मुख्यपृष्ठस्तंभमुंबई मिस्ट्री : के.एम. मुंशी: आजादी और हिंदी के सिपाही

मुंबई मिस्ट्री : के.एम. मुंशी: आजादी और हिंदी के सिपाही

विमल मिश्र
मुंबई

कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी ने भारत की संविधान सभा के सदस्य, कृषि और खाद्य मंत्री और राज्यपाल जैसे महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया। वे लेखक, वकील, शिक्षाविद, संविधान निर्माता, भारतीय विद्या भवन व भारतीय कृषि संस्थान के संस्थापक और प्रखर हिंदी समर्थक के रूप में भी ख्यात हुए, पर इनसे भी पहले वे स्वतंत्रता सेनानी थे।
कन्हैयालाल मुंशी का जन्म ३० दिसंबर, १८८७ को तत्कालीन बंबई राज्य (अब गुजरात) के भड़ौच शहर में एक उच्च सुशिक्षित ब्राह्मण परिवार में हुआ था। मां के धार्मिक गीतों और कथाओं ने बचपन से ही उनमें धार्मिक संस्कार भर दिए थे। देशभक्ति के संस्कार दिए अरविंद घोष (महर्षि अरविंद) ने, जब मुंशी जी बड़ौदा में कॉलेज की पढ़ाई कर रहे थे। धीरे-धीरे उनके मन में औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध हथियारबंद विद्रोह का संकल्प जगने लगा।
१९१० में मुंबई विश्वविद्यालय से एल. एल. बी. की उपाधि प्राप्त कर वकालत शुरू करने के बाद कुछ ही समय में के. एम. मुंशी हाई कोर्ट के दिग्गज वकीलों में गिने जाने लगे थे। हिंदू कानून में मुंशी जी को महारत थी, जो उन्होंने किताबी ज्ञान से नहीं, बल्कि धर्मशास्त्रों व मिताक्षरा के अध्ययन से हासिल की थी।
१९१५ में मुंशी जी एनी बेसेंट के होम रूल आंदोलन से जुड़े, फिर महात्मा गांधी के संपर्क में आकर कांग्रेस के साथ। सरदार वल्लभ भाई पटेल के नेतृत्व में १९२८ के बारदोली सत्याग्रह और १९३० के नमक सत्याग्रह में उन्होंने बढ़-चढ़कर भाग लिया, फिर १९३१ के सविनय अवज्ञा आंदोलन में। इनमें उन्हें ढाई वर्ष की वैâद की सजा सुनाई गई। बारदोली सत्याग्रह में भाग लेने के लिए उन्होंने बंबई विधान सभा की सदस्यता त्याग दी, जिसके लिए वे १९२७ में चुने गए थे। १९३७ में तत्कालीन बंबई प्रेसिडेंसी की पहली निर्वाचित कांग्रेस सरकार में उन्हें गृहमंत्री पद पर नियुक्त किया गया, जिस दौरान उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि थी भीषण सांप्रदायिक दंगों को दबा देना। १९४० के व्यक्तिगत सत्याग्रह के बाद मुंशी एक बार फिर गिरफ्तार हो गए। इसके बाद आत्मरक्षा के लिए हिंसा के प्रयोग के प्रश्न पर मतभेद हो जाने के कारण वे कांग्रेस से अलग हो गए। डॉ. राजेंद्र प्रसाद जब देश के राष्ट्रपति चुने गए, तब मुंशी जी ने केंद्रीय मंत्रिमंडल में उनके स्थान पर कृषि व खाद्य मंत्री पद संभाला। देश के संविधान निर्माता के रूप में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।
१९५२ से १९५७ तक मुंशी जी उत्तर प्रदेश राज्य के राज्यपाल रहे। १९५९ में मुंशी कांग्रेस पार्टी की सदस्यता से त्यागपत्र देकर चक्रवर्ती राजगोपालाचारी की स्वतंत्र पार्टी में शामिल हो गए। इसके कुछ समय बाद उन्होंने भारतीय जनसंघ की सदस्यता ग्रहण कर ली और विश्व हिंदू परिषद के संस्थापक सदस्य बने।
हिंदी के उन्नायक
मुंशी जी राष्ट्रीय शिक्षा के समर्थक थे और पश्चिमी शिक्षा के अंधानुकरण का विरोध करते थे। वे उन बहुत कम राजनीतिज्ञों में हैं, जिन्होंने लेखक, संविधान विशेषज्ञ और शिक्षाविद के रूप में भी उतनी ही ख्याति हासिल की। १९३८ में मुंबई में स्थापित भारतीय विद्या भवन, भवंस कॉलेज और सरदार पटेल से मिलकर आणंद में कायम भारतीय कृषि संस्थान ने शिक्षा के क्षेत्र में उनके नाम को हमेशा के लिए अमर कर दिया है। वे मुंबई के हंसराज मोरारजी पब्लिक स्कूल,राजहंस विद्यालय और राजहंस बाल वाटिका के संस्थापक रहे। ‘वन महोत्सव’ की भी शुरुआत का श्रेय भी उन्हें ही जाता है।
मुंशी जी ने मातृभाषा गुजराती के अलावा हिंदी, कन्नड़, तमिल, मराठी, अंग्रेजी आदि भाषाओं में १२७ पुस्तकें लिखी हैं। इनमें कुछ ‘घनश्याम व्यास’ नाम से हैं। ‘गुजरात’ से उन्होंने महात्मा गांधी के साथ ‘यंग इंडिया’ और मुंशी प्रेमचंद के साथ ‘हंस’ पत्रिकाओं का संपादन भी किया है। उन्होंने गुजराती साहित्य परिषद व संस्कृत विश्व परिषद् के साथ १९५६ में हिंदी साहित्य सम्मेलन की अध्यक्षता भी की। हिंदी तथा देवनागरी लिपि को नये भारतीय संघ की राजभाषा का स्थान दिलाने में उनकी भूमिका बहुत प्रमुख मानी जाती है। ८ फरवरी, १९७१ को उनका देहांत हो गया।

(लेखक ‘नवभारत टाइम्स’ के पूर्व नगर संपादक, वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं।)

 

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