मुख्यपृष्ठनए समाचारमुंबई मिस्ट्री: महादेव देसाई - गांधीजी के जीवनीकार

मुंबई मिस्ट्री: महादेव देसाई – गांधीजी के जीवनीकार

विमल मिश्र मुंबई

महात्मा गांधी और स्वतंत्रता संग्राम में उनकी भूमिका के बारे में दुनिया आज जितना कुछ जानती है, उसका अधिकांश श्रेय महादेव देसाई और उनकी डायरी को है। महादेव देसाई २५ वर्ष तक गांधीजी के निजी सचिव रहे, पर उनका आपसी रिश्ता पिता-पुत्र जैसा ही था।

‘महादेव देसाई के चरित्र की सबसे बड़ी विशेषता थी मौका पड़ने पर खुद को भूलकर शून्यवाद बन जाने की उनकी ताकत। वे मुझ में पूरी तरह खो गए थे। मुझसे अलग उन्होंने अपनी कोई हस्ती ही नहीं रखी थी। वे चले गए और मुझे अपनी जीवनी लिखने के लिए छोड़ गए। महादेव भाई ने अपने जीवन के ५० साल में १०० बरस का काम पूरा कर डाला था।’ ‘हां, गांधीजी मानते थे कि जितना काम अकेले महादेव कर लेते हैं, आधे दर्जन सचिव होते, तब भी मिलकर नहीं कर सकते थे।’

आठ अगस्त, १९४२ को मुंबई के गवालिया टैंक के मैदान पर महात्मा गांधी ने ‘अंग्रेजों, भारत छोड़ो-करो या मरो’ का ऐतिहासिक नारा दिया और अगले ही दिन भोर में उन्हें महादेव देसाई, सरोजिनी नायडू और कांग्रेस के कई अन्य शीर्ष नेताओं के साथ गिरफ्तार कर पुणे के आगा खां पैलेस में बंद कर दिया गया। वैâद का हफ्ता भी नहीं बीता था कि अचानक महादेव देसाई सभी को स्तब्ध करके हार्ट फेल होने से चल बसे। शाम को बापू थोड़ा प्रकृतिस्थ हुए तो पहला उद्गार उनकी जुबान पर यही था। महादेव देसाई बापू के लिए सिर्फ स्वतंत्रता संग्राम के सहयोगी और निजी सचिव ही नहीं थे, सबसे विश्वसनीय साथी थे। वे उन्हें पुत्रवत मानते थे और इसी रूप में उन्होंने महादेव देसाई के सारे अंतिम संस्कार निभाए। कस्तूरबा के लिए यह सदमा और भी गहरा था। वे बार-बार यही कहती रहीं कि ‘महादेव क्यों गया, मैं क्यों नहीं?’ उनका अंत्येष्टि स्थल उनके लिए महादेव का मंदिर सा बन गया। वे रोज उनकी समाधि पर जातीं, दीप जलातीं और प्रदक्षिणा कर समाधि को नमस्कार करतीं। इस समाधि पर ओम और क्रॉस के चिह्न अंकित किए गए। कस्तूरबा स्वयं उनके देहांत के बाद एक वर्ष से अधिक जीवित नहीं रह पार्इं। आज दोनों की समाधियां बिलकुल पास-पास हैं। ऐसी ही समाधियां बडवानी से लगभग पांच किलोमीटर दूर नर्मदा नदी के किनारे भी स्थित हैं। महादेव देसाई वर्धा के जिस ‘सेवाग्राम’ में निवास करते थे, वहां भी उनकी कुटी ‘बा’ के बिलकुल पास में है।

बापू को मलाल था कि महादेव भाई चले गए और उन्हें अपनी जीवनी लिखने के लिए छोड़ गए। वास्तव में महादेव भाई के लिए यह मलाल उनसे भी ज्यादा बड़ा था। उनकी यह सबसे बड़ी ख्वाहिश थी, जो वे जीते-जी पूरी नहीं कर पाए। इसका प्रकाशन महादेव भाई के निधन के बाद हुआ। २० खंडों में प्रकाशित उनकी ‘महादेव भाई की डायरी’ गांधी वाङ्मय को सबसे बड़ा योगदान है। बापू के चंपारण सत्याग्रह से शुरू ये डायरियां १९१७ से १९४२ तक बापू के नित्य प्रति के क्रिया-कलाप, उनकी विचार प्रक्रिया, उनकी यात्राओं और अहिंसक आंदोलन का सजीव वर्णन जानने की सर्वप्रथम सूचना ही नहीं, सबसे प्रामाणिक स्रोत भी हैं। जनवरी, १९४८ में गांधीजी की हत्या के फौरन बाद नवजीवन पब्लिशिंग हाउस से इनका प्रकाशन ‘डे-टुडे विद गांधी’ नाम से हुआ। महादेव देसाई के निधन के बाद उनके बेटे नारायण देसाई ने बापू का जीवन वृत्तांत चार खंडों में ‘माय लाइफ इज माय मैसेज’ के नाम से लिखकर पिता का अधूरा काम पूरा किया – उन डायरियों के आधार पर, जिनमें महादेव भाई ने अपने लंबे साथ में बहुत बारीकी से गांधीजी के पत्रों, भाषणों, बातचीत, विचारों को क्रमबद्ध रूप में नोट करके तैयार किया था। १०० भागों में प्रकाशित ‘द कलेक्टिव वर्क्स ऑफ महात्मा गांधी’ भी उनकी डायरियों के आधार पर ही तैयार हुआ है। गांधीजी की गुजराती में लिखी आत्मकथा ‘सत्य के साथ प्रयोग’ का अंग्रेजी और जवाहरलाल नेहरू की आत्मकथा ‘एन ऑटोबायोग्राफी’ का गुजराती में अनुवाद भी उन्हीं की कलम से हुआ है।

मृत्युपर्यंत गांधीजी के साथ

किसी ने सही लिखा है, ‘महादेव देसाई गांधीजी के मात्र सचिव नहीं थे, वे उनके गणेश थे, दूत थे, साथ ही पीर-बावर्ची-सबकुछ थे।’ हिसाब रखना, रेलवे के नक्शे की मदद से गांधीजी के दौरों के कार्यक्रम बनाना, उनकी यात्रा किट की देखभाल, उनकी तारीखें तय करना, पत्रों के जवाब लिखना, खास मेहमानों के आतिथ्य जैसे कामों के साथ उनके बिस्तर को ठीक करना, खाना बनाना, बर्तन व कपड़े धोना जैसे दायित्व उन्होंने बिल्कुल पाबंदी से निभाए।
महादेव देसाई शुरू में होम लीग से जुड़े थे। फिर चंपारण, बारदोली सत्याग्रह व नमक सत्याग्रह और ‘भारत छोड़ो’ के दौरान गिरफ्तार हुए। ३१ अगस्त, १९१७ उनकी जिंदगी का दिशा निर्धारक सिद्ध हुआ, जब गोधरा में उनकी पहली भेंट गांधीजी से हुई। फिर यह साथ जीवन पर्यंत छूटा नहीं। १९२४ से १९२८ तक भारत यात्रा में वे गांधीजी के साथ थे। १९३१ के गोलमेज सम्मेलन में गांधीजी के साथ लंदन गए। ब्रिटेन के राजसी परिवार ने जब गांधीजी को बंकिंघम पैलेस आमंत्रित किया, तब भी वे उनके साथ थे। उन्होंने बापू के साथ भारत यात्राएं भी कीं और जेल यात्राएं भी। उनके पौत्र नचिकेता देसाई ने लिखा है, ‘महादेव देसाई का कार्यालय उनके साथ ही शुरू हुआ और उनके साथ ही समाप्त हो गया। उन्होंने अपने पीछे कोई उत्तराधिकारी नहीं छोड़ा। १८९२ – साल का पहला ही दिन था, जब महादेव देसाई का जन्म सूरत के एक छोटे से गांव सरस में हरिभाई देसाई और जमनाबेन के घर हुआ। सिर से मां की छांव सात वर्ष की उम्र में ही उठ गई। पिता हरिभाई अमदाबाद के महिला प्रशिक्षण महाविद्यालय के प्राचार्य और रामायण, महाभारत, गीता जैसे ग्रंथों के प्रेमी थे। महादेव भाई ने मुंबई से १९१३ में कानून की डिग्री ली और वकालत करने लगे। ब्रिटिश राज और देशी रियासतों के मसलों को देखते थे। कुछ समय तक उन्होंने सरकारी बैंक में भी काम किया।

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