिफ्ट में फंसी थी और बैठकर रो रही थी। लिफ्ट दो मंजिलों के बीच में रुकी थी और उसका दरवाजा नहीं खुल रहा था। हमने महिला को ढांढस बंधाया और उसे पानी दिया। बिल्डिंग के कुछ लोगों को बुला लिया और लिफ्ट मेंटेनेंस वालों को लगातार फोन करते रहे। लिफ्ट का दरवाजा खोलने का कुछ लोगों ने प्रयास किया। वॉचमैन भी कुछ हथियार लेकर आया, लेकिन सारे प्रयास विफल रहे। उस दिन रविवार था और लिफ्ट मेंटेनेंस वालों का ऑफिस बंद था, लेकिन किसी तरह मैकेनिक से संपर्क हुआ। वह ढाई घंटे बाद आया। उसके आने से पहले उस महिला की हालत चिंताजनक होने लगी थी। पहले तो वह रो रही थी परंतु बाद में बेहोश होने लगी। हम सब बाहर से उसे हौसला दे रहे थे। वह भीतर घबरा रही थी और उसे पसीना आने लगा। हमने पंखे का इंतजाम भी किया। उसकी हालत देखकर हम भी घबराने लगे थे। ढाई घंटे बाद मैकेनिक ने आकर दरवाजा खोला। टेबल-कुर्सी लगाकर उसे बाहर निकाला। उसके रिश्तेदारों को बुलाकर घर रवाना किया गया। उस घटना के बाद उसने हमारी बिल्डिंग में काम ही छोड़ दिया। वह फिर कभी नहीं आई। एक दिन मैं खुद भी उसी लिफ्ट में फंस गई। हल्ला मचा। वॉचमैन को लिफ्ट का दरवाजा खोलने की तकनीक पता थी। उसी ने बाहर निकाला, मगर जब तक मैं फंसी रही डर से मेरा ब्लडप्रेशर बढ़ने, पसीना आने और घबराहट की समस्या होने लगी थी। इसी तरह एक बार हम किसी पार्टी में जा रहे थे। मैं बाहर जा चुकी हूं यह समझकर घर वाले बाहर निकल गए, जबकि मैं बाथरूम में थी। घरवाले मेरा मोबाइल भी ले गए। बाहर से बिटिया ने ताला लगा दिया। उसकी गलती से मैं घर में ही बंद हो गई। घरवालों को दूसरी गाड़ी में जाना था, मुझे अलग। इसलिए वे मेरे लिए रुके नहीं। मेरे पास संपर्क के लिए मोबाइल भी नहीं था। वैâद जैसी सोच से घबराहट होने लगी, ब्लड प्रेशर भी बढ़ने लगा। करीब १० मिनट में मेरा पूरा शरीर पसीना-पसीना हो गया और दिमाग खिन्न हो उठा। पति को इसका एहसास हो गया और कुछ देर में वो वापस आए और मुझे बाहर निकाला। लिफ्ट और घर की वैâद के घुटन और घबराहट का मुझे अनुभव है। इसलिए मैं समझ सकती हूं कि इन १३ दिनों में उत्तराखंड के टनल में फंसे मजदूरों के मन पर क्या-क्या बीती होगी। मामूली वेतन पर मजदूरी करने के लिए वे उस टनल के भीतर गए थे। उसका हिस्सा धंसा और निकलने का रास्ता बंद हो गया। स्थिति यह बनी कि तमाम एक्सपर्ट्स यह तय नहीं कर पा रहे थे कि मजदूरों तक पहुंचाने के लिए ड्रिलिंग सामने से की जाए या बगल से या ऊपर से। क्योंकि हर तरफ से कुछ न कुछ बाधाएं आ रही थीं। कोई भी गलती श्रमिकों के भीतर ही दब जाने से उनकी जान के लिए खतरा भी बन सकती थी। बचाव कार्य में एजेंसियां इसीलिए सतर्क रहीं। क्योंकि यह खतरों भरा संवेदनशील काम था, जबकि फंसे मजदूर प्रतिकूल वातावरण में थे। वे भीतर अटक सकते हैं, उन्हें ऐसा अंदेशा नहीं था। पर अचानक हुए हादसे के कारण वे लंबे समय तक फंसे रहे। ऐसी दुर्घटना कभी भी कोई भी धोखा कर सकती है। किसी की घबराहट, बेचैनी या ब्लड प्रेशर की वजह से जान भी जा सकती है। सूर्य किरणों के अभाव में, जानलेवा गैस के बीच रह पाना कैसे संभव है? मजदूरों को पाइप के जरिए मिल रहा ऑक्सीजन जीने का सहारा बना। आरंभिक दौर में छोटी-सी पाइप से कुरमुरे और ड्राईप्रâूट्स भोजन के रूप में दिए गए। बाद में पाइप के माध्यम से ही बोतल में भरकर खिचड़ी भी पहुंचाई गई। बीच-बीच में उन्हें परिजनों से फोन पर बात करवाई गई, लेकिन संकट के प्रतिकूल वातावरण में अपने आपको संभालने वाले मजदूरों के धैर्य और उनके संयम को सलाम है। क्योंकि मेरे जैसे कई लोगों को तो ऐसे में फंसने और जान का जोखिम होने पर इतने दिनों तक बर्दाश्त करने का साहस नहीं है। अब लगता है कि हमें भी इन मजदूरों की तरह अपने हौसले को मजबूत रखना चाहिए। हिम्मत और संयम से काम लेना चाहिए। उन सभी एजेंसियों और साहसी कर्मियों को भी सलाम है, जिन्होंने इस कठिन राहत कार्य की चुनौती को मिशन की तरह लिया और मजदूरों को बचाने के लिए अपनी जान फूंक दी।
(लेखिका स्तंभकार एवं सामाजिक, राजनीतिक मामलों की जानकार हैं।)

अन्य समाचार