मुख्यपृष्ठस्तंभमुंबई मिस्ट्री: मुंबई में बना जहाज उस पर रचा अमेरिकी राष्ट्रगान

मुंबई मिस्ट्री: मुंबई में बना जहाज उस पर रचा अमेरिकी राष्ट्रगान

विमल मिश्र। अमेरिका का राष्ट्रगान The Star-Spangled Banner फ्रांसिस स्कॉट-की नामक शौकिया कवि की रचना है। आपको मालूम है यह राष्ट्रगान वाडिया शिप बिल्डर द्वारा जहाज ‘एचएमएस-मिंडेन’ पर रचा गया, जो मुंबई में बना था?

कुछ वर्ष पहले अमेरिकी रक्षा मंत्री एश्टन कार्टर जब हिंदुस्थान की यात्रा पर आए, तब देश के तत्कालीन रक्षा मंत्री ने सलामी गारद के साथ गोवा में उन्हें एक अनूठी भेंट दी। उस समुद्री पोत का मॉडल, जिस पर १९वीं सदी में अमेरिकी राष्ट्रगान The Star-Spangled Banner लिखा गया था। कितने लोग जानते हैं प्रâांसिस स्कॉट-की द्वारा रचित अमेरिका के इस राष्ट्रगान के मुंबई से भावुक संबंध के बारे में? जी हां, अमेरिका की अस्मिता का सबसे बड़ा प्रतीक यह गीत हिंदुस्थान की कारोबारी राजधानी मुंबई में निर्मित एक युद्धपोत पर रचा गया था, जिसका का नाम था ‘एचएमएस-मिंडेन’। अमेरिका और हिंदुस्थान के इतिहास में इस घटना का विशेष महत्व है। खासकर तब, जब अमेरिका के उपराष्ट्रपति पद पर कमला हैरिस के रूप में एक भारतवंशी ही ‌विराजमान हैं। इसका साझा संबंध ब्रिटेन से भी है, जिससे लड़कर हिंदुस्थान और अमेरिका दोनों को स्वतंत्रता हासिल करनी पड़ी।
‘मिंडेन’ – जो जर्मनी के एक शहर का नाम है, १८१० में सागौन की लकड़ी से निर्मित ७४ तोपों से सन्नद्ध शक्तिशाली युद्धपोत था, जिसका निर्माण ब्रिटिश रॉयल नेवी ने पारसी कारोबारी जमशेदजी बोमनजी वाडिया के मुंबई स्थित डंकन डॉकयार्ड में कराया था जिसे आज ‘मझगांव डाकयार्ड’ के नाम से जाना जाता है, नौसेना की सबसे महत्वपूर्ण युद्धपोत व पनडुब्बी निर्माण इकाई। अमेरिकी रक्षा मंत्री को भेंट ‘मिंडेन’ का मॉडल भी यहीं तैयार किया गया था, मझगांव डाकयार्ड की रिसर्च टीम ने ब्रिटेन के नेशनल मेरीटाइम म्यूजियम जाकर पोत के इतिहास व उसकी मूल डिजाइन के बारे में जरूरी जानकारियां जुटार्इं।
लहराता रहा ध्वज
१८१२ में जब ब्रिटेन और अमेरिका में युद्ध जब निर्णायक दौर में था तो ब्रिटिश रॉयल नेवी का पोत ‘एचएमएस मिंडेन’ अमेरिका पर आक्रमण के लिए निकला था। ३५ वर्षीय अमेरिकी वकील प्रâांसिस स्कॉट-की युद्धबंदी के रूप में इसी पोत पर वैâद थे। बाल्टीमोर बंदरगाह पर लड़ाई के आखिरी दिन मिंडेन तोपों और बंदूकों से रातभर मैकहेनरी किले पर गोलाबारी करता रहा। १४ सितंबर, १८१४ की सुबह तो प्रâांसिस ने देखा यह अनुपम नजारा बर्बादी के सारे निशानों के बीच किले पर अमेरिकी ध्वज ‘स्टार्स एंड स्ट्राइप्स’ अभी भी बुलंद था, शान से लहराता हुआ। प्रâांसिस ने झट जेब में रखा लिफाफा निकाला और उसकी पीठ पर यह अमर गीत रच डाला, The Star-Spangled Banner, यानी ‘सितारों का ध्वज’। ३ मार्च, १९३१ से यह गीत अमेरिका का राष्ट्रगान है। इसे अंग्रेजी के अतिरिक्त स्पेनिश भाषा में भी गाया जाता है।
कबाड़ में बिक गया मिंडेन
‘मिंडेन’ ब्रिटेन से बाहर निर्मित उसका पहला बड़ा युद्धपोत था। उसकी सबसे चमकदार सफलता थी १८१६ का अल्जीयर्स युद्ध। करियर के आखिरी दौर में यह हांगकांग में ‘हॉस्पिटल शिप’ के रूप में स्थिर हो गया। १८६१ में बेच दिए जाने के बाद इसकी भी वही नियति हुई, जो ज्यादातर जहाजों की होती है। तोड़कर इसे कबाड़ के रूप में बेच दिया गया।
दुनिया में होता था दबदबा
दासता के पाश में बंधे हिंदुस्थान के लिए गौरव की बात थी कि ब्रिटिश रॉयल नेवी अपने जंगी जहाज ऑर्डर देकर सीधे मुंबई शिपयॉर्ड में बनवाए। पुर्तगाल व यूरोप की अन्य उपनिवेशी शक्तियों, मराठों और समुद्री लुटेरों के मुकाबले के लिए सागौन की मजबूत लकड़ी से बनाए इन जहाजों की धाक सात समंदरों में थी, जिनकी श्रेष्ठता का प्रशंसक नेपोलियन खुद था। १७३६ में निर्मित ‘ड्रेक’ ऐसा पहला पोत था। ब्रिटेन का ट्रेनिंग शिप-फौड्रोयांट (पूर्व नाम त्रिंकोमाली), जिसे विश्व का अभी तक कार्यरत सबसे पुराना शिप होने का गौरव हासिल है १८१७ में इसी शिपयार्ड में बना। मुंबई शिपयार्ड के नाम दूसरा विश्व कीर्तिमान है, ‘ट्वीड’ (पंजाब) नामक उसके शिप की ८३ दिनों के भीतर लंदन से मेलबोर्न की यात्रा।
वाडिया मास्टर शिप बिल्डर्स शिपिंग इंडस्ट्री का अग्रज था, जिसका नाम डेढ़ सौ वर्षों तक जहाजों की उत्कृष्टता और सुदृढ़ता का पर्याय बना रहा। एक बार ब्रिटिश जहाजों का एक बेड़ा उत्तर बाल्टिक सागर में नौ सप्ताह तक बर्फ में फंसा रहा, तब उससे बिना किसी नुकसान बाहर निकल आनेवाला पहला जहाज था वाडिया निर्मित ‘साष्टी’। यहां निर्मित ‘एशिया’ पोत ने भी ब्रिटेन के जहाजी बेड़े की अगुवाई करते हुए १८२७ में यूनान की ओर से तुर्की में जबर्दस्त युद्ध किया था। १८७० में मुंबई पोर्ट ट्रस्ट बनने के दो साल बाद यहां बने ५० तोपों से सज्ज जंगी जहाज ‘कार्नवालिस’ की सफलता ने तो शिपयॉर्ड के लिए रॉयल नेवी के ऑर्डरों की बहार लगा दी। १८३५ से १८८५ तक वाडिया घराने की पीढ़ियों ने ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए १७० व ब्रिटेन की रॉयल नेवी के लिए ३४ युद्धपोत और निजी फर्मों के लिए ८७ व मस्कट के लिए तीन कारोबारी पोतों सहित कुल ४०० से ज्यादा पोत बनाए। भाप से चलनेवाली लोहे की नौकाएं भी।
मुंबई में जहाज निर्माण की बुनियाद रखने का गौरव वाडिया भाइयों को ही हासिल है। आज मुंबई में जो एशिया का पहला ड्राई डॉक कहलाता है, इसका निर्माण १७३५ में सूरत से मुंबई आकर बस गए पारसी लोवजी नौशेरवानजी वाडिया और उनके भाई सोराबजी ने ही १७५० में कराया था। उनके छोड़े हुए काम को उनके बेटों मानिकजी और बोरामजी ने आगे बढ़ाया। मुंबई के बाकी धनी पारसियों की तरह जहाज निर्माता वाडिया समुदाय के लोग भी परेल आकर बस गए, जहां समुद्री पोत बनाने के लिए उन्हें बड़े भूखंड मिले हुए थे। इनमें एक घर होता था ‘लाल बाग’ वाडिया परिवार का महल जैसा निवास, जहां आज नौरोज बाग मौजूद है। बाद में यह पूरा इलाका ही ‘लालबाग’ के नाम से विख्यात हो गया। वाडिया की उपलब्धियों का यूनान जैसे देशों ने भी विशेष डाक जारी कर सम्मान किया। वाडिया घराने की इस परंपरा को सिंधिया स्टीम नेविगेशन कंपनी ने कायम रखा है।

 

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