मुख्यपृष्ठस्तंभमुंबई मिस्ट्री : खादी माता मणिबेन नानावटी

मुंबई मिस्ट्री : खादी माता मणिबेन नानावटी

विमल मिश्र मुंबई

मणिबेन नानावटी ने स्वतंत्रता सेनानी होने के साथ महिलावादी और शिक्षाशास्त्री के रूप में भी प्रसि‌द्धि हासिल की। पर, उनका इससे भी बड़ा योगदान खादी के प्रचार और उसके निर्माण के ज‌रिए वंचित महिलाओं को बड़ी तादाद में आत्मनिर्भर बनाने के लिए है। उन्हें ‘खादी माता’ के विशेषण से जाना जाता है।
मुंबई में विले पार्ले स्थित उनके घर में वल्लभभाई पटेल और जमनालाल बजाज जैसे अक्सर डेरा डालते। जब भी महात्मा गांधी आंदोलन या ‘जेल भरो’ की घोषणा करते सत्याग्रही उससे पहले भोजन करने यहीं एकत्र होते। यह घर था ‘खादी मंदिर’ और उसकी स्वामिनी ‘खादी माता’ मणिबा, यानी मणिबेन नानावटी का।
मणिबा के ससुर डॉ. बालाभाई बड़ौदा के महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ के निजी चिकित्सक, जेठ मणिलाल भारतीय रिज़र्व बैंक के डिप्टी गवर्नर और पति चंदूलाल नानावटी महात्मा गांधीजी के करीबी सहयोगी थे। मणिबा खुद २७ फरवरी, १९०५ को अहमदाबाद के पास विजापुर में कपड़ा व्यापारी चुन्नीलाल झवेरी के परिवार में जन्मी थीं, मोतियों का जिनका व्यापार यूरोप तक फैला हुआ था। मणिबा ने बचपन में ही माता – पिता को खो दिया था। उनका और उनकी बहन कांताबेन का पालन-पोषण उनके काका लल्लूभाई ने किया।
महात्मा गांधी ने प्रेरणा दी
स्वतंत्रता का आंदोलन जोर पकड़ चुका था। मणिबा का मन भी इसमें भाग लेने को हुलसता। ‘मेरी जिम्मेदारी क्या?’ पूछने पर महात्मा गांधी ने एक दिन उन्हें राष्ट्र की सेवा करने का सूत्र थमा दिया, ‘खादी के विकास के लिए जेहाद छेड़ दो।’ बंबई के मंगरोल जैन गर्ल्स स्कूल में खुद केवल तीसरी कक्षा तक पढ़ाई कर पाई मणिबा महिलाओं के लिए शिक्षा का महत्व अच्छी तरह समझती थीं। ग्रामीण, वंचित और गरीब महिलाओं को खादी द्वारा आत्म‌निर्भर बनाने का संकल्प कर वे स्वामी आनंद के नेतृत्व में चल रहे सत्याग्रही महिलाओं के समूह में शामिल हो गर्इं। इस समूह ने दूर-दराज के गांवों में कताई की शुरुआत की और आश्रमशालाओं के अपने नेटवर्क में प्रशिक्षण के बाद ग्रामीण गरीबों, विशेषकर महिलाओं को आजीविका कमाने में सक्षम बनाया। विले पार्ले की अल्फा मार्केट स्ट्रीट स्थित उनका निवास ‘खादी मंदिर’ के रूप में आज भी उनकी यादें समेटे है। मणिबा ने इसे शिरीन, जयाबेन देसाई और सुनाबेन राव सरीखे अपने सहयोगियों के साथ बनवाया था, जो आजीवन इसकी अवैतनिक सचिव रहीं। १९३४ में इसका उद्घाटन कस्तूरबा गांधी ने किया था। इसका काम था महिलाओं को आधारभूत शिक्षा के साथ ग्रामीण विकास और खादी निर्माण का प्रशिक्षण देना। इस उद्यम ने गुजरात की आदिवासी महिलाओं को उनके पैरों पर खड़ा करने में बहुत मदद की। यह केंद्र विभाजन के बाद देश में आई शरणार्थी महिलाओं को आर्थिक सहायता देने में भी सहायक बना। आज भी इसका संचालन महिलाओं द्वारा ही किया जाता है।
मणिबा का घर उन दिनों हमेशा बारडोली, धरमपुर और देश भर के स्थानों से आए कार्यकर्ताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं से भरा रहता था। उनका अधिकांश समय सूत कातने में बीतता, जिसके बाद वे उन आदिवासी, दलित और वंचित बच्चों के लिए कपड़े सिलती थीं, जो उनके स्कूल में पढ़ने आते थे। कपड़े जब कम पड़ जाते थे, तब वे पुरानी टाइयों के टुकड़ों का उपयोग कर उनकी बंडी और बनियानें सिलने में करती थीं। उन दिनों उनकी सामान्य दिनचर्या इस प्रकार होती थी, सुबह पांच बजे स्नान और जैन मंदिर में दर्शन के बाद सुबह ११ बजे तक सिलाई। फिर भोजन करके स्टेशन जाकर चर्चगेट के लिए लोकल पकड़कर फोर्ट स्थित खादी भंडार जाना। वहां शाम चार बजे तक काम करते ट्रेन से ही लौटना और रात के खाने और शाम की प्रार्थना के बाद कम से कम एक घंटा सुबह बचा सिलाई का काम पूरा करना। जल्द ही वे ‘खादी माता’ के रूप में प्रसिद्ध हो गर्इं। उन्हें महाराष्ट्र खादी और ग्रामोद्योग बोर्ड का मानद सचिव बनाया गया।
मणिबा के खुद के पास खादी के कपड़ों के केवल दो सेट होते थे। कुछ और सफेद खद्दर साड़ियां उन्होंने बाद में केवल इसलिए जोड़ी क्योंकि बारिश में कपड़े जल्दी सूखते नहीं थे।
खुद अधिक पढ़ न पाने के कारण शिक्षा की अपनी ललक उन्होंने पूरी की १९५४ में विले पार्ले में चंदूलाल नानावती विनय मंदिर की स्थापना के साथ। इससे तीन साल पहले १९५१ में उन्होंने डॉ. बालाभाई नानावती अस्पताल की संस्थापक ट्रस्टीशिप संभाली थी, जिसका उद्घाटन तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू ने किया था। आज यह देश का प्रसिद्ध सुपरस्पेशलिटी अस्पताल है।
मणिबा का देहांत २००० में ९५ वर्ष की उम्र में हुआ। उनकी बेटी अरुणाबेन पुरोहित भी स्वतंत्रता संग्राम के दौरान आर्थर रोड जेल में बंद हुर्इं थी।

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