मुख्यपृष्ठस्तंभमुंबई मिस्ट्री : दीपशिखा नारी चेतना की

मुंबई मिस्ट्री : दीपशिखा नारी चेतना की

  • विमल मिश्र

उदारवाद की तमाम मुहिमों के बावजूद जब समाज आज तक महिलाओं के प्रति रूढ़िवादी सोच से उबरने के लिए जद्दोजहद कर रहा है। रमाबाई रानाडे समाज सुधार का ऐसा नाम है, जिन्होंने १९वीं सदी में महिलाओं को उनके अधिकारों के लिए जागृत किया। उन्हें भारत की प्रथम महिला अधिकार कार्यकर्ता भी कहा जाता है। आज रमाबाई जयंती है और पुण्यतिथि भी।
वक्त की घड़ियों में आज से सवा सौ साल पहले देश में स्वास्थ्य सुविधाओं का धीरे-धीरे विस्तार होने लगा था। उस समय सबसे बड़ी बाधा थी प्रशिक्षित स्टाफ की कमी। खासकर नर्सों की। इसकी वजह थी महिलाओं में नर्सिंग के पेशे के प्रति ‌झिझक। महिलाओं को न तो पुरुष डॉक्टरों से खुद इलाज कराना गवारा था, न उपचार के दौरान उनकी देखभाल करना। ऐसे में रमाबाई इन महिलाओं के बीच जा खड़ी हुईं – अपना यह सवाल लेकर कि ‘तुम्हारे पिता और भाई बीमार हो जाएं तब भी क्या उनकी सेवा-सुश्रुषा नहीं करोगी? ये पुरुष मरीज क्या तुम्हारे पिता या भाई जैसे नहीं!’
ये रमाबाई ही थीं, जिन्होंने लोगों को नर्सिंग को अच्छी निगाह से देखना सिखाया। नर्सिंग एंड मेडिकल एसोसिएशन १९०८ में मुंबई और १९०९ में पुणे में उनके द्वारा स्थापित सेवा सदन सोसायटी का ही एक अंग थी। सेवा सदन-जो आज भी काम कर रहा है- महिलाओं के लिए यह एक ऐसी जगह बन गया, जहां वंचित और शोषित महिलाएं आजादी से कई तरह के रोजगार करके अपनी और परिवार की गुजर- बसर कर सकती थीं।
रमाबाई के विख्यात पति जस्टिस महादेव गोविंद रानाडे महाराष्ट्र में समाज सुधार के लिए समर्पित संगठन प्रार्थना समाज के संस्थापकों में से थे। १८८० से ही रमाबाई इन कामों में पति को सहयोग देने लगी थीं। खासकर महिलाओं को जागरूक और संगठित करने और उनके बीच सामान्य ज्ञान, सिलाई-बुनाई, दस्तकारी, भाषाएं सिखाने और दूसरे तरह के प्रशिक्षण देने के काम में। उन्होंने मुंबई में आर्य महिला समाज के साथ हिंदू लेडीज सोशल एंड लिटररी क्लब की भी स्थापना की, जिसका जोर महिलाओं के व्यक्तित्व विकास पर था। १८८६ में पति के साथ पुणे में उन्होंने देश का पहला लड़कियों का हाईस्कूल ‘हुजूरपागा’ कायम किया। १९०१ में जस्टिस रानाडे की मृत्यु के बाद उन्होंने मुंबई छोड़कर पुणे आने का फैसला किया और फुले बाजार स्थित अपने पैतृक घर में रहने लगीं। यहां उन्होंने भारत महिला परिषद बनाई और १९०४ में हुई पहली महिला कॉन्फ्रेंस का नेतृत्व किया, जिसमें उन्होंने महिलाओं को मताधिकार देने की मांग की। वे केवल महाराष्ट्र और भारत तक सीमित नहीं रहीं, फिजी और केन्या में भी भारतीय मजदूरों के अधिकारों के सवालों को भी उठाया।
रूढ़ियों और परंपराओं को तोड़ा
रमाबाई का जन्म बंबई प्रेसीडेंसी के सातारा के देवराष्ट्रे गांव में कुरलेकर परिवार में हुआ था। उनका सौभाग्य था कि उस समय महाराष्ट्र में समाज सुधार आंदोलन चल रहा था, जिसके नेता थे स्वयं उनके पति जस्टिस रानाडे। पहली पत्नी का देहांत होने पर रानाडे अपने आदर्श के अनुरूप किसी विधवा से ही विवाह करना चाहते थे, पर १८७३ में परिवार के दबाव में उन्हें रमाबाई को जीवनसंगिनी बनाना पड़ा। रमाबाई उस वक्त केवल ११ वर्ष की थीं। जस्टिस रानाडे से २१ साल छोटी। सामाजिक असमानता के उस युग में महिलाओं पर तरह-तरह के अंकुश थे। उन्हें पढ़ने‌-लिखने की मंजूरी नहीं थी। परिवार की नाराजगी मोल लेते हुए भी जस्टिस रानाडे ने उन्हें पढ़ाया। एक दिन आया, जब रमाबाई सार्वजनिक कार्यक्रमों में भी भाग लेने लगीं। उनका पहला सार्वजनिक भाषण मुख्य अतिथि के रूप में नासिक हाईस्कूल में था, जो पति ने लिखा था। जल्द ही उन्होंने अंग्रेजी व मराठी, हिंदी और बंगला में भी बोलने की कला में महारत हासिल कर ली थीं। रमाबाई के भाषण हमेशा सरल और दिल छूने वाले होते थे। जस्टिस रानाडे जब दिवंगत हुए, तब रमाबाई जुनून की तरह उनके अधूरे छोड़े कामों को पूर्ण करने में जुट गईं। उन्होंने समाज की अनेक रूढ़ियों और परंपराओं को तोड़ा, जिनके लिए उन्हें भारी आलोचना और विरोध का सामना करना पड़ा लेकिन वे कभी भी झुकी नहीं।
पुण्यतिथि के लिहाज से रमाबाई रानाडे का यह शताब्दी वर्ष है। २५ जनवरी, १८६२ को वे जन्मी थीं और संयोग से २५ जनवरी के ही दिन-१९२४ में ६२ वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने ‘राष्ट्रीय क्षति’ बताते हुए उन्हें याद किया। डाक विभाग ने १५ अगस्त, १९६२ को उनकी जन्म शताब्दी वर्ष पर डाक टिकट जारी किया। उन पर टी. वी. सीरियल भी बना। रमाबाई संभवत: पहली मराठी महिला थीं, जिन्होंने अपनी जीवनी (‘आमच्या आयुष्यातील काही आठवणी’) लिखी, जो उनके विवाहित जीवन के साथ समाज की शोषित और वंचित महिलाओं के अधिकारों की कैसे पैरवी की जाए इसका विस्तार से वर्णन है।

(लेखक ‘नवभारत टाइम्स’ के पूर्व नगर संपादक, वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं।)

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