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मुख्यमंत्री के गढ़ में भूमिपुत्रों और आदिवासी मजदूरों का सरकार के खिलाफ आंदोलन! … ‘ड्रेजर’ के खिलाफ १५० नावों के साथ खाड़ी में उतरे

सामना संवाददाता / ठाणे
ठाणे और पालघर जिले के हजारों भूमिपुत्र और आदिवासी मजदूरों ने सरकार द्वारा शुरू किए गए ‘ड्रेजर’ पद्धति रेती उत्खनन का विरोध किया है। इन भूमिपुत्रों ने सोमवार को करीब १५० नावों के साथ खाड़ी में उतरकर अपना विरोध जताया और फिर से खाड़ी में डूबी पद्धति द्वारा रेती उत्खनन को मंजूरी देने की मांग की। यह आंदोलन कशेली से गायमुख खाड़ी (नगला बंदर खड़ी पात्र) के बीच में जिस स्थान पर ड्रेजर खड़ा है, उस स्थान पर काले झंडे लगाकर प्रदर्शन किया गया।
बता दें कि ठाणे जिले के भिवंडी और ठाणे तालुकाओं के बीच, कशेली से गायमुख तक उल्हास नदी की खाड़ी के दोनों किनारों पर ३० से ३५ गांव स्थित हैं। १९६० से स्थानीय भूमिपुत्र कृषि के पूरक के रूप में पारंपरिक पनडुब्बी रेत खनन व्यवसाय में लगे हुए हैं। तत्कालीन मुख्यमंत्री एवं राजस्व मंत्री ने इस क्षेत्र को स्थानीय लोगों के लिए आरक्षित कर दिया था। इस क्षेत्र के भूमिपुत्र और आदिवासी मजदूर जैसे लगभग २०,००० से २५,००० लोग इस व्यवसाय पर निर्भर हैं। जव्हार, वाडा, मोखाडा, पालघर के गरीब इलाकों के बेरोजगार, आदिवासी भाइयों की आजीविका इसी व्यवसाय से चलती है। लेकिन अब ड्रेजर (यांत्रिक रूप से) को रेत निकालने की अनुमति दे दी गई है। सरकार के इस पैâसले से स्थानीय लोगों में काफी नाराजगी है। विकास के नाम पर अब इस हिस्से में पानी पहुंचाने के लिए ड्रेजरों से खुदाई की जा रही है। इससे २० से २५ हजार भूमिपुत्र और कुपोषित क्षेत्रों के हजारों आदिवासी बेरोजगार हो जाएंगे।
सरकार कर रही अन्याय
भूमिपुत्रों का कहना है कि जब सैकड़ों वर्षों के डूबी पद्धति द्वारा रेती उत्खनन के कारण इस बेल्ट में ५० फीट से अधिक गहरी खाड़ी बन गई है और इसमें से जब २०० से २५० टन की नौकाएं अर्थात बार्जेस उसी क्षेत्र से गुजर रही हैं। तो ऐसे में अचानक खाड़ी में गहराई करने और जगह बनाने के ड्रेजर पद्धति द्वारा रेती उत्खनन की मंजूरी देना सरकार एक प्रकार से भूमिपुत्रों के साथ अन्याय कर रही है।
अमीरों का फायदा खुद का
नुकसान करा रही सरकार 
भूमिपुत्रों ने आरोप लगाया है कि सरकार ड्रेजर के बहाने धन इकट्ठा करने वालों को अनुमति देकर अमीरों को फायदा पहुंचाने का काम कर रही है। आंदोलनकारी भूमिपुत्रों का कहना है कि ‘ड्रेजर’ द्वारा खोदी गई रेत को ड्रेजर्स से २,४०० रुपए प्रति ब्रॉस राजस्व विभाग खरीद कर उसे ६६० रुपए प्रति ब्रॉस की कीमत पर बेचा जाएगा। इससे सरकार को एक ब्रॉस पर १,७४० रुपए का नुकसान होगा। इनका आरोप है कि घात होने के बावजूद यह सरकार अमीरों के लिए के फायदे के लिए करोड़ों रुपए का नुकसान उठाने को तैयार है।

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