" /> मुुंबई मिस्ट्री…खीर-बताशा, गरबा-रास और चांदनी रात में रतजगा!

मुुंबई मिस्ट्री…खीर-बताशा, गरबा-रास और चांदनी रात में रतजगा!

मनोरी में दीपमालिका, जुहू चौपाटी पर चंद्र दर्शन और घर-बाहर गरबा- रास। मुंबई में हर पर्व-त्योहार की तरह शरद पूर्णिमा की भी निराली शोभा है।

शरद पूर्णिमा की चर्चा चलते ही पहली याद जो गुदगुदाती है वह है दिप- दिप चांदनी के बीच सुई पिरोना। छतों पर हर तरफ हर तरह, हर उम्र के लोग और एक ही-सा नजारा। घर के आंगन में लड्डू-गोपाल सहित घर के सारे भगवानों को श्वेत चंद्रकिरणों में नहला-धुलाकर, सफेद वस्त्रों से सुशोभित कर, सफेद बिछावन में बिठलाकर और श्वेतवर्ण नैवेद्यों से तृप्त कर हम भी अपनी नजर में इस पर्व का सबसे महत्वपूर्ण कार्य करने ऊपर चढ़ आए हैं, ताकि वर्ष के सबसे जगमग पूर्ण चंद्र की रोशनी में सुई के सूक्ष्मतम छिद्र में धागा डाल सकें और चंद्रदेव से नेत्र ज्योति का वरदान हासिल कर लें।
पुराना उत्साह आज नहीं बचा, फिर भी मुंबई में आज भी बहुत से परिवार हैं, जो शरद पूर्णिमा का यह त्योहार पूरी रात छत पर ही मांगलिक भजन-संगीत के कार्यक्रमों के साथ रात्रि-जागरण करके बिताते हैं। बीच-बीच में मसाला मिल्क के एनर्जी ड्रिंक के साथ। छत पर एक स्थान को शुद्ध कर सफेद पतले मलमल के वस्त्र से ढक चांदनी में रखी होती है वह विशेष खीर, जो गाय के दूध में घी, शक्कर, केसर-मेवा आदि मिलाकर बनाई गई है। चांदी के पात्र में इसी खीर का नैवेद्य मक्खन, मिश्री, बताशों समेत श्वेत मिष्ठान्न के साथ लक्ष्मीजी व अन्य भगवानों को अर्पित किया गया है।
मुंबई में शरद पूर्णिमा अवसर है, जब जुहू सहित सभी समुद्र तटों की शोभा शबाब पर होती है। शहर से दूर, पर्वतीय स्थलों पर, खोपोली के कोंडगांव बांध के किनारे और किलों पर भी अलाव लगाकर चंद्र दर्शन के विशेष कार्यक्रम होते हैं। मुंबई में सबसे विशेष आयोजन होता है मनोरी में गगनगिरी महाराज आश्रम में लाखों दीपों की उजास। लोग खाड़ी के तट पर या नौकाओं में सवार होकर यह अनुपम दृश्य देखते हैं। यह उत्सव दशहरे से ही शुरू हो जाता है। शरद पूर्णिमा के दिन शाम छह बजे से लोगों का जो तांता लगता है, वह रात १० बजे तक चलता है। आयोजन का यह २०वां वर्ष है। इस वर्ष शरद पूर्णिमा दो दिन की होने से इस आयोजन की शोभा और निखर गई है।
मुंबई के सभी मंदिरों में-विशेषकर कृष्ण मंदिरों में शरद पूर्णिमा पर विशेष आयोजन होते हैं। जुहू, गिरगांव चौपाटी, खारघर व मीरा रोड के इस्कॉन मंदिरों, वडाला के प्रति-पंढरपुर विट्ठल मंदिर, भूलेश्वर के राधाकृष्ण लक्ष्मीनारायण मंदिर, श्री कृष्ण प्रणामी मंदिर, फोर्ट की गोवर्धननाथजी की हवेली, कालाबादेवी के नर नारायण मंदिर, फणसवाड़ी, कालबादेवी का कृष्ण प्रणामी और विलेपार्ले में द्वारिकाधीश हवेली में कोरोना की वजह से लगातार दूसरे वर्ष यह पर्व सादगी से मनाया जा रहा है। कोच्चु गुरुवायूर मंदिर राजावाड़ी, कंबाला हिल और कालाबादेवी सहित श्री स्वामीनारायण मंदिरों, साकीनाका, ठाणे, वाशी, खारघर (दो), पनवेल, वसई (दो) और बोइसर सहित भगवान जगन्नाथ के मंदिरों, बाबुलनाथ मंदिर के पास के श्री कृष्ण मंदिर, वीरा देसाई रोड (अंधेरी) पश्चिम के श्री कृष्ण मंदिर, सांताक्रुज (पूर्व के राधा कृष्ण मंदिर), सायन (पूर्व के श्री कृष्ण मंदिर), दहिसर (पूर्व) के विट्ठल रुक्मिणी मंदिर, अंधेरी (पूर्व) के श्री जगन्नाथ सेवा मंडल मंदिर, खार (पश्चिम) के रामकृष्ण मठ, महावीर नगर के श्याम सत्संग मंडल, जोगेश्वरी (पश्चिम) के मदन मोहनलालजी मंदिरों में भी कुछ जगह धूमधाम से और बाकी जगह शरद पूर्णिमा के सांकेतिक आयोजन किए गए हैं।
अमृत-वर्षा
आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा शरद पूर्णिमा इसलिए कहलाती है क्योंकि इस दिन चंद्रमा पृथ्वी के सबसे पास आ जाने से यह सभी पूर्णिमाओं से अधिक दमकती है। चंद्रमा १६ कलाओं से युक्त है, इसलिए शरद पूर्णिमा को जब वह पूर्ण होता है तो उसकी किरणों से अमृत की वर्षा होती है और उसकी शीतल चांदनी में बैठने से मनुष्य का तन-मन शांत हो जाता है। चंद्रमा को दूध का अर्घ्य देने के साथ इसका व्रत करने से मनुष्य को आरोग्य की प्राप्ति के साथ त्रिविध दोषों से मुक्ति मिल जाती है। उसका व्रत सुखद दांपत्य, संतान सुख और सुयोग्य वर की कामना से भी किया जाता है। चंद्रमा का प्रभाव काफी तीव्र होने से इस दिन देह के भीतर रक्‍त में न्यूरॉन सेल्स क्रियाशील हो जाते हैं और मनुष्य अधिक उत्तेजित या भावुक रहता है। इसीलिए इस दिन क्रोध नहीं करने की विशेष महत्ता मानी गई है। देवताओं की प्रसन्नता के लिए आकाशदीप जलाने का क्रम इसी रात से ही शुरू होता है, जो पूरे कार्तिक मास तक चलता है। भगवान श्रीकृष्ण ने इसी दिन यमुना तट पर गोपियों के साथ महारास किया था, इसलिए यह रासोत्सव और कौमुदी-महोत्सव भी कहलाता है। घरों, हाउसिंग सोसायटीज में और सार्वजनिक स्थलों पर यह रास-गरबा और डांडिया का दिन है।
शरद पूर्णिमा पर मठ-मंदिरों में देव विग्रहों की खुले आसमान के नीचे श्वेत वस्त्र व फूलों की झांकी सजती है और मध्य रात्रि में पंचोपचार या षोडशोपचार पूजन होता है। इस दिन कमलगट्टे, बेल या पंचमेवा या खीर से हवन कराने और श्रीसूक्त या लक्ष्मीस्तोत्र पाठ की विशेष मान्यता है। दूध आदि चंद्रदेव से संबंधित चीजें दान करनी या बांटने की विशेष महत्ता है। नेत्र-ज्योति व स्मरण-शक्ति बढ़ाने के लिए इस दिन रात्रि को घी, बूरा और पिसी काली मिर्च मिलाकर जमा दें, फिर चांदनी में रातभर उस मिश्रण को रख दें। इस घी को रोज सुबह एक छोटा चम्मच खाने से मनुष्य की नेत्र-ज्योति व स्मरण-शक्ति बढ़ती है, ऐसा भी कहते हैं।

लेखक ‘नवभारत टाइम्स’ के पूर्व नगर संपादक, वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं।