मुख्यपृष्ठस्तंभआज और अनुभव : हे राम! इतने बैनर-होर्डिंग, कभी एक बैनर लगाना...

आज और अनुभव : हे राम! इतने बैनर-होर्डिंग, कभी एक बैनर लगाना मुश्किल था

कविता श्रीवास्तव

दे श में इन दिनों चुनावी माहौल गर्म है। आम लोकसभा चुनावों की तैयारियों ने जोर पकड़ा है। हालांकि, आम चुनावों का एलान अभी नहीं हुआ है। वह किसी भी वक्त हो सकता है। लेकिन विभिन्न राजनीतिक दलों ने अभी से जगह-जगह पोस्टर, बैनर, होर्डिंग्स लगवाने शुरू कर दिए हैं। इसीलिए जहां देखें, वहीं विज्ञापनों की भरमार है। गली-मोहल्लों, नुक्कड़ों, चौक-चौराहों से लेकर बिजली के खंभों, वृक्षों, फुटपाथों तक जहां देखें हर जगह बैनर्स और होर्डिंग्स ही नजर आते हैं। इस पर मुंबई हाई कोर्ट ने भी चिंता जताई है क्योंकि इससे शहर की शोभा विकृत होती है और आवागमन में भी व्यवधान होता है। इसी बात को गंभीरता से लेते हुए मुंबई हाई कोर्ट ने महानगरपालिका को सख्त हिदायत दी है कि वह जितनी जल्दी हो सके सभी अवैध पोस्टर, बैनर, होर्डिंग हटवाए और उनके खिलाफ कार्रवाई करे। क्योंकि आजकल हर जगह छोटे-बड़े कार्यक्रमों के अलावा लोगों के जन्मदिन, निधन, पदनियुक्ति, कोचिंग क्लासेस, खेल स्पर्धाओं, धार्मिक कार्यक्रमों आदि से संबंधित प्रचार हमें जगह-जगह दिखते हैं। राजनीतिक, धार्मिक और कमर्शियल पोस्टर-बैनर लगाने का चलन बहुत बढ़ गया है। इसकी एक वजह यह भी है कि पोस्टर बैनर अब तुरंत और सस्ती दरों पर बन रहे हैं, जबकि इसी मुंबई में ७०-८० के दशक में हम भी बैनर लगवाते थे। सार्वजनिक रूप से नवरात्रि और गणेश उत्सव के कार्यक्रम हम युवा लोग एक साथ जुटकर बड़े धूमधाम से मनाया करते थे। उन कार्यक्रमों के पंडाल में केवल एक बैनर ही हम लगवा पाते थे। क्योंकि बैनर बनवाने में ही दो-तीन दिन लग जाते थे। उन दिनों कॉटन के सफेद कपड़े पर कलाकार हाथ में ब्रश लेकर रंगों से पेंटिंग करके बैनर बनाया करते थे। पैसे भी अधिक लगते थे। मुझे अच्छी तरह याद है कि इसी पैसे की वजह से एक बार मैं अपने कॉलेज चुनाव के दौरान अपने प्रचार के लिए बैनर नहीं लगवा पाई थी। मैं कॉलेज काउंसिल के चुनाव में प्रत्याशी थी। मेरे सभी साथी चाहते थे कि अन्य प्रत्याशियों की तरह मेरा बैनर भी कॉलेज के बाहर लगे। लेकिन बैनर बनवाने का खर्च मैं नहीं कर पाई। तब आज की तरह की तकनीक और कंप्यूटर ग्राफिक्स के माध्यम से पोस्टर, बैनर, होर्डिंग बनाने की व्यवस्था नहीं थी। तब मुंबई में बड़ी सीमित संख्या में पोस्टर-बैनर दिखा करते थे। उन दिनों हम जैसे युवाओं को राजनीतिक पार्टियां चुनावी प्रचारों और व्यवस्थाओं में बुला लेती थीं। हम सब उत्साह व युवापन के जोश से समूहों में जुटकर सार्वजनिक कार्यक्रम में शामिल होने के इरादे से उनमें हिस्सा लेते थे। तब बहुत ही कम संख्या में छोटे-छोटे बैनर रस्सियों से बांधकर हम कहीं भी उपयुक्त जगह लटका देते थे। उन दिनों बैनर-पोस्टर की इतनी प्रतिस्पर्धा नहीं थी। क्योंकि बैनर बनाना महंगा पड़ता था। राजनीतिक दलों में इतनी होर्डिंगबाजी और बैनरबाजी भी नहीं हुआ करती थी। इसलिए उस दौर में बैनर-पोस्टर के लिए सख्त नियम भी नहीं थे। लेकिन आज के युग में सोशल मीडिया से हर कोई प्रभावित है। फेसबुक, व्हॉट्सऐप, इंस्टाग्राम, ट्विटर एक्स आदि के माध्यम से लोग खुद का जमकर प्रचार कर लेते हैं। अपने बारे में बताते हैं। एक-दूसरे तक पहुंच बना लेते हैं। इसके बावजूद आजकल हर गली-मोहल्ले, सड़क-नुक्कड़ पर बड़े-बड़े बैनर्स और होर्डिंग्स में दिखने की प्रतिस्पर्धा सी मची हुई है। इसलिए हर रास्तों, सड़कों पर ही नहीं पेड़ों, बिजली के खंभों, इमारतों पर भी बैनर्स व होर्डिंग ही नजर आते हैं। कहीं कोई जगह खाली नहीं दिखती। यह प्रचार की प्रतिस्पर्धा का चरम है। इसीलिए सामाजिक व्यवधान को रोकने और अवैध बैनर, पोस्टर, होर्डिग को नियमित व सीमित करने के लिए हाई-कोर्ट को दखल देनी पड़ रही है। मुझे याद है कि मेरे देवर भी राजनीतिक दल से जुड़े हुए थे और उनकी पार्टी की कमेटी की ओर से लगाए गए बैनर-होर्डिंग पर हमारे देवर की तस्वीर और उनका नाम भी छपा था, लेकिन जब चुनाव आया तो हमारे घर नोटिस आ गई। नोटिस में देवर की तस्वीर वाले अवैध पोस्टर-बैनर लगाए जाने पर जुर्माना लगाए जाने की जानकारी थी। हमें इस बारे में कुछ पता ही नहीं था। चुनाव का माहौल था। पुलिस की कार्रवाई हो सकती थी। इसलिए जुर्माने की राशि अदा करने का सभी ने सुझाव दिया और हमें वह भरना पड़ा। इसलिए अब लग रहा है कोर्ट के ताजा आदेश के बाद मुंबई में अवैध होर्डिंग और बैनर्स लगाए जाने के खिलाफ एक्शन जरूर होगा। इस संबंध में सरकार की ओर से आश्वस्त किया गया है कि अब महानगरपालिका को अवैध बैनर और होर्डिंग हटाने के लिए पर्याप्त पुलिस बल भी मुहैया कराया जाएगा। हालांकि, मुंबई महानगरपालिका ने अब तक हजारों अवैध बैनर हटवा दिए हैं। कई लोगों की सूचनाएं पुलिस को दी गई हैं। कुछ मामले भी दर्ज किए गए हैं। समस्या यह है कि कई बार बैनर्स और होर्डिंग ऐसे लगा दिए जाते हैं, जिससे ट्रैफिक सिग्नल भी ढंक जाता है। आम दिशा-निर्देश और सूचनाएं भी ढंक जाती हैं। नियमत: मुंबई में बैनर, पोस्टर, होर्डिंग आदि लगाने के लिए महानगरपालिका से विधिव्ात अनुमति लेनी होती है और उसका शुल्क भरना होता है। लेकिन इसकी परवाह किए बिना लोग अनेक सार्वजनिक स्थलों पर अवैध रूप से बैनर, पोस्टर आदि लगवा देते हैं। इससे कई बार आवागमन की दिक्कतें होती हैं। राहगीरों को भी अवरोध का सामना करना पड़ता है। वाहन चलाने वालों का ध्यान भी भटकता है। लेकिन अब अदालती आदेश के बाद प्रशासन को सख्ती अपनानी होगी।
(लेखिका स्तंभकार एवं सामाजिक, राजनीतिक मामलों की जानकार हैं।)

अन्य समाचार