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मुंबई मिस्ट्री….कांटों की राह!

महाराष्ट्र की रुक्मा बाई भारत की पहली प्रैक्टिसिंग महिला डॉक्टर थीं, तो आनंदी गोपाल जोशी डॉक्टर के रूप में शिक्षा प्राप्त करनेवाली पहली भारतीय महिला। बंगाल की कादंबिनी गांगुली के भी पहली महिला डॉक्टर होने के दावे किए जाते हैं। भारत की इन तीनों महिला डॉक्टरों ने आज से सवा सौ वर्ष पूर्व पुरुष -स्त्री असमानता, जाति व वर्ग विद्वेष और सांस्कृतिक अवरोधों से लोहा लेते हुए अपना अलग स्थान ही नहीं बनाया, महिलाओं के लिए शिक्षा की राह भी प्रशस्त की।

प्रति १०,००० मरीजों पर शहरों में ६५० और ‌पिछड़े इलाकों में महज ५०। कुल मिलाकर देखें तो हमारे देश में महिला एलोपेथी डॉक्टर केवल १७ फीसदी हैं। फुल टाइमर तो और भी कम। यह कहानी तो १०० वर्ष पहले उस जमाने की है, जब गर्भवती महिलाएं संतान जन्म के लिए अस्पताल में कदम रखने भर से डरती थीं, इस विश्वास के कारण कि ‘अस्पताल तो सिर्फ मरने के लिए ही जाया जाता है।’ लेडी डॉक्टर उस समय थीं ही नहीं और पुरुष डॉक्टर हैं‌डिल करें, लज्जा एवं संकोचवश यह न तो इन महिलाओं को पसंद था, न उनके घर वालों को।
ऐसे में रुक्मा बाई, आनंदी गोपाल जोशी, कादंबिनी गांगुली, हेमावती सेन, मुत्थुलक्ष्मी रेड्डी, मेरी पुनेन लुकोसे जैसी लेडी डॉक्टर्स का होना किसी वरदान से कम नहीं था। रुक्मा बाई भारत की पहली प्रैक्टिसिंग महिला डॉक्टर थीं तो आनंदी गोपाल जोशी और कादंबिनी गांगुली डॉक्टर के रूप में शिक्षा प्राप्त करनेवाली पहली भारतीय महिला। इन तीनों महिला डॉक्टरों ने आज से सवा सौ वर्ष पूर्व पुरुष -स्त्री असमानता, जाति व वर्ग विद्वेष और सांस्कृतिक अवरोधों से लोहा लेते हुए जिस तरह नारी शिक्षा की राह प्रशस्त की देश उसके लिए हमेशा उनका कृतज्ञ रहेगा। लंदन स्थित भारतीय डॉ. कविता राव ने अपनी नव – प्रकाशित पुस्तक थ्a्ब् Dदम्ूदrे : ऊप ळहूदत्् एूदrगे ध्f घ्ह्ग्a’े इग्rेू ेंदसह घ्ह श्ग्म्ग्हा (ेंोूत्aह्) में इन तीनों के साथ हेमावती सेन, मुत्थुलक्ष्मी रेड्डी, मेरी पुनेन लुकोसे सरीखी प्रारंभिक डॉक्टरों के संघर्षों का भी वर्णन किया है।
भारत की प्रथम महिला डॉक्टर कौन – आनंदी या कादंबिनी?। इस बात को लेकर विवाद जब भी तेज हुए हैं, ज्यादातर प्रेक्षकों ने आनंदी को ही यह श्रेय दिया है। विडंबना देखिए, तमाम कष्ट झेलकर सबसे पहले डॉक्टरी की डिग्री हासिल करने वाली आनंदी बीमारी की वजह से खुद कभी प्रैक्टिस नहीं कर पार्इं और जिस समाज की सेवा के लिए वे चिकित्सा की अग्रदूत बनी थीं उसी समाज ने उन्हें इलाज के अभाव में दम तोड़ने को मजबूर कर दिया।
स्वयंसिद्धा
३१ मार्च १८६५ को पुणे में गणपतराव अमृतेश्वर जोशी के घर ‘यमुना’ के नाम से जन्मीं आनंदी का विवाह नौ वर्ष की अल्पायु में अपने से २० वर्ष बड़े विधुर गोपालराव जोशी के साथ हुआ था। १४ वर्ष की आयु में जन्मा आनंदी का पुत्र चिकित्सा सुविधा के अभाव में १० दिन बाद ही काल कवलित हो गया तो उन्होंने जिद ठानी कि वे डॉक्टर बनेंगी, ताकि चिकित्सा के अभाव में देश में किसी दूसरे नवजात बच्चे का हश्र ऐसा न हो। यह वह काल था, जिसमें महिलाओं की पढ़ाई-लिखाई के बारे में सोचा तक नहीं जाता था, डॉक्टरी तो दूर की कौड़ी थी। यह पढ़ाई सिर्फ यूरोप और अमेरिका में ही होती थी और सिर्फ अंग्रेजी में। डाकघर में लिपिक गोपालराव ने पत्नी की इच्छा जानी तो उसे अंग्रेजी सिखाने का निश्चय कर लिया। फिर तो कोल्हापुर, मुंबई, गुजरात, कलकत्ता, बैरकपुर, श्रीरामपुर -जहां-जहां भी उनका तबादला होता रहा वे पत्नी को साथ लेकर जाते और अंग्रेजी सिखाते रहे। श्रीरामपुर प्रवास में आनंदी को इस पढ़ाई के लिए अमेरिका भेजना तय हुआ। समाज – जो उनके अंग्रेजी पढ़ने और पति के साथ बाहर घूमने जाने से पहले से क्षुब्ध था- अब आग-बबूला हो गया। आनंदी को इस दौरान कई बार घोर अपमान का सामना करना पड़ा।
अमेरिका प्रस्थान से पूर्व आनंदी ने श्रीरामपुर स्थित बैपटिस्ट कॉलेज के सभागृह में एक जोशीला भाषण किया, जिसका विषय था, ‘मैं अमेरिका क्यों जाना चाहती हूं?’ इस भाषण ने उनकी फीस और टिकट का इंतजाम कर दिया। अमेरिका के न्यूजर्सी प्रांत के रोशेल गांव में रहने वाली एक उदार महिला थॉडिसिया कारपेंटर ने आनंदी की कहानी ‘मिशनरी रिव्यू’ नामक पत्रिका में पढ़ रखी थी। उन्होंने उनके रहने की व्यवस्था अपने घर में कर दी और आनंदी को नाम दिया ‘आनंद का निर्झर’। बाद की राह आसान नहीं थी। १८ वर्ष की आयु में १८८३ में एक अमेरिकी महिला की संगत में आनंदी दो महीने की समुद्री यात्रा के बाद जब अमेरिका पहुंची तो बर्फीली ठंड थी। यहां उनके आवास को शुद्ध शाकाहारी होने और केवल साड़ी या भारतीय वस्त्र पहिनने की जिद ने और कठिन बना दिया। ऊपर से अमेरिकी मिशनरी द्वारा लगातार ईसाई धर्म स्वीकार करने के दबाव। चार वर्ष के इस प्रवास में वे अमेरिका समाज से कभी सामंजस्य नहीं रख पार्इं। महाराष्ट्रीय ढंग की साड़ी पहनने पर टांगें नीचे से अनावृत हो जाने की विवशता से आनंदी यहां गुजराती ढंग की साड़ी पहनती थीं, ताकि शरीर पूरी तरह ढंका रहे। आधा पेट या निराहार रहने से उनका शरीर धीरे-धीरे बीमारियों का घर बन गया। आखिरी हमला था घातक टी. बी., यानी क्षयरोग। तब उनकी उम्र थी महज २० वर्ष।
इंग्लैंड की महारानी ने भेजा बधाई संदेश
फिलाडेल्फिया मेडिकल कॉलेज में आनंदी को ११ मार्च, १८८६ को एम.डी. की उपाधि मिली तो स्वयं इंग्लैंड की महारानी विक्टोरिया ने उन्हें बधाई संदेश भेजा था। दीक्षांत समारोह पर इस पल के साक्षी बने खुद पति गोपालराव और पंडिता रमाबाई। समस्त अतिथियों ने भारत की इस प्रथम महिला डॉक्टर का खड़े होकर जोरदार तालियों से अभिनंदन किया। १६ नवंबर, १८८६ को आनंदी स्वदेश वापस लौटीं तो मुंबई बंदरगाह पर अथाह जनसमूह पुष्पवृष्टि से उनके स्वागत के लिए मौजूद था। बधाई के तार संदेशों और अभिनंदन पत्रों का तो तांता ही लग गया। इसके बाद की कहानी बहुत कारुणिक है। स्वदेश वापसी पर कोल्हापुर की रियासत ने आनंदी को कोल्हापुर के अल्बर्ट एडवर्ड अस्पताल के महिला वार्ड में प्रभारी चिकित्सक के रूप में नियुक्त कर दिया। अब तक आनंदी की देह में घातक टी. बी. पैर पसार चुका था। वापसी यात्रा में जहाज पर किसी गोरे डॉक्टर ने उनका इलाज नहीं किया। स्वदेश में तो हिंदू डॉक्टरों या वैद्यों द्वारा तो उनके इलाज से इनकार के लिए एक और बहाना था-शास्त्रों के आदेश का उल्लंघन कर समुद्र पार जाना। २६ फरवरी, १८८७ को उनकी ईह लीला समाप्त हुई तो उनकी उम्र थी महज २२ वर्ष। गोपाल राव को ऐसा सदमा पहुंचा कि उन्होंने पत्नी की अस्थियां किसी पवित्र नदी में विसर्जित करने की बजाय कारपेंटर परिवार को ही अमेरिका भिजवा दीं। आज तक ये अस्थियां वहां के एक कब्रिस्तान में दफन हैं। उनकी कब्र पर लिखा है, ‘आनंदी जोशी, युवा हिंदू ब्राह्मण कन्या। विदेश में अध्ययन कर डॉक्टर की डिग्री हासिल करने वाली प्रथम भारतीय महिला।’ अमेरिका से लौटने पर भारत में महिलाओं के लिए अलग से एक मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल खोलने का आनंदी ने जो सपना देखा था वह पूरा नहीं हो पाया। इसे आंशिक रूप से पूरा किया महाराष्ट्र की ही रुक्मा बाई राऊत ने, जो लंदन से डॉक्टरी की डिग्री हासिल कर भारत की पहली प्रैक्टिसिंग महिला डॉक्टर बनीं।
पश्चिमी शिक्षा हासिल करने के बावजूद आनंदी रहन-सहन, रीति-रिवाज, परंपराओं, पहनावे और आहार से पूर्ण रूपेण शुद्ध भारतीय महिला थी, जिनमें देशाभिमान कूट-कूट कर भरा हुआ था। जिस पहनावे में वे अमेरिका से आए जहाज से उतरी थीं वही उनका सबसे प्रचलित चित्र है- नौ गजी पुणेरी साड़ी व चोली, महाराष्ट्रीयन झुमका, नथ, बड़ी सी बिंदी और पैरों में जूते व स्टॉकिंग्स। शोध और फेलोशिप होने के साथ उनके जीवन पर फिल्म व सीरियल के साथ उपन्यास व नाटक भी लिखे गए। उनके नाम पर शुक्र ग्रह पर एक गड्ढा भी है। गूगल ने उन्हें ‘डूडल’ बनाकर सम्मानित किया है। ‘महिला स्वास्थ्य दिवस’ प्रतिवर्ष २६ फरवरी को उन्हीं की स्मृति में मनाया जाता है।
डॉ. रुक्मा बाई को भी उस समय के कुछ बड़े नेताओं के लांछनों के साथ पति से लंबे मुकदमे झेलने पड़े, वहीं महिलाओं के अधिकारों के लिए अभियान चलाने के लिए तत्कालीन बंगाली समाज के लोग कादंबिनी गांगुली को तो लोग ‘वेश्या’ तक कहने से बाज नहीं आए। कादंबिनी के भी पहली महिला डॉक्टर होने के दावे किए जाते हैं। १८८६ में कलकत्ता मेडिकल कॉलेज से डिग्री हासिल करने वाली कादंबिनी को पहली स्त्री रोग विशेषज्ञ होने के साथ १८८२ में आर्ट से स्नातक करने पहली भारतीय महिला होने का श्रेय भी हासिल है।
(लेखक ‘नवभारत टाइम्स’ के पूर्व नगर संपादक, वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं।)