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मां का होना एक तरफ

साथ में सारी दुनिया हो
सुख-सुविधा की बगिया हो
खुशी दर पर दस्तक दे
चाहे उससे गलबहियां हो
जीवन में लोगों की भीड़ लगे पर
जहां का होना एक तरफ
मां का होना एक तरफ
बचपन वाली अब बात कहां
रात में मां का साथ कहां
खरीद सके बचपन कोई
धरती पर किसी की औकात कहां
आज का हंसना एक तरफ
बचपन का रोना एक तरफ
जहां का होना एक तरफ
मां का होना एक तरफ
खेल-खेल में बचपन बीता
अब अलग तरह से जीवन जीता
मोह–माया से विरत हुआ मन
खोज रहा है भगवत-गीता
मां के मोह में लिपटे थे ऐसी के
तकिया-बिछौना एक तरफ
मां की गोदी में सोना एक तरफ
जहां का होना एक तरफ
मां का होना एक तरफ
काश के कोई दिन लौटा दे
मां डंडा लेकर थोड़ा दौड़ा दे
जबरी से कुछ निवाले खिला दे
बात–बात में शिवाले दिखा दे
परियों से मेल कराती मां
सब मनचाहा दिखलाती मां
थी दुनियादारी एक तरफ
और मेरा रोना एक तरफ
जहां का होना एक तरफ
मां का होना एक तरफ
-सिद्धार्थ गोरखपुरी

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