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मदर ऑफ एटॉमिक बॉम! … एक यहूदी लड़की जिसे नहीं मिला नोबेल पुरस्कार

मनमोहन सिंह
सन् १८८६। वियेना, ऑस्ट्रिया नामक एक छोटे से देश की राजधानी। एक ८ साल की छोटी-सी बच्ची बड़ी तल्लीनता से अपनी नोटबुक में कुछ लिख रही थी। इतनी छोटी-सी उम्र में एक्सपेरिमेंट भी करती, उन्हें नोट करती और दुनिया को अपनी नजर से किस तरह से महसूस करती है उसे भी…!
उसे विज्ञान से बहुत लगाव था विशेषकर फिजिक्स से। उसने तय कर लिया था कि वह एक साइंटिस्ट बनेगी। यह वह जमाना था जब ऑस्ट्रियन लड़कियों के लिए हायर एज्युकेशन की राह आसान नहीं थी। उसने घर में ही फिजिक्स की पढ़ाई शुरू कर दी। उसकी लगन रंग लाई उसे विएना यूनिवर्सिटी में एडमिशन मिल गया।
यह १९०१ था, १९०६ में उन्होंने फिजिक्स में पीएचडी की डिग्री हासिल कर ली थी। विएना यूनिवर्सिटी की दूसरी महिला थी। अब विएना में उनके पास फिजिक्स रिसर्च में संभावनाएं बहुत सीमित थीं, वह बर्लिन आ गई।
१९३८ में वैâसर विल्हेम इंस्टीट्यूट में रसायनज्ञ ओटो हैन और फ्रिट्ज स्ट्रैसमैन के साथ उन्होंने पाया कि न्यूट्रॉन के साथ थोरियम पर बमबारी करने से विभिन्न आइसोटोप पैदा होते हैं। दिसंबर के अंत में फ्रिस्क के साथ उन्होंने जो शोध किया उसे १९३९ में नेचर के फरवरी अंक में अपनी रिपोर्ट में उन्होंने इसे `फीजन’ यानी `विखंडन’ नाम दिया। इसी सिद्धांत की वजह से द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान पहले परमाणु बम और उसके बाद अन्य परमाणु हथियारों और परमाणु रिएक्टरों का विकास हुआ। यह कितनी विडंबना है कि परमाणु विखंडन की जिस थ्योरी पर उन्होंने काम किया। उसके लिए १९४४ का नोबेल प्राइज उन्हें नहीं बल्कि उनके सहयोगी ऑटो हैन को प्रदान किया गया था।
हालांकि, हैन को दिए गए नोबेल प्राइज के खिलाफ विरोध के सुर उठे थे, यह कहते हैं कि यह उस महिला साइंटिस्टट के साथ अन्याय है। उनकी मौत के ५५ साल बाद आज भी इस विषय पर बहस चलती रहती है कि नोबेल प्राइज की हकीकत तौर पर हकदार होने के बावजूद उन्हें इस लायक क्यों नहीं समझा गया? उस जमाने में शायद उनका यहूदी महिला होने की वजह से उन्हें पुरस्कार नहीं दिया गया।
एक रिपोर्ट के मुताबिक, उन्हें १९२४ और १९४८ के बीच रसायन विज्ञान में नोबेल पुरस्कार के लिए १९ बार और १९३७ और १९६७ के बीच भौतिकी में नोबेल पुरस्कार के लिए ३० बार नामांकित किया गया था। नोबेल पुरस्कार से सम्मानित नहीं होने के बावजूद, उन्हें १९६२ में लिंडौ नोबेल पुरस्कार विजेता समारोह में आमंत्रित किया गया। उन्हें कई अन्य सम्मान से नवाजा गया। सबसे बड़ा सम्मान उनके लिए १९९७ में था, जब उनके नाम पर एक केमिकल एलिमेंट को नाम दिया गया, `१०९ मीटनेरियम।’ उन महान साइंटिस्ट का नाम इस एलिमेंट से हमेशा के लिए जुड़ गया। अंदाजा लगाइए, इस एलिमेंट में उनका नाम क्या होगा? १०९ मीटनेरियम… मीटनेर। उनका नाम था लीजा मीटनेर जर्मनी में उनका उच्चारण कुछ इस तरह होता है- लीजा मयेतना।

लीजा मयेतना को `मदर ऑफ एटॉमिक बॉम’ के नाम से भी जाना जाता है। हिरोशिमा नागासाकी पर अमेरिका द्वारा पहले एटम बम गिराए जाने के बाद वह विचलित हो गई थीं। जब अमेरिका ने उन्हें ओपन हाइमर के साथ, जिन्हें फादर ऑफ एटॉमिक बम कहा जाता है, एटॉमिक बम बनाने वाली टीम के साथ जुड़ने का न्योता दिया था उन्होंने उसे अस्वीकार कर दिया था। यह कहते हुए, `मुझे बम से कुछ लेना-देना नहीं है।’ महान साइंटिस्ट आइंस्टीन उन्हें जर्मन की क्यूरी कहा करते थे।

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