मुख्यपृष्ठस्तंभमुंबई मिस्ट्री : बालासाहब खेर: स्वतंत्रता आंदोलन के तपे नेता

मुंबई मिस्ट्री : बालासाहब खेर: स्वतंत्रता आंदोलन के तपे नेता

विमल मिश्र मुंबई
बालासाहब गंगाधर खेर को ब्रिटिश कालीन बंबई (मुंबई) राज्य का दो बार और स्वतंत्रता के बाद पहला मुख्यमंत्री होने का गौरव हासिल है। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान खेर चार बार जेल गए।
ऊंची इमारतों से भरे मुंबई के वीआईपी मलबार हिल क्षेत्र में हैंगिंग गार्डन, कमला नेहरू पार्क, टॉवर ऑफ साइलेंस, मलबार हिल क्लब, राजभवन और मुख्यमंत्री बंगले ‘वर्षा’ को समेटे ह्यूजेज रोड, पेडर रोड और नेपियन सी रोड को जोड़ने वाली रिज रोड १९७६ से बी.जी. खेर मार्ग के नाम से जानी जाती है। बांद्रा का एक इलाका भी ‘खेरवाड़ी’ कहलाता है। उस व्यक्ति के नाम पर जिसे अपने समय महाराष्ट्र की राजनीति का शिखर पुरुष होने का गौरव हासिल है।
महाराष्ट्र की यह शख्सियत हैं, बालासाहब गंगाधर खेर, जो एक नहीं तीन बार राज्य के मुख्यमंत्री रहे। दो बार ब्रिटिश कालीन बंबई (मुंबई) राज्य के और तीसरी बार देश की स्वतंत्रता के बाद।
बालासाहब गंगाधर खेर का जन्म २४ अगस्त, १८८८ को रत्नागिरि में एक मध्यमवर्गीय ब्राह्मण परिवार में हुआ था। जहीन छात्र के रूप में वजीफे लेते रहकर उन्होंने वर्ष १९०८ में मुंबई के विल्सन कॉलेज से विशेष योग्यता के साथ कानून की शिक्षा प्राप्त की थी। कुछ वर्ष हाईकोर्ट के न्यायाधीश प्रâेंक बीमन के सहायक के रूप में कार्य करने के बाद उन्होंने ‘मणिलाल खेर एंड कंपनी’ नाम से अपनी लॉ फर्म बनाई और प्रैक्टिस करने लगे। १९२३ में उन्होंने ‘बॉम्बे लॉ जरनल’ निकाला।
चार बार जेल गए
लोकमान्य बालगंगाधर, गोपालकृष्ण गोखले और महात्मा गांधी के प्रभाव में बालासाहब गंगाधर खेर ने अपना राजनीतिक जीवन १९२२ में शुरू किया। शुरुआत १९२३ में स्वराज पार्टी की बंबई शाखा के सचिव पद से हुई। फिर वे बंबई कांग्रेस के अध्यक्ष और हरिजन सेवक संघ, महाराष्ट्र के अध्यक्ष चुने गए। १९३० से १९४५ के बीच महात्मा गांधी के असहयोग, सविनय अवज्ञा आंदोलन, नमक सत्याग्रह और ‘भारत छोड़ो’ आंदोलनों के सिलसिले में वे चार बार जेल गए।
गांधीजी, पं. जवाहरलाल नेहरू और नेताजी सुभाषचंद्र बोस जैसे राष्ट्रीय नेताओं की संगत में खेर महाराष्ट्र में कांग्रेस की अगली पंक्ति के नेताओं में गिने जाने लगे थे। १९३७ और १९४६ के चुनाव में वे दो बार पार्टी के टिकट पर बंबई (मुंबई) विधान सभा के सदस्य चुने गए। उस समय जब इस प्रांत में गुजरात और सिंध भी सम्मिलित हुआ करते थे। सर्वसम्मति से विधान मंडल दल का नेता चुने जाने पर वे पहले ३ अप्रैल, १९३७ से २ नवंबर, १९३९ तक और फिर ३० मार्च, १९४६ से १५ अगस्त, १९४७ तक ब्रिटिशकालीन बंबई प्रांत के मुख्यमंत्री रहे। अंग्रेजों ने जब भारतीय फौजों के द्वितीय विश्व युद्ध में भाग लेने की घोषणा की, तब विरोध में उन्होंने पद से इस्तीफा दे दिया था।
स्वतंत्रता के बाद २१ अप्रैल, १९५२ तक बंबई राज्य का पहला मुख्यमंत्री होने का सौभाग्य भी खेर को ही मिला। १९४६ में बाबासाहेब आंबेडकर के साथ वे संविधान सभा के सदस्य चुने गए और भारतीय संविधान के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वर्ष १९५२ से १९५४ तक वे ब्रिटेन में भारत के उच्चायुक्त रहे। राजकीय भाषा आयोग की अध्यक्षता के साथ-साथ १९५६ उन्हें गांधी स्मारक निधि के अध्यक्ष की जिम्मेदारी भी सौंपी गई, जो उन्होंने जीवन पर्यंत निभाई। पहले विधायक और फिर मुख्यमंत्रित्व काल में खेर ने समाज सुधार और लोक कल्याण के अनेक कार्य किए। नासिक के मंदिर प्रवेश सत्याग्रह में डॉ. भीमराव आंबेडकर के साथ वे भी शामिल थे। खेर किसानों और मजदूरों के सच्चे हितैषी थे। आदिवासी सेवा संघ के संस्थापक के रूप में उनकी पैठ आदिवासियों के बीच भी थी। लीगल एड सोसायटी उन्हीं की देन है।
अस्थमा से पीड़ित खेर का ८ मार्च, १९५७ में पुणे में देहांत हो गया। सन् १९५४ में भारत सरकार ने उन्हें ‘पद्म विभूषण’ की उपाधि से सम्मानित किया। १९४९ में जिस पुणे विश्वविद्यालय (सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय) की स्थापना में वे सहायक बने थे, उसके परिसर में ‘खेर भवन’ आज भी उनकी याद दिलाता है। बांद्रा का एक इलाका भी ‘खेरवाड़ी’ के नाम से जाना जाता है- उनके द्वारा इस क्षेत्र में किए गए उनके कामों की वजह से।

(लेखक ‘नवभारत टाइम्स’ के पूर्व नगर संपादक, वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं।)

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